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पहाड़िया विद्रोह

By ExamAtlas · 19/9/2026

पहाड़िया विद्रोह

राजमहल पहाड़ियों का पहाड़िया विद्रोह, जो 1770 के दशक से 1780 के दशक की शुरुआत तक चला, इस क्षेत्र में कंपनी शासन के विरुद्ध सबसे पहला लंबा जनजातीय प्रतिरोध है। यह केवल हार से नहीं, बल्कि शांति-नीति और भत्तों की नीति से समाप्त हुआ।

काल — 1770 से 1780 के दशक की शुरुआत | क्षेत्र — राजमहल पहाड़ी | समुदाय — पहाड़िया (सौरिया और माल पहाड़िया)

पहाड़िया कौन थे

  • वर्तमान संथाल परगना की राजमहल पहाड़ियों के पर्वतीय समुदाय
  • दो मुख्य समूह — सौरिया पहाड़िया और माल पहाड़िया, दोनों आज PVTG में गिने जाते हैं
  • वे पहाड़ी ढलानों पर स्थानांतरी कृषि करते थे और वनोपज एकत्र करते थे
  • उनकी अर्थव्यवस्था पहाड़ और मैदान के बीच मुक्त आवाजाही पर टिकी थी
  • कंपनी की राजस्व बंदोबस्ती ने भूमि और आवाजाही दोनों को काट दिया

विद्रोह क्यों हुआ

  • 1765 की दीवानी के बाद कंपनी की राजस्व मांग पहाड़ से सटे मैदानों पर भारी पड़ी
  • व्यापारी और जमींदार पहाड़ी संसाधनों और वनोपज पर दखल देने लगे
  • मैदानों पर पहाड़ी लोगों के छापों को संसाधन-विवाद नहीं, अपराध माना गया
  • पहाड़ों में सैन्य अभियान भेजे गए, जिससे प्रतिरोध और कठोर हुआ
  • यह टकराव केवल कर का नहीं, पहाड़ी अर्थव्यवस्था के अस्तित्व का था

नेतृत्व और विद्रोह का स्वरूप

  • प्रतिरोध का नेतृत्व किसी एक सेनापति ने नहीं, पहाड़ी सरदारों ने किया
  • राज्य सामग्री में सबसे अधिक राजा जगन्नाथ और रमना अहाड़ी के नाम मिलते हैं
  • लड़ाई का स्वरूप छापा, घात और कर देने से इनकार रहा, आमने-सामने की लड़ाई नहीं
  • पहाड़ विद्रोहियों के पक्ष में था; कंपनी दर्रे पर कब्जा कर सकती थी, भीतरी क्षेत्र पर नहीं
  • लगातार दबाव और भुखमरी ने प्रतिरोध को युद्ध से अधिक थकाया

अंग्रेजों ने इसे कैसे समाप्त किया

ब्रिटिश उपायक्या किया
सैन्य अभियानदर्रों पर कब्जा, पहाड़ी समुदायों को मैदान से काटा
हिल रेंजर्स दलपहाड़ियों को वेतनभोगी सशस्त्र बल में भर्ती किया
सरदारों को भत्तानकद भुगतान देकर सरदारों की निष्ठा खरीदी
क्लीवलैंड की समझौता नीतिपहाड़ी नेताओं को मान्यता और सीमित अधिकार
दामिन-ए-कोह सीमांकन 1832पहाड़ी क्षेत्र आरक्षित कर उसमें संथाल बसाए

परिणाम जो आगे के अध्यायों से जुड़ते हैं

  • ऑगस्टस क्लीवलैंड वह अधिकारी है जिसका नाम समझौता नीति से जुड़ा है
  • 1832 से दामिन-ए-कोह में संथालों के बसाव ने क्षेत्र की जनसंख्या संरचना बदल दी
  • यही बसाव 1855 के संथाल हूल की सीधी पृष्ठभूमि है
  • पहाड़िया और ऊपर पहाड़ों में धकेल दिए गए और सिकुड़ता अल्पसंख्यक बन गए
  • दोनों पहाड़िया समूह आज झारखंड के आदिम जनजातीय समूहों में गिने जाते हैं

याद रखने की ट्रिक — पहाड़िया विद्रोह का क्रम — लड़ाई, फिर लालच, फिर बंटवारा: पहले सैन्य अभियान, फिर क्लीवलैंड का भत्ता, फिर 1832 में दामिन-ए-कोह। तीन कदम याद रहें तो पूरा टॉपिक याद रहेगा।

यहां लोग गलती करते हैं — पहाड़िया और संथाल एक नहीं हैं, और उनका काल भी अलग है।

पहाड़िया विद्रोह और संथाल हूल एक ही आंदोलन हैं  |   पहाड़िया विद्रोह 1770-80 के दशक का, संथाल हूल 1855 का

दामिन-ए-कोह पहाड़िया के लिए बना  |   दामिन-ए-कोह में संथाल बसाए गए, पहाड़िया पहाड़ पर ही रहे

एग्जाम पॉइंटर — JPSC में यह टॉपिक प्रायः संथाल हूल से जोड़कर आता है — 'दामिन-ए-कोह का क्या परिणाम हुआ' प्रकार। JSSC CGL और JKCE में सीधा — पहाड़िया विद्रोह किस क्षेत्र का, क्लीवलैंड का संबंध किस नीति से। एक प्रश्न का पक्का दायरा है और उत्तर प्रायः राजमहल या दामिन-ए-कोह होता है।

एक नजर में

  • क्षेत्र — राजमहल पहाड़ी, वर्तमान संथाल परगना
  • समुदाय — सौरिया पहाड़िया और माल पहाड़िया
  • काल — 1770 से 1780 के दशक की शुरुआत
  • कारण — 1765 की दीवानी के बाद कंपनी का राजस्व दबाव
  • प्रमुख नाम — राजा जगन्नाथ, रमना अहाड़ी
  • ब्रिटिश उत्तर — अभियान, हिल रेंजर्स, भत्ते
  • समझौता नीति से जुड़ा अधिकारी — ऑगस्टस क्लीवलैंड
  • दामिन-ए-कोह का सीमांकन 1832 में
  • वहां संथाल बसाए गए, जिससे जनसंख्या संरचना बदली
  • यही परिवर्तन सीधे 1855 के हूल तक ले जाता है

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