खेरवार आंदोलन
खेरवार आंदोलन
संथाल परगना में 1870 के दशक का खेरवार आंदोलन एक अलग प्रकार का प्रतिरोध था। यह भगीरथ मांझी के नेतृत्व में संथालों के बीच धार्मिक सुधार और सामाजिक शुद्धि से शुरू हुआ और लगान देने से इनकार तथा बंदोबस्ती के विरोध में बदल गया।
काल — 1870 का दशक | नेता — भगीरथ मांझी | क्षेत्र — संथाल परगना, गोड्डा की ओर
आंदोलन क्या था
- हूल के दो दशक बाद संथाल परगना के संथालों का आंदोलन
- नेतृत्व भगीरथ मांझी का, जिन्हें अनुयायी बाबाजी कहते थेबार-बार पूछा जाता है
- खेरवार नाम संथालों के अपने पारंपरिक नाम से लिया गया है
- शुरुआत धार्मिक सुधार से — एक ईश्वर, शुद्धि, शराब और बलि का त्याग
- फिर यह बंदोबस्ती के विरोध और लगान देने से इनकार में बदल गया
यह राजनीतिक क्यों हुआ
- 1855 के हूल ने अलग जिला तो दिलाया पर लगान और कर्ज से राहत नहीं दी
- नए सर्वे और बंदोबस्त कार्य से फिर भूमि छिनने का भय पैदा हुआ
- एक ही पीढ़ी में साहूकार और व्यापारी क्षेत्र में लौट आए थे
- भगीरथ मांझी ने अनुयायियों से जमींदार और सरकार को लगान न देने को कहा
- उन्होंने अपनी सत्ता की घोषणा भी की, जिसे अंग्रेजों ने खुला राजद्रोह माना
पद्धति और स्वरूप
| विशेषता | खेरवार आंदोलन |
|---|---|
| स्वरूप | सुधार और लगान-इनकार, मुख्यतः अहिंसक |
| मुख्य मांग | लगान का बोझ और अन्यायपूर्ण बंदोबस्ती समाप्त हो |
| धार्मिक पक्ष | एकेश्वरवाद, शुद्धता, शराब और बलि का त्याग |
| संगठन | गांव स्तर पर प्रचार और विशाल सभाएं |
| ब्रिटिश प्रतिक्रिया | नेताओं की गिरफ्तारी और सभाओं का दमन |
यह आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण है
- यह सशस्त्र विद्रोह से सुधार और लगान-इनकार की ओर बदलाव दिखाता है
- यह धार्मिक नवजागरण को आर्थिक विरोध से जोड़ता है, जो पैटर्न बिरसा और ताना भगत में दोहराया गया
- इसने हूल और बीसवीं सदी के बीच संथाल परगना को राजनीतिक रूप से सक्रिय रखा
- यह सीधे उस मांग तक ले जाता है जिससे SPT अधिनियम 1949 बना
- राज्य के पेपरों में यह सामाजिक-धार्मिक जनजातीय आंदोलन का मानक उदाहरण है
नाम और शब्द
- खेरवार — संथालों का पारंपरिक स्व-नाम
- भगीरथ मांझी — आंदोलन के केंद्रीय नेता
- बाबाजी — अनुयायियों द्वारा दी गई उपाधि
- गोड्डा — उनकी गतिविधि से सर्वाधिक जुड़ा जिला
- सफा होड़ — इसी आंदोलन की निकट से जुड़ी शुद्धिकरण धारा
संथाल परगना की कहानी, एक-एक पंक्ति में
- 1832 — दामिन-ए-कोह का सीमांकन और उसमें संथालों का बसाव
- 1855-56 — सिदो-कान्हू का हूल; संथाल परगना जिले का गठन
- 1870 का दशक — भगीरथ मांझी के नेतृत्व में खेरवार और सफा होड़ धारा
- 1876 के बाद — सर्वे और बंदोबस्त कार्य से भूमि प्रश्न और गहराया
- 1949 — संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम से भूमि हस्तांतरण पर रोक
- पांचों प्रविष्टियों में एक ही शिकायत चलती है — भूमि, लगान और कर्ज
याद रखने की ट्रिक — खेरवार का दो-हिस्सा जोड़ — पहले सुधार, फिर लगान से इनकार। नेता एक ही नाम — भगीरथ मांझी। स्थान एक ही — संथाल परगना।
यहां लोग गलती करते हैं — खेरवार और हूल अलग हैं, भले दोनों संथालों के हों।
✗ खेरवार आंदोलन का नेतृत्व सिदो-कान्हू ने किया | ✓ हूल — सिदो-कान्हू, 1855; खेरवार — भगीरथ मांझी, 1870 का दशक
✗ खेरवार एक सशस्त्र विद्रोह था | ✓ खेरवार मुख्यतः सुधार और लगान-इनकार का आंदोलन था
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में इस टॉपिक से 'सामाजिक-धार्मिक आंदोलन' वाला कोण पूछा जाता है, प्रायः ताना भगत से तुलना में। JSSC CGL और JKCE में सीधा — खेरवार आंदोलन का नेता कौन। एक लाइन का उत्तर चाहिए, इसलिए नाम और दशक पक्का रखें।
एक नजर में
- काल — 1870 का दशक, संथाल परगना
- नेता — भगीरथ मांझी, उपाधि बाबाजी
- समुदाय — संथाल
- खेरवार संथालों का अपना पारंपरिक नाम है
- शुरुआत धार्मिक सुधार और शुद्धि से
- बाद में लगान-इनकार और बंदोबस्ती का विरोध
- पद्धति मुख्यतः अहिंसक
- सफा होड़ धारा से निकट संबंध
- हूल के बाद और उलगुलान से पहले
- SPT अधिनियम 1949 की मांग की पृष्ठभूमि
