भक्ति आंदोलन: दक्षिण की जड़ें
NCERT Class 7 - Our Pasts II • NCERT Class 12 - Themes in Indian History Part II, Chapter 6
भक्ति आंदोलन: दक्षिण की जड़ें
भक्ति आंदोलन छठी से नौवीं शताब्दी के बीच तमिल क्षेत्र में शुरू हुआ, जहां संत-कवियों ने स्थानीय भाषा में सगुण ईश्वर के गीत गाए। वहां से यह दक्षिण में दर्शन के माध्यम से आगे बढ़ा और कई शताब्दियों बाद उत्तर पहुंचा।
आलवार और नयनार
- आलवार विष्णु के भक्त थे, परंपरा के अनुसार संख्या में बारह; नयनार शिव के भक्त थे, परंपरा के अनुसार तिरसठ।
- ये तीर्थ-तीर्थ घूमकर तमिल में गाते थे, और उनके गीत बाद में संकलित हुए - आलवार भजन नालायिर दिव्य प्रबंधम् में और नयनार भजन तेवारम् तथा व्यापक तिरुमुरै में।
- ये सभी जातियों से आते थे, जिनमें शिल्पी, कृषक और अस्पृश्य माने गए समुदाय भी शामिल थे।
- आलवार संत आंडाल और नयनार संत कारैक्काल अम्मैयार दिखाती हैं कि इस परंपरा में स्त्रियों को स्थान मिला।
- इनका विरोध कर्मकांडीय औपचारिकता के साथ-साथ बौद्ध और जैन मतों के प्रति भी था, जो तमिल क्षेत्र में इसी कारण पीछे हटे।
दार्शनिक
| दार्शनिक | संप्रदाय | मूल विचार |
|---|---|---|
| शंकराचार्य | अद्वैत | केवल ब्रह्म सत्य है; दृश्य जगत माया है |
| रामानुज | विशिष्टाद्वैत | सविशेष अद्वैत; आत्मा सत्य है पर ईश्वर का अंश |
| मध्व | द्वैत | ईश्वर और आत्मा सदा भिन्न हैं |
| निंबार्क | द्वैताद्वैत | भेद और अभेद दोनों साथ |
| वल्लभ | शुद्धाद्वैत | शुद्ध अद्वैत; अनुग्रह का पुष्टिमार्ग |
- शंकराचार्य केरल से थे, उन्होंने ज्ञान को मुक्ति का मार्ग बताया और भारत के चारों कोनों में मठ स्थापित किए।
- रामानुज ने भक्ति को बौद्धिक आधार दिया, यह मानकर कि आत्मा ईश्वर पर आश्रित होते हुए भी सत्य और भिन्न है - यही आगे की अधिकांश भक्ति का दार्शनिक आधार बना।
- रामानुज परंपरा के रामानंद भक्ति को उत्तर भारत ले गए और सभी जातियों से शिष्य बनाए, जो दक्षिणी और उत्तरी आंदोलन के बीच सेतु है।
वीरशैव और महाराष्ट्र
- वीरशैव या लिंगायत आंदोलन बारहवीं शताब्दी के कर्नाटक में बसवन्ना के नेतृत्व में शुरू हुआ।
- अनुयायी शरीर पर लिंग धारण करते थे, मंदिर कर्मकांड तथा ब्राह्मण सत्ता को अस्वीकार करते थे, और जाति भेद तथा पुनर्जन्म की धारणा नकारते थे।
- इन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया, जो उल्लेखनीय रूप से प्रारंभिक स्थिति है।
- इनकी रचनाएं वचन हैं, जो कन्नड़ में छोटे गद्य-काव्य हैं; अक्का महादेवी इनमें सबसे प्रसिद्ध स्त्री संत हैं।
- महाराष्ट्र में पंढरपुर के विट्ठल पर केंद्रित वारकरी परंपरा ने ज्ञानेश्वर दिए, जिनकी ज्ञानेश्वरी गीता पर मराठी भाष्य है, तथा नामदेव, एकनाथ, चोखामेला और तुकाराम, जिनके अभंग आज भी गाए जाते हैं।
- चोखामेला महार समुदाय से थे, और उनके गीत सीधे बहिष्कार की बात करते हैं।
परीक्षा में कैसे आता है
दार्शनिक और संप्रदाय का सुमेलित कीजिए लगभग निश्चित है, वैसे ही आलवार-विष्णु और नयनार-शिव। तथ्यात्मक प्रश्न आलवार-नयनार की संख्या, उनके संकलनों के नाम, और लिंगायत आंदोलन के प्रवर्तक पूछते हैं। कथन-आधारित प्रश्न वीरशैव मत की जाति और विधवा विवाह पर स्थिति जांचते हैं।
UPSC / State PSC के लिए
सामाजिक संरचना पर ध्यान दें - भक्ति संत प्रायः शिल्पी और कृषक वर्गों से आते थे और क्षेत्रीय भाषाओं में गाते थे, इसीलिए इस आंदोलन को धार्मिक बदलाव जितना ही क्षेत्रीय भाषाओं के विकास का प्रमाण माना जाता है। रामानुज का दर्शन दक्षिणी भक्ति और उत्तरी भक्ति के बीच की कड़ी है।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ आलवार शिव के उपासक थे | ✓ आलवार विष्णु के; नयनार शिव के उपासक थे
✗ शंकराचार्य ने विशिष्टाद्वैत चलाया | ✓ शंकर ने अद्वैत; रामानुज ने विशिष्टाद्वैत चलाया
✗ वचन मराठी में लिखे गए | ✓ वचन कन्नड़ में हैं; अभंग मराठी में हैं
एक नजर में
- भक्ति तमिलनाडु में शुरू - विष्णु के बारह आलवार और शिव के तिरसठ नयनार।
- इनके संकलन नालायिर दिव्य प्रबंधम् और तेवारम् हैं।
- शंकर - अद्वैत; रामानुज - विशिष्टाद्वैत; मध्व - द्वैत; वल्लभ - शुद्धाद्वैत।
- रामानंद भक्ति को उत्तर ले गए और सभी जातियों से शिष्य बनाए।
- बसवन्ना के वीरशैव आंदोलन ने जाति नकारी और विधवा विवाह का समर्थन किया; वचन कन्नड़ में।
- महाराष्ट्र के वारकरी संत - ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, चोखामेला और तुकाराम।
