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ताना भगत आंदोलन

By ExamAtlas · 19/9/2026

ताना भगत आंदोलन

ताना भगत आंदोलन 1914 में छोटानागपुर पठार के उरांव समुदाय में जतरा भगत के नेतृत्व में शुरू हुआ। इसने धार्मिक शुद्धिकरण को करों और बेगारी के अहिंसक इनकार से जोड़ा, और बाद में गांधी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन में मिल गया।

शुरुआत — 1914 | संस्थापक — जतरा भगत (जतरा उरांव) | समुदाय — उरांव | पद्धति — अहिंसा

उद्भव

  • 1914 में पठार के गुमला और बिशुनपुर वाले हिस्से में शुरुआतबार-बार पूछा जाता है
  • संस्थापक — जतरा भगत, जिन्हें जतरा उरांव भी कहते हैं
  • समुदाय — उरांव, जिनकी भाषा कुड़ुख है
  • ताना शब्द भूत-प्रेत पूजा और अशुद्धि से खिंचकर अलग होने के भाव से जुड़ा है
  • यह उरांवों के बीच पहले से चल रही भगत सुधार धारा से निकला

ताना भगत संहिता

  • शराब, मांस और पशु बलि का त्याग
  • भूत-प्रेत की पूजा बंद; एक ईश्वर धर्मेस की उपासना
  • अवैध उपकर और बेगारी यानी बिना मजदूरी के जबरन श्रम से इनकार
  • अन्यायपूर्ण शर्तों पर भूस्वामियों के लिए मजदूरी करने से इनकार
  • अहिंसा का पालन — आंदोलन शुरू से ही अहिंसक था
  • सादा वस्त्र और अनुशासित दैनिक आचरण

जनजातीय सुधार से राष्ट्रीय आंदोलन तक

चरणक्या हुआ
1914 सेजतरा भगत का सुधार और बेगारी-इनकार का प्रचार
युद्ध के वर्षनेता गिरफ्तार; आंदोलन नए चेहरों के साथ जारी
1920 सेताना भगत असहयोग आंदोलन में शामिल
गांधीवादी चरणखादी, चरखा और तिरंगे को अपनाया
स्वतंत्रता के बादअलग पहचान वाले समुदाय के रूप में भूमि दावे

यह क्यों महत्वपूर्ण है

  • यह गांधी के जन-आंदोलनों से पहले अहिंसा अपनाने वाले जनजातीय आंदोलन का स्पष्टतम उदाहरण है
  • यह झारखंड की जनजातीय राजनीति को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ता है
  • ताना भगत औपनिवेशिक सरकार को कर देने से इनकार के लिए याद किए जाते हैं
  • समुदाय ने बाद में आंदोलन वर्षों में खोई भूमि की वापसी की मांग रखी
  • यह दिखाता है कि सुधार, आर्थिक इनकार और राष्ट्रवाद एक ही आंदोलन में साथ आए

नाम और शब्द

  • जतरा भगत — संस्थापक, 1914
  • धर्मेस — उरांव विश्वास में सर्वोच्च ईश्वर
  • बेगारी — बिना मजदूरी का जबरन श्रम, केंद्रीय शिकायत
  • कुड़ुख — उरांव समुदाय की भाषा
  • तुरिया भगत, देवमनिया और सिबू भगत — बाद के नेताओं के रूप में आने वाले नाम

1914 से पहले की भगत धारा

  • उरांव समाज में उन्नीसवीं सदी में ही भगत कहलाने वाले सुधारक प्रचारक आ चुके थे
  • कबीरपंथी और बछिदान जैसी पूर्व धाराएं शाकाहार और संयम पर बल देती थीं
  • ये सुधारक भूत-प्रेत पूजा और बलि के खर्च को अस्वीकार करते थे
  • ताना भगत आंदोलन वह बिंदु है जहां यह सुधार धारा राजनीतिक बन जाती है
  • इसीलिए उत्तर में इसे केवल विद्रोह नहीं, सामाजिक-धार्मिक आंदोलन कहना चाहिए
  • यही बताता है कि आंदोलन इतनी तेजी से क्यों फैला — जमीन पहले से तैयार थी

याद रखने की ट्रिक — ताना भगत का 1-9-1-4 जोड़ — 1914 में जतरा, 1920 में गांधी के साथ। और तीन इनकार — शराब नहीं, बेगारी नहीं, हिंसा नहीं

यहां लोग गलती करते हैं — ताना भगत और बिरसाइत दोनों सुधार-आंदोलन हैं पर समुदाय अलग है।

ताना भगत मुंडा आंदोलन था  |   ताना भगत उरांव आंदोलन है; बिरसाइत मुंडा का है

ताना भगत आंदोलन गांधी के बाद शुरू हुआ  |   ताना भगत 1914 में शुरू हुआ, असहयोग आंदोलन से पहले

एग्जाम पॉइंटर — JPSC में यह टॉपिक दो रूपों में आता है — जनजातीय सुधार आंदोलन के रूप में, और राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने वाले प्रश्न में। JSSC CGL, JTGLCCE और JTET में सीधा — ताना भगत किस समुदाय का, संस्थापक कौन, वर्ष कौन-सा। तीन बिंदु पक्के, प्रश्न पक्का।

एक नजर में

  • शुरुआत — 1914
  • संस्थापक — जतरा भगत (जतरा उरांव)
  • समुदाय — उरांव, भाषा कुड़ुख
  • क्षेत्र — गुमला, बिशुनपुर, लोहरदगा पट्टी
  • उपास्य — धर्मेस
  • इनकार — शराब, मांस, बेगारी, अवैध उपकर
  • पद्धति — अहिंसा
  • 1920 से असहयोग आंदोलन में शामिल
  • खादी, चरखा और तिरंगा अपनाया
  • बाद में खोई भूमि की वापसी की मांग

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