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पाषाण काल और प्राचीन अवशेष

By ExamAtlas · 19/9/2026

पाषाण काल और प्राचीन अवशेष

छोटानागपुर पठार में प्रागैतिहासिक साक्ष्य लगातार मिलते हैं — दामोदर और स्वर्णरेखा घाटी में पुरापाषाण उपकरण, हजारीबाग पहाड़ियों में चित्रित शैलाश्रय, सिंहभूम में नवपाषाण बसाव, और पूर्वी भारत के सबसे बड़े महापाषाण समाधि स्थलों में से एक।

प्रमुख स्थल — बारूडीह (सिंहभूम), इस्को और बड़कागांव (हजारीबाग), चोकाहातू (रांची पट्टी)

पठार का प्रागैतिहासिक क्रम

  • पुरापाषाणदामोदर और स्वर्णरेखा घाटी में कोर उपकरण, हस्तकुठार और क्लीवर मिले
  • मध्यपाषाण — सूक्ष्म पाषाण उपकरण और शैलाश्रय, विशेषकर हजारीबाग पहाड़ी में
  • नवपाषाण — पॉलिश किए पत्थर के सेल्ट और स्थायी जीवन के संकेत, सिंहभूम और आसपास से
  • ताम्रपाषाण और ताम्र निधि — सिंहभूम की तांबा पट्टी क्षेत्र को पूर्वी ताम्र निधि क्षेत्र में रखती है
  • महापाषाण — खड़े पत्थर और समाधि स्थल, जो कुछ जनजातियों में आज भी जीवित परंपरा हैं

जिन स्थलों के नाम आने चाहिए

स्थलजिला पट्टीकिसके लिए प्रसिद्ध
बारूडीहपश्चिमी सिंहभूमनवपाषाण उपकरण और महापाषाण अवशेष
इस्कोहजारीबाग (बड़कागांव)प्रागैतिहासिक चित्रों वाला शैलाश्रय
चोकाहातूरांची पट्टी (तमाड़ ओर)बहुत बड़ा महापाषाण समाधि स्थल
दामोदर घाटीउत्तरी छोटानागपुरपुरापाषाण उपकरण समूह
सिंहभूम ताम्र पट्टीपूर्वी और पश्चिमी सिंहभूमप्रारंभिक धातु प्रयोग और तांबा कार्य

झारखंड में महापाषाण क्यों महत्वपूर्ण हैं

  • यहां महापाषाण केवल पुरातत्व नहीं हैं — कई जनजातियां आज भी स्मृति-पत्थर खड़े करती हैं
  • मुंडा परंपरा का ससनदिरी (समाधि पत्थर) जीवित गांव को पूर्वज-गोत्र से जोड़ता है
  • चोकाहातू को पूर्वी भारत के सबसे बड़े महापाषाण समाधि स्थलों में गिना जाता है
  • यह प्रथा जनजातीय भूमि-दावे को कागजी अधिकार से नहीं, वंश-परंपरा से जोड़ती है
  • इसी निरंतरता के कारण झारखंड के महापाषाण विरासत और संरक्षण की बहस में आते हैं

हजारीबाग पट्टी की शैल कला

  • बड़कागांव और इस्को क्षेत्र के शैलाश्रयों में पशु, आखेट और नृत्य की आकृतियां चित्रित हैं
  • चित्र प्रायः लाल गेरू और सफेद रंगों में हैं
  • ये स्थल आधुनिक कोयला खनन क्षेत्र के पास हैं, इसलिए संरक्षण एक जीवंत मुद्दा है
  • इसी पट्टी में जीवित खोवर और सोहराय भित्ति चित्र परंपरा है, जो प्रागितिहास से आज तक की अटूट कड़ी बनाती है

क्षेत्र के प्राचीन उल्लेख

  • प्राचीन ग्रंथ पूर्वी वन क्षेत्रों को आटविक अर्थात वनवासी जनों का निवास बताते हैं
  • समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में वन राज्यों (आटविक राज्य) को अधीन करने का उल्लेख है
  • झारखंड नाम मध्यकालीन ताम्रपत्रों और अभिलेखों में मिलता है, प्राचीनतम ग्रंथों में नहीं
  • यह क्षेत्र कभी किसी बड़े प्राचीन साम्राज्य का केंद्र नहीं रहा — यह संसाधन और सीमांत क्षेत्र था
  • वर्तमान झारखंड के भीतर कोई अशोक का अभिलेख नहीं मिला, जो पेपर का पसंदीदा नकारात्मक तथ्य है

याद रखने की ट्रिक — तीन नाम याद रखें — बा-इ-चो: बारूडीह (नवपाषाण, सिंहभूम), स्को (शैल कला, हजारीबाग), चोकाहातू (महापाषाण, रांची पट्टी)। तीनों अलग काल और अलग जिला — प्रश्न इसी तरह बनता है।

यहां लोग गलती करते हैं — शैल कला और महापाषाण अलग चीजें हैं।

चोकाहातू शैल चित्रों के लिए प्रसिद्ध है  |   चोकाहातू महापाषाण समाधि स्थल है; शैल कला का स्थल इस्को है

अशोक का अभिलेख झारखंड में मिला है  |   वर्तमान झारखंड के भीतर कोई अशोक अभिलेख नहीं मिला

एग्जाम पॉइंटर — JPSC प्रारंभिक में इस टॉपिक से स्थल-जिला मिलान आता है और मुख्य परीक्षा में जनजातीय निरंतरता के कोण से। JSSC CGL और JKCE में केवल नाम पूछे जाते हैं — कौन-सा स्थल किसके लिए प्रसिद्ध है। अधिक गहराई में न जाएं, नाम और जिला पक्का कर लें।

एक नजर में

  • पुरापाषाण उपकरण — दामोदर और स्वर्णरेखा घाटी
  • मध्यपाषाण शैलाश्रय — हजारीबाग पहाड़ी
  • नवपाषाण और महापाषाण — बारूडीह, पश्चिमी सिंहभूम
  • शैल कला — इस्को, बड़कागांव, हजारीबाग
  • महापाषाण समाधि स्थल — चोकाहातू
  • मुंडा स्मृति पत्थर — ससनदिरी
  • ताम्र पट्टी — सिंहभूम
  • समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में वन राज्य
  • झारखंड में कोई अशोक अभिलेख नहीं मिला
  • शैल कला पट्टी आधुनिक कोयला क्षेत्र से सटी है

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