तिल्का मांझी
तिल्का मांझी
तिल्का मांझी झारखंड में कंपनी शासन के विरुद्ध जनजातीय प्रतिरोध के सबसे पहले शहीद माने जाते हैं। परंपरा उनके विद्रोह को 1784 में राजमहल और भागलपुर पट्टी में रखती है और उनकी फांसी जनवरी 1785 में भागलपुर में बताती है।
अन्य नाम जबरा पहाड़िया | क्षेत्र — राजमहल पहाड़ी और भागलपुर | फांसी — भागलपुर, जनवरी 1785
वे कौन थे
- लोक परंपरा में तिल्का मांझी के नाम से, जबरा पहाड़िया भी कहे जाते हैं
- राजमहल पहाड़ी और तिलापुर वन क्षेत्र से जुड़े हुए
- कंपनी के राजस्व अधिकारियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध पहाड़ी तथा वन समुदायों का नेतृत्व किया
- इस पट्टी में कंपनी सत्ता को पहली संगठित जनजातीय चुनौती के रूप में याद किए जाते हैं
- भागलपुर का विश्वविद्यालय उनके नाम पर है, जिससे यह नाम करेंट अफेयर्स में बना रहता है
उनके बारे में क्या कहा जाता है
- कंपनी की चौकियों, खजाने और सहयोगी जमींदारों के अनाज पर हमले किए
- परंपरा के अनुसार 1784 में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड को घायल किया
- वन और पहाड़ की आड़ लेकर छापामार पद्धति से लड़े
- लंबे पीछा के बाद पकड़े गए और भागलपुर लाए गए
- जनवरी 1785 में फांसी, परंपरा के अनुसार बरगद के पेड़ से लटकाकरबार-बार पूछा जाता है
साक्ष्य पर एक ईमानदार टिप्पणी
- लोक और राज्य विवरण तिल्का मांझी तथा जबरा पहाड़िया को एक ही व्यक्ति मानते हैं
- कुछ इतिहासकार इस पहचान पर प्रश्न उठाते हैं और समकालीन अभिलेखों की कमी बताते हैं
- 1785 में भागलपुर में फांसी वह विवरण है जो सबसे लगातार दोहराया जाता है
- परीक्षा के लिए मानक संस्करण लिखें, पर अपनी ओर से कोई अतिरिक्त तिथि न गढ़ें
- इस बहस की जानकारी मुख्य परीक्षा के उत्तर में उपयोगी है, प्रारंभिक के विकल्प में नहीं
वे क्यों महत्वपूर्ण हैं
| पहलू | महत्व |
|---|---|
| कालक्रम | कोल, भूमिज और संथाल विद्रोहों से पहले |
| लक्ष्य | कंपनी की राजस्व व्यवस्था और स्थानीय सहयोगी |
| पद्धति | पहाड़ और वन से छापामार प्रतिरोध |
| स्मृति | क्षेत्र के प्रथम जनजातीय शहीद माने जाते हैं |
| विरासत | उनके नाम पर संस्थान और राजकीय स्मरण |
विद्रोहों के क्रम में उनका स्थान
- पहाड़िया विद्रोह — 1770 से 1780 के दशक की शुरुआत, राजमहल के पहाड़ी सरदार
- तिल्का मांझी — 1784 से 1785, वही पट्टी, एक स्मरणीय नेता
- चुआर विद्रोह — अठारहवीं सदी का उत्तरार्ध, जंगल महाल की ओर
- कोल विद्रोह — 1831 से 1832, छोटानागपुर का केंद्र
- संथाल हूल — 1855 से 1856, संथाल परगना
इस काल से जुड़े शब्द
- दामिन-ए-कोह — राजमहल पट्टी का आरक्षित पहाड़ी क्षेत्र
- हिल रेंजर्स — कंपनी द्वारा पहाड़ी समुदायों से बनाया गया सशस्त्र दल
- सरदार — पहाड़ी प्रधान, जिन्हें अंग्रेजों ने भत्ते देकर अपने पक्ष में किया
- दीवानी — 1765 का वह अधिकार जिसने कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा का राजस्व दिया
- जंगल महाल — पूर्व का वन क्षेत्र जहां चुआर विद्रोह चला
याद रखने की ट्रिक — दो साल का जोड़ — 84 में हमला, 85 में फांसी। स्थान का जोड़ — राजमहल में लड़ाई, भागलपुर में अंत। इससे अधिक तिथि याद करने की जरूरत नहीं।
यहां लोग गलती करते हैं — तिल्का मांझी संथाल हूल के नेता नहीं थे।
✗ तिल्का मांझी ने 1855 का संथाल हूल चलाया | ✓ हूल के नेता सिदो-कान्हू थे; तिल्का मांझी 1784-85 के हैं
✗ तिल्का मांझी कोल विद्रोह के नेता थे | ✓ कोल विद्रोह के नेता बुधु भगत थे
एग्जाम पॉइंटर — JSSC CGL, JTGLCCE और झारखंड पुलिस में यह नाम सीधा पूछा जाता है — सबसे पहला आदिवासी शहीद कौन। JPSC इसे विद्रोहों के क्रम में रखकर पूछता है, इसलिए पहले-बाद का क्रम पक्का करें। एक गलत क्रम पूरे कालक्रम प्रश्न को डुबा देता है।
एक नजर में
- अन्य नाम — जबरा पहाड़िया
- क्षेत्र — राजमहल पहाड़ी और भागलपुर
- ऑगस्टस क्लीवलैंड पर हमला 1784 में बताया जाता है
- फांसी — भागलपुर, जनवरी 1785
- पद्धति — पहाड़ और वन से छापामार प्रतिरोध
- क्षेत्र के प्रथम जनजातीय शहीद माने जाते हैं
- भागलपुर का विश्वविद्यालय उनके नाम पर
- कोल, भूमिज और संथाल विद्रोह से पहले आते हैं
- जबरा पहाड़िया से पहचान पर कुछ इतिहासकारों को संदेह है
- सुरक्षित उत्तर — 1784 विद्रोह, 1785 फांसी
