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चुआर और भूमिज विद्रोह

By ExamAtlas · 19/9/2026

चुआर और भूमिज विद्रोह

पठार के पूर्वी किनारे पर जंगल महाल क्षेत्र में प्रतिरोध की दो जुड़ी हुई लहरें उठीं — अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध की लंबी चुआर अशांति और 1832-33 का तीखा भूमिज विद्रोह, जिसका नेतृत्व गंगा नारायण सिंह ने किया।

चुआर — 18वीं सदी का उत्तरार्ध, जंगल महाल | भूमिज — 1832 से 1833, नेता गंगा नारायण सिंह

चुआर विद्रोह

  • वर्तमान पुरुलिया, बांकुड़ा, मिदनापुर और मानभूम की ओर फैले जंगल महाल क्षेत्र में लड़ा गया
  • चुआर नाम औपनिवेशिक अभिलेखों का अपमानजनक शब्द था, जो मुख्यतः भूमिज और सहयोगी समूहों के लिए प्रयुक्त हुआ
  • कारण — कंपनी की भारी राजस्व मांग और बकायेदार सरदारों की जागीरों की नीलामी
  • पाइक, यानी स्थानीय सरदारों के परंपरागत सशस्त्र सेवक, अपनी सेवा-भूमि खोकर विद्रोह में शामिल हुए
  • यह एक लगातार युद्ध नहीं, अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों में लहरों के रूप में चला
  • राज्य सामग्री में रघुनाथ महतो तथा जंगल महाल के स्थानीय जमींदार सरदारों के नाम मिलते हैं

भूमिज विद्रोह

  • वर्ष — 1832 से 1833, इसे गंगा नारायण का हंगामा भी कहते हैंबार-बार पूछा जाता है
  • नेता — बड़ाभूम के सरदार परिवार के गंगा नारायण सिंह
  • क्षेत्र — बड़ाभूम, जो धालभूम, मानभूम और सिंहभूम तक फैला
  • कारण — कंपनी समर्थित राजस्व व्यवस्था और जनजातीय दावे के विरुद्ध दीवान की स्थिति
  • गंगा नारायण की मृत्यु 6 फरवरी 1833 को खरसावां की ओर एक थाने पर हमले में हुई
  • परिणाम — जंगल महाल जिला भंग हुआ और मानभूम जिला बना

दोनों की तुलना

बिंदुचुआर विद्रोहभूमिज विद्रोह
काल18वीं सदी का उत्तरार्ध, लहरों में1832 से 1833, छोटा और तीखा
मुख्य क्षेत्रजंगल महाल, मिदनापुर की ओरबड़ाभूम, मानभूम, धालभूम
नेतृत्वस्थानीय सरदार और पाइकगंगा नारायण सिंह
तात्कालिक कारणराजस्व मांग और जागीर नीलामीराजस्व व्यवस्था और दीवान का अधिकार
प्रशासनिक परिणामजंगल महाल पर कड़ा कंपनी नियंत्रणजंगल महाल भंग, मानभूम का गठन

इन दोनों को साथ क्यों पढ़ा जाता है

  • दोनों का केंद्र भूमिज समुदाय और वही वन क्षेत्र है
  • दोनों कंपनी राजस्व नियमों तथा सरदारी और गोत्र-भूमि के टकराव से उपजे
  • दोनों में पाइक और सेवक वर्ग सेवा छोड़कर विद्रोह में आया
  • दोनों का अंत भूमि व्यवस्था बदलने से नहीं, जिलों की सीमा बदलने से हुआ
  • साथ मिलकर ये बताते हैं कि पूर्वी सीमांत 1830 के दशक तक अशांत क्यों रहा

पक्के करने लायक नाम और वर्ष

  • गंगा नारायण सिंह — भूमिज विद्रोह, 1832 से 1833
  • बड़ाभूम — भूमिज विद्रोह का मुख्य क्षेत्र
  • मानभूम — विद्रोह के बाद बना जिला
  • जंगल महाल — चुआर अशांति का क्षेत्र
  • पाइक — वह सशस्त्र सेवक वर्ग जिसकी सेवा-भूमि छिनी

याद रखने की ट्रिक — दो नाम दो इलाके — चुआर = जंगल महाल, भूमिज = बड़ाभूम। और एक वर्ष — 1832-33 गंगा नारायण। परीक्षा में यही तीन चीजें चाहिए।

यहां लोग गलती करते हैं — भूमिज विद्रोह और कोल विद्रोह दोनों 1832 के आसपास हैं, पर अलग हैं।

गंगा नारायण ने कोल विद्रोह चलाया  |   गंगा नारायण ने 1832-33 का भूमिज विद्रोह चलाया; कोल विद्रोह के नेता बुधु भगत थे

चुआर समुदाय का अपना नाम था  |   चुआर औपनिवेशिक नाम था; समुदाय मुख्यतः भूमिज था

एग्जाम पॉइंटर — JPSC में यह टॉपिक विद्रोहों की तुलना तालिका में आता है — कौन-सा विद्रोह किस क्षेत्र का और उसका प्रशासनिक परिणाम क्या। JSSC और JKCE में सीधा 'गंगा नारायण किस विद्रोह से जुड़े हैं'। भूमिज का वर्ष और मानभूम का गठन — यही दो बिंदु सबसे अधिक पूछे जाते हैं।

एक नजर में

  • चुआर — 18वीं सदी का उत्तरार्ध, जंगल महाल क्षेत्र
  • चुआर औपनिवेशिक नाम था, समुदाय का अपना नहीं
  • पाइकों की सेवा-भूमि छिनी और वे विद्रोह में आए
  • भूमिज विद्रोह1832 से 1833
  • नेता — बड़ाभूम के गंगा नारायण सिंह
  • इसे गंगा नारायण का हंगामा भी कहते हैं
  • उनकी मृत्यु 6 फरवरी 1833 को
  • विस्तार — बड़ाभूम, धालभूम, मानभूम, सिंहभूम
  • परिणाम — जंगल महाल भंग, मानभूम जिला बना
  • दोनों विद्रोहों का केंद्र भूमिज समुदाय

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