लोक नृत्य और संगीत
Folk Dance and Music
झारखंड में नृत्य प्रदर्शन नहीं, भागीदारी है। लगभग हर पर्व का अपना नृत्य है, जो गांव के अखरा में मांदर और नगाड़े की थाप पर होता है, और इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध छऊ को यूनेस्को की सूची में स्थान मिला है।
सर्वाधिक प्रसिद्ध नृत्य — छऊ, सरायकेला शैली | मुख्य वाद्य — मांदर और नगाड़ा | स्थल — गांव का अखरा
प्रमुख लोक नृत्य
| नृत्य | अवसर या समुदाय | विशेषता |
|---|---|---|
| छऊ | सरायकेला शैली, सरायकेला-खरसावां | मुखौटा नृत्य नाटिका, युद्ध-मुद्रा के साथ |
| पाइका | युद्ध परंपरा | पुरुष तलवार और ढाल के साथ नृत्य करते हैं |
| झूमर | नागपुरी और सदान पट्टी | गीत के साथ पंक्ति और वृत्त नृत्य |
| करमा | करमा पर्व, भादो | करम डाल के चारों ओर वृत्त नृत्य |
| सरहुल या बाहा | सरहुल पर्व, वसंत | साल और महुआ के फूलों के साथ नृत्य |
| डोमकच | विवाह | मुख्यतः घर की महिलाओं द्वारा |
| संथाली सामूहिक नृत्य | संथाल समुदाय | तमक और तुमदक के साथ पंक्ति नृत्य |
| टुसू | टुसू पर्व, मकर संक्रांति | मुख्यतः युवतियों द्वारा गीत और नृत्य |
छऊ विस्तार से
- झारखंड की शैली सरायकेला-खरसावां जिले की सरायकेला छऊ हैबार-बार पूछा जाता है
- यह मुखौटा नृत्य नाटिका है जिसमें युद्ध-मुद्रा, नृत्य और कथा तीनों हैं
- अन्य शैलियां हैं पश्चिम बंगाल की पुरुलिया छऊ और ओडिशा की मयूरभंज छऊ
- छऊ को 2010 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की यूनेस्को प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया
- यह परंपरागत रूप से वसंत में चैत्र पर्व के आसपास प्रस्तुत होता है
- मुखौटा निर्माण स्वयं सरायकेला क्षेत्र की एक अलग शिल्प परंपरा है
वाद्य यंत्र
- मांदर — दोनों ओर से बजने वाला मिट्टी का ढोल, क्षेत्र का प्रतीक वाद्य
- नगाड़ा — डंडों से बजाया जाने वाला बड़ा नगाड़ा
- ढाक, ढोल और ढमसा — जुलूस में प्रयुक्त अन्य बड़े ढोल
- तमक और तुमदक — साथ बजने वाले संथाल ढोल
- बनम और तिरियो — संथाल तंतु और सुषिर वाद्य
- शहनाई, नरसिंघा, बांसुरी और भेरी — पर्वों के सुषिर वाद्य
- झांझ, करताल और घंटा — ढोल के साथ बजने वाले धातु वाद्य
संगीत और नृत्य का सामाजिक रूप
- अखरा गांव का नृत्य स्थल है और बैठक स्थल भी
- नृत्य किसी मंच-मौसम नहीं, कृषि कैलेंडर के अनुसार होते हैं
- धुमकुड़िया जैसे युवा गृह परंपरागत रूप से युवाओं को गीत-नृत्य सिखाते थे
- गीतों में मौखिक इतिहास, खेती का ज्ञान और सामाजिक नियम सुरक्षित रहते हैं
- अधिकांश रूपों में स्त्री-पुरुष साथ, पंक्ति या वृत्त में नृत्य करते हैं
अन्य नृत्य जिनका उल्लेख जरूरी है
- जदुर — सरहुल के मौसम का उरांव नृत्य
- नटुआ — पूर्वी पट्टी का कलाबाजी वाला नृत्य
- फिरकाल — कोल्हान की ओर का युद्ध नृत्य
- माथा — मानभूम से लगे जिलों का नृत्य रूप
- झुमटा और मरदाना झूमर — झूमर परिवार के प्रकार
- छऊ नाच अखाड़ा — वह प्रशिक्षण समूह जहां मुखौटा और पद सिखाए जाते हैं
याद रखने की ट्रिक — चार नृत्य, चार अवसर — छऊ = चैत्र, करमा = भादो, सरहुल = वसंत, टुसू = मकर संक्रांति। और दो वाद्य — मांदर और नगाड़ा।
यहां लोग गलती करते हैं — छऊ की तीन शैलियां तीन राज्यों में हैं।
✗ छऊ केवल झारखंड का नृत्य है | ✓ झारखंड में सरायकेला छऊ; पुरुलिया छऊ पश्चिम बंगाल और मयूरभंज छऊ ओडिशा में
✗ मांदर एक तंतु वाद्य है | ✓ मांदर ढोल है; तंतु वाद्य बनम है
एग्जाम पॉइंटर — JSSC CGL, JTGLCCE, JKCE और JTET में नृत्य-अवसर और वाद्य का मिलान सीधा आता है — आसान और पक्का अंक। JPSC में छऊ का यूनेस्को वर्ष और सरायकेला शैली पूछी जाती है। दो तालिकाएं याद कर लें, यह टॉपिक समाप्त।
एक नजर में
- सरायकेला छऊ — झारखंड की मुखौटा नृत्य नाटिका
- छऊ 2010 से यूनेस्को सूची में
- अन्य शैलियां — पुरुलिया और मयूरभंज छऊ
- पाइका — तलवार-ढाल के साथ युद्ध नृत्य
- झूमर — नागपुरी और सदान पट्टी का नृत्य
- करमा — भादो में करम डाल के चारों ओर
- सरहुल या बाहा — साल फूल के साथ वसंत नृत्य
- ढोल — मांदर, नगाड़ा, ढाक, तमक, तुमदक
- तंतु और सुषिर — बनम, तिरियो, शहनाई, नरसिंघा
- ग्राम स्थल — अखरा
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