छोटानागपुर उन्नति समाज 1915
छोटानागपुर उन्नति समाज 1915
वर्ष 1915 में स्थापित छोटानागपुर उन्नति समाज वह बिंदु है जहां झारखंड आंदोलन का स्वरूप बदलता है। एक सदी के सशस्त्र विद्रोहों के बाद शिक्षित जनजातीय युवाओं ने ऐसा संगठन बनाया जो अर्जी, ज्ञापन और संवैधानिक राजनीति का रास्ता अपनाता है।
स्थापना — 1915 | संस्थापक — रेव. जोएल लकड़ा, साथ में थेबले उरांव, बंदी उरांव और पॉल दयाल
स्थापना और उद्देश्य
- 1915 में छोटानागपुर क्षेत्र में स्थापनाबार-बार पूछा जाता है
- संस्थापक — रेव. जोएल लकड़ा, साथ में थेबले उरांव, बंदी उरांव और पॉल दयाल
- उद्देश्य — जनजातीय समुदायों में शिक्षा और सामाजिक सुधार
- पद्धति — अर्जी और ज्ञापन, सशस्त्र कार्रवाई नहीं
- इसे मिशन-शिक्षित जनजातीय युवाओं की पहली पीढ़ी ने खड़ा किया
1915 मोड़ क्यों है
- इससे पहले हर आंदोलन विद्रोह था; यह एक संगठन था
- 1908 के CNT अधिनियम ने दिखा दिया था कि कानून से कुछ मिल सकता है
- ब्रिटिश भारत के सुधार संवैधानिक प्रतिनिधित्व की छोटी जगह खोल रहे थे
- शिक्षा से ऐसे नेता बने जो अंग्रेजी में लिख सकते और अधिकारियों से सीधे बात कर सकते थे
- मांग केवल भूमि से बढ़कर क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक पहुंचती है
इसकी मुख्य गतिविधियां
| गतिविधि | इसका अर्थ |
|---|---|
| शिक्षा कार्य | विद्यालय, छात्रावास और जनजातीय छात्रों को प्रोत्साहन |
| सामाजिक सुधार | शराब, कर्ज और फिजूलखर्ची के विरुद्ध अभियान |
| अर्जी | भूमि और काश्तकारी शिकायतों पर अधिकारियों को ज्ञापन |
| प्रतिनिधित्व | जनजातीय सीटों और अलग प्रशासनिक ध्यान की मांग |
| संगठन | छोटानागपुर के जिलों में शाखा ढांचा |
इससे क्या निकला
- 1920 और 1930 के दशक के कई जनजातीय संगठनों का आधार यही बना
- 1938 में ये संगठन मिलकर आदिवासी महासभा बने
- महासभा ने वही पद्धति अलग प्रांत की मांग तक पहुंचाई
- 1915 से 1990 के दशक के राज्य आंदोलन तक की रेखा अटूट है
- इसीलिए झारखंड आंदोलन के उत्तर की शुरुआत 1915 से होनी चाहिए, 1972 से नहीं
पक्के करने लायक नाम और वर्ष
- 1915 — छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना
- जोएल लकड़ा — संस्थापक
- थेबले उरांव, बंदी उरांव, पॉल दयाल — सहयोगी संस्थापक
- 1938 — आदिवासी महासभा का गठन
- संवैधानिक पद्धति — इस चरण की परिभाषक विशेषता
इसी दौर के अन्य संगठन
- छोटानागपुर उन्नति समाज इस समूह में सबसे पहला और सबसे प्रभावी था
- किसान सभा तथा कैथोलिक और लूथरन जनजातीय नेटवर्क में अलग संगठन बने
- छोटानागपुर कैथोलिक सभा जैसे संगठन उसी शिक्षा एजेंडे पर काम कर रहे थे
- गैर-ईसाई जनजातीय नेताओं ने भी इन्हीं दशकों में अपने संगठन बनाए
- इनकी आपसी प्रतिस्पर्धा ने एकता में देर की, पर आंदोलन का सामाजिक आधार चौड़ा किया
- ये सब 1938 में आदिवासी महासभा के रूप में एक मंच पर आ गए
इस चरण ने क्या नहीं दिलाया
- औपनिवेशिक काल में अलग प्रांत नहीं मिला
- CNT अधिनियम कानून की किताब में होने के बावजूद भूमि छिनना जारी रहा
- प्रतिनिधित्व निर्णायक नहीं, प्रतीकात्मक और सलाहकारी बना रहा
- पर इस चरण ने नेतृत्व, साक्षरता और संगठन बनाया जिसे आगे के चरणों ने काम में लिया
याद रखने की ट्रिक — एक लाइन में चरण-परिवर्तन — 1900 तक तीर-कमान, 1915 से कलम। और वर्षों का जोड़ — 1908 CNT अधिनियम, 1915 उन्नति समाज: कानून मिला तो संगठन बना।
यहां लोग गलती करते हैं — उन्नति समाज कोई राजनीतिक दल नहीं था।
✗ छोटानागपुर उन्नति समाज एक राजनीतिक दल था | ✓ यह सामाजिक और शैक्षिक संगठन था; दल 1949-50 में बना
✗ उन्नति समाज ने अलग राज्य की मांग की | ✓ अलग प्रांत की मांग आदिवासी महासभा के दौर में मजबूत हुई
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में इस टॉपिक से 'झारखंड आंदोलन के चरण' वाला प्रश्न बनता है — सशस्त्र से संगठनात्मक चरण तक। JSSC CGL और JKCE में सीधा — उन्नति समाज कब बना, किसने बनाया। यह अध्याय का आरंभिक वर्ष है, इसलिए 1915 और नाम पक्के रखें।
एक नजर में
- स्थापना 1915 में
- संस्थापक — रेव. जोएल लकड़ा
- सहयोगी — थेबले उरांव, बंदी उरांव, पॉल दयाल
- उद्देश्य — शिक्षा और सामाजिक सुधार
- पद्धति — अर्जी और ज्ञापन
- पहली मिशन-शिक्षित जनजातीय पीढ़ी की देन
- विद्रोह से संगठन की ओर मोड़
- 1938 में आदिवासी महासभा में विलय
- आधुनिक झारखंड आंदोलन का प्रारंभ बिंदु
- CNT अधिनियम 1908 के बाद आता है
