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जनजातीय समाज और शासन व्यवस्था

By ExamAtlas · 19/9/2026

जनजातीय समाज और शासन व्यवस्था

झारखंड के जनजातीय गांवों की अपनी शासन संस्थाएं हैं जो राज्य से भी पुरानी हैं। मुंडा और हो की मुंडा-मानकी व्यवस्था तथा संथालों की मांझी-परगना व्यवस्था आज भी भूमि, अनुष्ठान और विवाद के मामले तय करती हैं।

मुंडा और हो — मुंडा-मानकी व्यवस्था | संथाल — मांझी-परगना व्यवस्था | उरांव — पड़हा पंचायत

पारंपरिक व्यवस्थाएं

व्यवस्थासमुदायग्राम प्रमुखगांव से ऊपर
मुंडा-मानकीमुंडा और होमुंडामानकी, कई गांवों का प्रमुख
मांझी-परगनासंथालमांझीपरगनैत, कई गांवों पर
पड़हा पंचायतउरांवमहतो और पाहनपड़हा, गांवों की परिषद
डोकलो सोहोरहो परंपरागांव के बुजुर्गक्षेत्रीय सभा

ग्राम पद और उनका काम

  • मुंडा या मांझी — गांव का लौकिक प्रमुख, भूमि और विवाद देखता है
  • पाहन — गांव का पुजारी, जो सरना के अनुष्ठान कराता है
  • नायकी — संथाल गांवों में सहायक पुजारी
  • जोग मांझी — गांव के युवाओं के आचरण का संरक्षक
  • परानिक — मांझी का उप-प्रमुख
  • कोटवार या गोड़ैत — ग्राम संदेशवाहक, जो सभा बुलाता है

अनुष्ठान और सामाजिक स्थल

  • सरना — वह पवित्र स्थल जहां ग्राम देवताओं की पूजा होती है
  • अखरा — गांव का नृत्य स्थल, जहां बैठकें भी होती हैं
  • धुमकुड़िया — उरांव की पारंपरिक युवा गृह संस्था
  • गितिओड़ा — मुंडा समाज की समकक्ष संस्था
  • ये स्थल युवाओं को गीत, नृत्य, श्रम और सामुदायिक नियम सिखाते हैं
  • शिक्षा, पलायन और बदलती बसाहट से इनमें से कई कमजोर पड़े हैं

ये व्यवस्थाएं कैसे चलती हैं

  • निर्णय ग्रामीणों की सभा में होते हैं, अकेले प्रमुख द्वारा नहीं
  • भूमि के प्रश्न कागजी अधिकार नहीं, गोत्र और वंश के संदर्भ से तय होते हैं
  • विवाद चर्चा, क्षतिपूर्ति और सामाजिक दंड से सुलझाए जाते हैं
  • प्रमुख के पास माझीहस जैसी पद-भूमि होती है, निजी संपत्ति नहीं
  • इस व्यवस्था को CNT और SPT अधिनियम तथा PESA से कानूनी सम्मान मिला है
  • निर्वाचित पंचायत और पारंपरिक प्रमुख कभी-कभी टकराते भी हैं

पूछे जाने वाले बिंदु

  • मुंडा और हो की व्यवस्था — मुंडा-मानकीबार-बार पूछा जाता है
  • संथालों की व्यवस्था — मांझी-परगना
  • गांव का पुजारी — पाहन
  • उरांव का युवा गृह — धुमकुड़िया
  • गांव का नृत्य स्थल — अखरा

नातेदारी और सामाजिक संगठन

  • समाज गोत्रों में बंटा है, जिन्हें मुंडा और उरांव में किली तथा संथालों में पारिस कहते हैं
  • एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है, जिससे गांव आपस में जुड़े रहते हैं
  • वंश और उत्तराधिकार सामान्यतः पुरुष वंश से चलते हैं
  • गोत्र चिह्न — प्रायः कोई पशु, पक्षी या पौधा — अनुष्ठानिक निषेध साथ लाते हैं
  • ससनदिरी जैसे स्मृति पत्थर गोत्र की समाधि भूमि को चिह्नित करते हैं
  • चरम मौसम में सामूहिक श्रम दल बारी-बारी से एक-दूसरे के खेत में काम करते हैं

हाल के दशकों में बदलाव

  • पलायन और मजदूरी ने युवा गृह की व्यवस्था को कमजोर किया है
  • निर्वाचित पंचायतें अब वह अधिकार साझा करती हैं जो पहले केवल पारंपरिक प्रमुख के पास था
  • कागजी भूमि अभिलेख स्मृति आधारित गोत्र दावों पर भारी पड़ते जा रहे हैं
  • फिर भी अधिकांश ग्रामीण पहला मंच पारंपरिक प्रमुख को ही मानते हैं

याद रखने की ट्रिक — दो व्यवस्था, दो समुदाय — मुंडा-मानकी = मुंडा और हो, मांझी-परगना = संथाल। और दो स्थल — सरना पूजा का, अखरा नृत्य का

यहां लोग गलती करते हैं — मुंडा एक जनजाति भी है और एक पद भी।

मुंडा का अर्थ केवल जनजाति है  |   मुंडा जनजाति भी है और उस व्यवस्था में ग्राम प्रमुख की उपाधि भी

पाहन गांव का प्रशासनिक प्रमुख होता है  |   पाहन पुजारी है; प्रशासनिक प्रमुख मुंडा या मांझी है

एग्जाम पॉइंटर — JSSC CGL, JTGLCCE, JKCE और JTET में पद-समुदाय मिलान सीधा आता है — पाहन, मांझी, मानकी, परगनैत। JPSC में परंपरा और PESA के संबंध पर मुख्य परीक्षा का प्रश्न बनता है। यह टॉपिक झारखंड का सबसे विशिष्ट भाग है, इसलिए इसे ध्यान से रटें।

एक नजर में

  • मुंडा-मानकी — मुंडा और हो की व्यवस्था
  • मांझी-परगना — संथाल की व्यवस्था
  • पड़हा पंचायत — उरांव की ग्राम परिषद
  • पाहन — गांव का पुजारी
  • जोग मांझी — युवा आचरण का संरक्षक
  • परानिक — मांझी का उप-प्रमुख
  • सरना — पवित्र स्थल | अखरा — नृत्य स्थल
  • धुमकुड़िया — उरांव युवा गृह
  • गितिओड़ा — मुंडा युवा संस्था
  • CNT, SPT और PESA से कानूनी मान्यता

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