चुआर और भूमिज विद्रोह
चुआर और भूमिज विद्रोह
पठार के पूर्वी किनारे पर जंगल महाल क्षेत्र में प्रतिरोध की दो जुड़ी हुई लहरें उठीं — अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध की लंबी चुआर अशांति और 1832-33 का तीखा भूमिज विद्रोह, जिसका नेतृत्व गंगा नारायण सिंह ने किया।
चुआर — 18वीं सदी का उत्तरार्ध, जंगल महाल | भूमिज — 1832 से 1833, नेता गंगा नारायण सिंह
चुआर विद्रोह
- वर्तमान पुरुलिया, बांकुड़ा, मिदनापुर और मानभूम की ओर फैले जंगल महाल क्षेत्र में लड़ा गया
- चुआर नाम औपनिवेशिक अभिलेखों का अपमानजनक शब्द था, जो मुख्यतः भूमिज और सहयोगी समूहों के लिए प्रयुक्त हुआ
- कारण — कंपनी की भारी राजस्व मांग और बकायेदार सरदारों की जागीरों की नीलामी
- पाइक, यानी स्थानीय सरदारों के परंपरागत सशस्त्र सेवक, अपनी सेवा-भूमि खोकर विद्रोह में शामिल हुए
- यह एक लगातार युद्ध नहीं, अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों में लहरों के रूप में चला
- राज्य सामग्री में रघुनाथ महतो तथा जंगल महाल के स्थानीय जमींदार सरदारों के नाम मिलते हैं
भूमिज विद्रोह
- वर्ष — 1832 से 1833, इसे गंगा नारायण का हंगामा भी कहते हैंबार-बार पूछा जाता है
- नेता — बड़ाभूम के सरदार परिवार के गंगा नारायण सिंह
- क्षेत्र — बड़ाभूम, जो धालभूम, मानभूम और सिंहभूम तक फैला
- कारण — कंपनी समर्थित राजस्व व्यवस्था और जनजातीय दावे के विरुद्ध दीवान की स्थिति
- गंगा नारायण की मृत्यु 6 फरवरी 1833 को खरसावां की ओर एक थाने पर हमले में हुई
- परिणाम — जंगल महाल जिला भंग हुआ और मानभूम जिला बना
दोनों की तुलना
| बिंदु | चुआर विद्रोह | भूमिज विद्रोह |
|---|---|---|
| काल | 18वीं सदी का उत्तरार्ध, लहरों में | 1832 से 1833, छोटा और तीखा |
| मुख्य क्षेत्र | जंगल महाल, मिदनापुर की ओर | बड़ाभूम, मानभूम, धालभूम |
| नेतृत्व | स्थानीय सरदार और पाइक | गंगा नारायण सिंह |
| तात्कालिक कारण | राजस्व मांग और जागीर नीलामी | राजस्व व्यवस्था और दीवान का अधिकार |
| प्रशासनिक परिणाम | जंगल महाल पर कड़ा कंपनी नियंत्रण | जंगल महाल भंग, मानभूम का गठन |
इन दोनों को साथ क्यों पढ़ा जाता है
- दोनों का केंद्र भूमिज समुदाय और वही वन क्षेत्र है
- दोनों कंपनी राजस्व नियमों तथा सरदारी और गोत्र-भूमि के टकराव से उपजे
- दोनों में पाइक और सेवक वर्ग सेवा छोड़कर विद्रोह में आया
- दोनों का अंत भूमि व्यवस्था बदलने से नहीं, जिलों की सीमा बदलने से हुआ
- साथ मिलकर ये बताते हैं कि पूर्वी सीमांत 1830 के दशक तक अशांत क्यों रहा
पक्के करने लायक नाम और वर्ष
- गंगा नारायण सिंह — भूमिज विद्रोह, 1832 से 1833
- बड़ाभूम — भूमिज विद्रोह का मुख्य क्षेत्र
- मानभूम — विद्रोह के बाद बना जिला
- जंगल महाल — चुआर अशांति का क्षेत्र
- पाइक — वह सशस्त्र सेवक वर्ग जिसकी सेवा-भूमि छिनी
याद रखने की ट्रिक — दो नाम दो इलाके — चुआर = जंगल महाल, भूमिज = बड़ाभूम। और एक वर्ष — 1832-33 गंगा नारायण। परीक्षा में यही तीन चीजें चाहिए।
यहां लोग गलती करते हैं — भूमिज विद्रोह और कोल विद्रोह दोनों 1832 के आसपास हैं, पर अलग हैं।
✗ गंगा नारायण ने कोल विद्रोह चलाया | ✓ गंगा नारायण ने 1832-33 का भूमिज विद्रोह चलाया; कोल विद्रोह के नेता बुधु भगत थे
✗ चुआर समुदाय का अपना नाम था | ✓ चुआर औपनिवेशिक नाम था; समुदाय मुख्यतः भूमिज था
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में यह टॉपिक विद्रोहों की तुलना तालिका में आता है — कौन-सा विद्रोह किस क्षेत्र का और उसका प्रशासनिक परिणाम क्या। JSSC और JKCE में सीधा 'गंगा नारायण किस विद्रोह से जुड़े हैं'। भूमिज का वर्ष और मानभूम का गठन — यही दो बिंदु सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
एक नजर में
- चुआर — 18वीं सदी का उत्तरार्ध, जंगल महाल क्षेत्र
- चुआर औपनिवेशिक नाम था, समुदाय का अपना नहीं
- पाइकों की सेवा-भूमि छिनी और वे विद्रोह में आए
- भूमिज विद्रोह — 1832 से 1833
- नेता — बड़ाभूम के गंगा नारायण सिंह
- इसे गंगा नारायण का हंगामा भी कहते हैं
- उनकी मृत्यु 6 फरवरी 1833 को
- विस्तार — बड़ाभूम, धालभूम, मानभूम, सिंहभूम
- परिणाम — जंगल महाल भंग, मानभूम जिला बना
- दोनों विद्रोहों का केंद्र भूमिज समुदाय
