पाषाण काल और प्राचीन अवशेष
पाषाण काल और प्राचीन अवशेष
छोटानागपुर पठार में प्रागैतिहासिक साक्ष्य लगातार मिलते हैं — दामोदर और स्वर्णरेखा घाटी में पुरापाषाण उपकरण, हजारीबाग पहाड़ियों में चित्रित शैलाश्रय, सिंहभूम में नवपाषाण बसाव, और पूर्वी भारत के सबसे बड़े महापाषाण समाधि स्थलों में से एक।
प्रमुख स्थल — बारूडीह (सिंहभूम), इस्को और बड़कागांव (हजारीबाग), चोकाहातू (रांची पट्टी)
पठार का प्रागैतिहासिक क्रम
- पुरापाषाण — दामोदर और स्वर्णरेखा घाटी में कोर उपकरण, हस्तकुठार और क्लीवर मिले
- मध्यपाषाण — सूक्ष्म पाषाण उपकरण और शैलाश्रय, विशेषकर हजारीबाग पहाड़ी में
- नवपाषाण — पॉलिश किए पत्थर के सेल्ट और स्थायी जीवन के संकेत, सिंहभूम और आसपास से
- ताम्रपाषाण और ताम्र निधि — सिंहभूम की तांबा पट्टी क्षेत्र को पूर्वी ताम्र निधि क्षेत्र में रखती है
- महापाषाण — खड़े पत्थर और समाधि स्थल, जो कुछ जनजातियों में आज भी जीवित परंपरा हैं
जिन स्थलों के नाम आने चाहिए
| स्थल | जिला पट्टी | किसके लिए प्रसिद्ध |
|---|---|---|
| बारूडीह | पश्चिमी सिंहभूम | नवपाषाण उपकरण और महापाषाण अवशेष |
| इस्को | हजारीबाग (बड़कागांव) | प्रागैतिहासिक चित्रों वाला शैलाश्रय |
| चोकाहातू | रांची पट्टी (तमाड़ ओर) | बहुत बड़ा महापाषाण समाधि स्थल |
| दामोदर घाटी | उत्तरी छोटानागपुर | पुरापाषाण उपकरण समूह |
| सिंहभूम ताम्र पट्टी | पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम | प्रारंभिक धातु प्रयोग और तांबा कार्य |
झारखंड में महापाषाण क्यों महत्वपूर्ण हैं
- यहां महापाषाण केवल पुरातत्व नहीं हैं — कई जनजातियां आज भी स्मृति-पत्थर खड़े करती हैं
- मुंडा परंपरा का ससनदिरी (समाधि पत्थर) जीवित गांव को पूर्वज-गोत्र से जोड़ता है
- चोकाहातू को पूर्वी भारत के सबसे बड़े महापाषाण समाधि स्थलों में गिना जाता है
- यह प्रथा जनजातीय भूमि-दावे को कागजी अधिकार से नहीं, वंश-परंपरा से जोड़ती है
- इसी निरंतरता के कारण झारखंड के महापाषाण विरासत और संरक्षण की बहस में आते हैं
हजारीबाग पट्टी की शैल कला
- बड़कागांव और इस्को क्षेत्र के शैलाश्रयों में पशु, आखेट और नृत्य की आकृतियां चित्रित हैं
- चित्र प्रायः लाल गेरू और सफेद रंगों में हैं
- ये स्थल आधुनिक कोयला खनन क्षेत्र के पास हैं, इसलिए संरक्षण एक जीवंत मुद्दा है
- इसी पट्टी में जीवित खोवर और सोहराय भित्ति चित्र परंपरा है, जो प्रागितिहास से आज तक की अटूट कड़ी बनाती है
क्षेत्र के प्राचीन उल्लेख
- प्राचीन ग्रंथ पूर्वी वन क्षेत्रों को आटविक अर्थात वनवासी जनों का निवास बताते हैं
- समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में वन राज्यों (आटविक राज्य) को अधीन करने का उल्लेख है
- झारखंड नाम मध्यकालीन ताम्रपत्रों और अभिलेखों में मिलता है, प्राचीनतम ग्रंथों में नहीं
- यह क्षेत्र कभी किसी बड़े प्राचीन साम्राज्य का केंद्र नहीं रहा — यह संसाधन और सीमांत क्षेत्र था
- वर्तमान झारखंड के भीतर कोई अशोक का अभिलेख नहीं मिला, जो पेपर का पसंदीदा नकारात्मक तथ्य है
याद रखने की ट्रिक — तीन नाम याद रखें — बा-इ-चो: बारूडीह (नवपाषाण, सिंहभूम), इस्को (शैल कला, हजारीबाग), चोकाहातू (महापाषाण, रांची पट्टी)। तीनों अलग काल और अलग जिला — प्रश्न इसी तरह बनता है।
यहां लोग गलती करते हैं — शैल कला और महापाषाण अलग चीजें हैं।
✗ चोकाहातू शैल चित्रों के लिए प्रसिद्ध है | ✓ चोकाहातू महापाषाण समाधि स्थल है; शैल कला का स्थल इस्को है
✗ अशोक का अभिलेख झारखंड में मिला है | ✓ वर्तमान झारखंड के भीतर कोई अशोक अभिलेख नहीं मिला
एग्जाम पॉइंटर — JPSC प्रारंभिक में इस टॉपिक से स्थल-जिला मिलान आता है और मुख्य परीक्षा में जनजातीय निरंतरता के कोण से। JSSC CGL और JKCE में केवल नाम पूछे जाते हैं — कौन-सा स्थल किसके लिए प्रसिद्ध है। अधिक गहराई में न जाएं, नाम और जिला पक्का कर लें।
एक नजर में
- पुरापाषाण उपकरण — दामोदर और स्वर्णरेखा घाटी
- मध्यपाषाण शैलाश्रय — हजारीबाग पहाड़ी
- नवपाषाण और महापाषाण — बारूडीह, पश्चिमी सिंहभूम
- शैल कला — इस्को, बड़कागांव, हजारीबाग
- महापाषाण समाधि स्थल — चोकाहातू
- मुंडा स्मृति पत्थर — ससनदिरी
- ताम्र पट्टी — सिंहभूम
- समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में वन राज्य
- झारखंड में कोई अशोक अभिलेख नहीं मिला
- शैल कला पट्टी आधुनिक कोयला क्षेत्र से सटी है
