चित्रकला: सोहराय और खोवर
Sohrai and Khovar Painting
सोहराय और खोवर हजारीबाग पट्टी की भित्ति चित्र परंपराएं हैं, जिन्हें महिलाएं मिट्टी की दीवारों पर प्राकृतिक मिट्टी के रंगों से बनाती हैं। दोनों को वर्ष 2020 में भौगोलिक संकेतक टैग मिला।
मुख्य जिला — हजारीबाग | निर्माता — महिलाएं | GI टैग — 2020
सोहराय चित्रकला
- दीपावली के बाद सोहराय फसल और पशु पर्व के समय बनाई जाती है
- विषय होते हैं पशु, गाय-बैल, पक्षी, वृक्ष और उर्वरता के प्रतीक
- रंग प्राकृतिक मिट्टी से आते हैं — लाल, काला, सफेद और पीली गेरू
- ताजा लिपी मिट्टी की दीवार पर कपड़े की गद्दी या टहनी की कूची से बनाई जाती है
- यह फसल और पशुओं के सम्मान से गहराई से जुड़ी है
खोवर चित्रकला
- विवाह के समय, वर-वधू के लिए तैयार कक्ष में बनाई जाती है
- नाम खो यानी कक्ष और वर यानी दूल्हा से बना है
- प्रायः एकरंगी — सफेद मिट्टी पर काली मिट्टी चढ़ाकर उसे खुरचा जाता है
- यह कूची से चित्रण नहीं, खुरचन या कंघी-कटाव की विधि है
- प्रतीक उर्वरता के होते हैं, जिनमें गर्भवती मोर सर्वाधिक शुभ माना जाता है
सोहराय और खोवर की तुलना
| बिंदु | सोहराय | खोवर |
|---|---|---|
| अवसर | दीपावली के बाद फसल और पशु पर्व | विवाह का मौसम |
| रंग | कई मिट्टी के रंग | प्रायः एकरंगी |
| तकनीक | गद्दी या टहनी की कूची से चित्रण | परत को खुरचकर या कंघी से काटकर |
| मुख्य विषय | पशु, उर्वरता और फसल | उर्वरता और मिलन |
| बनाने वाले | घर की महिलाएं | घर की महिलाएं |
राज्य की अन्य चित्र परंपराएं
- पाइतकर — पूर्वी सिंहभूम के अमादुबी गांव क्षेत्र की पट चित्रकला
- जादोपटिया — संथाल परगना पट्टी की संथाल पट चित्रकला
- उरांव और संथाल भित्तिचित्र — पठार की अन्य भित्ति चित्र परंपराएं
- पट चित्रकार परंपरागत रूप से गांव-गांव जाकर पट खोलते हुए कथा सुनाते थे
- इनमें से अधिकांश परंपराएं मां से बेटी या चित्रकार परिवार के भीतर चलती हैं
ये क्यों महत्वपूर्ण हैं
- ये भारत की उन गिनी-चुनी प्रागैतिहासिक से जुड़ी जीवित कला परंपराओं में हैं
- इसी पट्टी में इस्को की शैल कला है, जिसके प्रतीक मिलते-जुलते हैं
- 2020 के GI टैग ने सोहराय-खोवर चित्रकला को कानूनी पहचान दीबार-बार पूछा जाता है
- अब ये सार्वजनिक भवनों, रेलवे स्टेशनों और उत्पादों पर दिखती हैं
- व्यावसायिक मांग ने इस कला को मिट्टी की दीवार से कागज और कैनवास तक पहुंचाया है
ये चित्र कैसे बनते हैं
- दीवारों पर पहले मिट्टी और गोबर की ताजा लिपाई की जाती है
- रंग स्थानीय मिट्टी से पीसे जाते हैं — दुधी सफेद, गेरू लाल और काली मिट्टी
- कूची कपड़े, चबाई गई टहनी या चित्रकार की अपनी उंगलियों से बनती है
- काम पर्व के दिन से पहले पूरा होता है ताकि घर अनुष्ठान के लिए तैयार रहे
- वर्षा हर साल चित्र धो देती है, इसलिए हर मौसम में इसे फिर बनाया जाता है
- यही वार्षिक नवीनीकरण कारण है कि यह परंपरा बिना किसी औपचारिक विद्यालय के बची रही
याद रखने की ट्रिक — दो चित्रकला, दो अवसर — सोहराय फसल और पशु का, खोवर विवाह का। और एक वर्ष — GI टैग 2020।
यहां लोग गलती करते हैं — सोहराय और खोवर की तकनीक अलग है।
✗ खोवर बहुरंगी चित्रित कला है | ✓ खोवर प्रायः एकरंगी और खुरचकर बनाई जाती है; सोहराय में कई मिट्टी के रंग होते हैं
✗ पाइतकर हजारीबाग की कला है | ✓ पाइतकर पूर्वी सिंहभूम के अमादुबी क्षेत्र की है
एग्जाम पॉइंटर — JSSC CGL, JKCE और JTET में कला-जिला और GI टैग का वर्ष सीधे पूछे जाते हैं। JPSC में इसे इस्को शैल कला और जनजातीय संस्कृति की निरंतरता से जोड़कर पूछा जा सकता है। दो नाम और एक वर्ष — इतना पक्का हो तो काम हो गया।
एक नजर में
- सोहराय और खोवर — हजारीबाग पट्टी की भित्ति चित्रकला
- महिलाएं मिट्टी की दीवार पर मिट्टी के रंगों से बनाती हैं
- सोहराय — फसल और पशु पर्व के समय
- खोवर — विवाह के समय
- खोवर प्रायः एकरंगी और परत खुरचकर बनती है
- खोवर का सर्वाधिक शुभ प्रतीक — गर्भवती मोर
- GI टैग वर्ष 2020 में
- पाइतकर पट चित्रकला — अमादुबी, पूर्वी सिंहभूम
- जादोपटिया पट चित्रकला — संथाल परगना
- प्रतीक इसी पट्टी की इस्को शैल कला से मेल खाते हैं
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