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1991 का संकट और सुधार

By ExamAtlas · 18/9/2026

NCERT कक्षा 11 • Indian Economic Development • अध्याय "Liberalisation Privatisation and Globalisation"

1991 का संकट और सुधार

1991 तक भारत गंभीर भुगतान संतुलन संकट में पहुंच गया। विदेशी मुद्रा भंडार उस स्तर तक गिर गया था जिससे केवल कुछ सप्ताह के आयात चुक सकते थे, राजकोषीय घाटा ऊंचा था, मुद्रास्फीति बढ़ रही थी, और सरकार को सहायता लेनी पड़ी, जो संरचनात्मक सुधार की शर्तों के साथ आई।

संकट क्यों आया

  • सरकारी व्यय राजस्व से कहीं तेजी से बढ़ा था, इसलिए उधारी और ब्याज भुगतान लगातार बढ़ते गए।
  • सार्वजनिक उपक्रम वह अधिशेष नहीं दे रहे थे जिसकी उनसे अपेक्षा थी।
  • आयात निर्यात से तेजी से बढ़े, इसलिए चालू खाता घाटा चौड़ा हुआ।
  • खाड़ी संकट ने तेल कीमतें बढ़ाईं और विदेश में कार्यरत भारतीयों से आने वाला प्रेषण घटाया।
  • विदेशी मुद्रा भंडार इतना गिर गया कि भारत अनिवार्य आयात भी वित्तपोषित नहीं कर पा रहा था।
  • देश ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से उधार लिया और सुधार कार्यक्रम पर सहमति दी।
  • निर्यात सस्ता और आयात महंगा करने के लिए रुपये का अवमूल्यन किया गया।
  • संकट ने स्पष्ट कर दिया कि पुराना अंतर्मुखी मॉडल अपरिवर्तित रूप में चलाया नहीं जा सकता।

उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण

  • उदारीकरण का अर्थ था अधिकांश उद्योगों से लाइसेंस की आवश्यकता हटाना, कीमतें मुक्त करना, आयात प्रतिबंध ढीले करना और वित्तीय क्षेत्र खोलना।
  • केवल एक छोटी सूची के उद्योग लाइसेंस के अधीन रहे, अधिकतर सुरक्षा, स्वास्थ्य या पर्यावरण कारणों से।
  • निजीकरण का अर्थ था सरकारी हिस्सेदारी का कुछ या पूरा भाग बेचकर सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका घटाना, जिसे विनिवेश कहते हैं।
  • कुछ हानि वाली इकाइयां बंद या पुनर्गठित की गईं, और सार्वजनिक उपक्रमों को अधिक स्वायत्तता दी गई।
  • वैश्वीकरण का अर्थ था व्यापार, पूंजी और तकनीक के प्रवाह से भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था में जोड़ना।
  • प्रशुल्क घटाए गए, अधिक क्षेत्रों में विदेशी निवेश की अनुमति मिली, और रुपया चालू खाते पर परिवर्तनीय बनाया गया।
  • आउटसोर्सिंग बढ़ी क्योंकि भारतीय फर्में विदेश स्थित कंपनियों को सेवाएं देने लगीं।
  • वित्तीय क्षेत्र सुधार ने निजी बैंकों को अनुमति दी और पूंजी बाजार को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के लिए खोला।
सुधारमुख्य सामग्री
उदारीकरणलाइसेंस की समाप्ति, मुक्त कीमत और आयात
निजीकरणविनिवेश और सार्वजनिक उपक्रम को स्वायत्तता
वैश्वीकरणकम प्रशुल्क, विदेशी निवेश, एकीकरण

विनिवेश — किसी सार्वजनिक उपक्रम में सरकार की अंश पूंजी का कुछ या पूरा भाग बेचना।

Exam me kaise aata hai

  • 1991 का संकट किसका संकट था — भुगतान संतुलन
  • सार्वजनिक उपक्रम में सरकारी हिस्सेदारी बेचना — विनिवेश
  • अधिकांश उद्योगों से लाइसेंस हटाना किसका भाग है — उदारीकरण
  • विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ना कहलाता है — वैश्वीकरण

UPSC/State PSC ke liye

  • यह संकट भंडार की स्टॉक समस्या थी जो निरंतर घाटों की प्रवाह समस्या से बनी थी, इसीलिए सुधार को व्यापार और राजकोषीय दोनों पक्ष संभालने पड़े।
  • चालू खाता परिवर्तनीयता व्यापार के लिए मुक्त विनिमय देती है, जबकि पूंजी खाता परिवर्तनीयता, जो अलग है, क्रमशः ही खोली गई।

Yahan confuse hote hain

1991 का संकट केवल खाड़ी युद्ध से आया | खाड़ी संकट कारण बना; गहरे कारण घाटे और ऋण थे  |  

उदारीकरण ने सारा लाइसेंस समाप्त कर दिया | उद्योगों की एक छोटी सूची लाइसेंस के अधीन रही  |  

निजीकरण और विनिवेश असंबंधित हैं | विनिवेश निजीकरण का मुख्य साधन है  |  

Ek nazar me

  • 1991 में भुगतान संतुलन संकट आया और भंडार लगभग समाप्त था।
  • कारण: बढ़ते घाटे, कमजोर निर्यात, तेल कीमत वृद्धि और घटा प्रेषण।
  • उदारीकरण ने लाइसेंस हटाए तथा कीमत और आयात मुक्त किए।
  • निजीकरण ने विनिवेश अपनाया; वैश्वीकरण ने प्रशुल्क घटाए और निवेश खोला।

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