जलवायु और वर्षा
जलवायु और वर्षा
झारखंड की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है और यहां तीन स्पष्ट ऋतुएं हैं। वार्षिक वर्षा लगभग 1,200 से 1,400 मिलीमीटर है, जिसका अधिकांश भाग जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून से मिलता है।
जलवायु — उष्णकटिबंधीय मानसूनी | वार्षिक वर्षा — लगभग 1,200 से 1,400 मिमी | मानसून — जून से सितंबर
तीन ऋतुएं
| ऋतु | महीने | स्वरूप |
|---|---|---|
| ग्रीष्म | मार्च से जून | गर्म और शुष्क; मानसून से पहले चरम गर्मी |
| वर्षा | जून से सितंबर | दक्षिण-पश्चिम मानसून; वर्ष की अधिकांश वर्षा |
| शीत | अक्टूबर से फरवरी | ठंडी और शुष्क; साफ आकाश |
तापमान
- ग्रीष्म में तापमान प्रायः लगभग 25 से 45 डिग्री सेल्सियस रहता है
- शीत में तापमान प्रायः लगभग 5 से 25 डिग्री सेल्सियस रहता है
- नेतरहाट जैसी ऊंची पठारी सतहें स्पष्ट रूप से ठंडी रहती हैं
- पठारी ऊंचाई राज्य को उसी अक्षांश के बिहार मैदान से ठंडा रखती है
- दामोदर घाटी और निचला पूर्वी भाग ग्रीष्म में सबसे गर्म रहते हैं
वर्षा का स्वरूप
- वार्षिक वर्षा लगभग 1,200 से 1,400 मिमीबार-बार पूछा जाता है
- दक्षिण-पश्चिम मानसून से इसका अधिकांश भाग मिलता है
- वर्षा मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से आती है
- वर्षा सामान्यतः दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर घटती है
- कुछ शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ और स्थानीय तंत्रों से मिलती है
- पठार से पानी तेजी से बहने के कारण अधिक वर्षा भी जल संकट नहीं मिटाती
कृषि-जलवायु क्षेत्र
| क्षेत्र | नाम | मुख्य भाग |
|---|---|---|
| क्षेत्र IV | मध्य एवं उत्तर-पूर्वी पठार | रांची, हजारीबाग और संथाल परगना की ओर |
| क्षेत्र V | पश्चिमी पठार | पलामू प्रमंडल और पश्चिमी जिले |
| क्षेत्र VI | दक्षिण-पूर्वी पठार | सिंहभूम और दक्षिणी पट्टी |
राज्य की जलवायु संबंधी समस्याएं
- सूखा आम है क्योंकि वर्षा एक छोटी अवधि में केंद्रित रहती है
- कठोर चट्टान पर तेज बहाव से प्राकृतिक रूप से बहुत कम जल संचित होता है
- देर से या कमजोर मानसून सीधे खरीफ फसल, विशेषकर धान पर चोट करता है
- पलामू जैसे पश्चिमी जिले सर्वाधिक सूखा-प्रवण हैं
- कम वर्षा वाले वर्ष में भी नदी घाटियों में अचानक बाढ़ आ जाती है
- सिंचाई का दायरा कम है, इसलिए कृषि मानसून पर बहुत निर्भर है
स्थानीय मौसम शब्द और घटनाएं
- लू — चरम ग्रीष्म सप्ताहों की गर्म शुष्क हवा
- कालबैसाखी — पूर्वी पट्टी के तीखे पूर्व-मानसून तूफान
- खरीफ — मानसूनी फसल ऋतु, जिसमें धान प्रमुख है
- रबी — शीतकालीन फसल ऋतु, जो कमजोर सिंचाई से सीमित रहती है
- शीत के अंत में ओलावृष्टि कुछ वर्षों में सब्जी और दलहन को नुकसान पहुंचाती है
- पूर्व-मानसून तूफानों में वज्रपात ग्रामीण जिलों की बार-बार लौटने वाली आपदा है
याद रखने की ट्रिक — तीन आंकड़े याद रखें — 1,200-1,400 मिमी वर्षा, 3 ऋतुएं, 3 कृषि-जलवायु क्षेत्र। और एक लाइन — वर्षा अधिक, पानी कम, क्योंकि पठार पर पानी ठहर नहीं पाता।
यहां लोग गलती करते हैं — अधिक वर्षा का अर्थ जल की बहुलता नहीं है।
✗ अधिक वर्षा का अर्थ है झारखंड में जल संकट नहीं | ✓ कठोर पठार से पानी तेजी से बह जाता है, इसलिए संकट आम है
✗ झारखंड में वर्षा अरब सागर शाखा से आती है | ✓ मुख्य वर्षा बंगाल की खाड़ी शाखा से आती है
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में कृषि-जलवायु क्षेत्र और सूखे के कारण मुख्य परीक्षा में पूछे जाते हैं, प्रायः कृषि के साथ। JSSC CGL, JTGLCCE और JTET में सीधा — वर्षा कितनी, ऋतुएं कितनी, कौन-सा जिला सूखाग्रस्त। आंकड़े अनुमानित याद रखें, सटीक संख्या की जिद न करें।
एक नजर में
- जलवायु — उष्णकटिबंधीय मानसूनी
- वार्षिक वर्षा — लगभग 1,200 से 1,400 मिमी
- वर्षा ऋतु — जून से सितंबर
- वर्षा मुख्यतः बंगाल की खाड़ी शाखा से
- ग्रीष्म — मार्च से जून, लगभग 25 से 45 डिग्री
- शीत — अक्टूबर से फरवरी, लगभग 5 से 25 डिग्री
- नेतरहाट सबसे ठंडा प्रसिद्ध स्थल
- तीन कृषि-जलवायु क्षेत्र — IV, V और VI
- पलामू की ओर सर्वाधिक सूखा-प्रवण
- वर्षा अधिक पर संचयन कम — संकट आम
