न्यायिक पुनरावलोकन, सक्रियता और जनहित याचिका
NCERT Class 11 - Indian Constitution at Work, Chapter 6
न्यायिक पुनरावलोकन, सक्रियता और जनहित याचिका
न्यायिक पुनरावलोकन न्यायालयों की वह शक्ति है जिससे वे जांचते हैं कि कोई कानून या कार्यपालिका कार्रवाई संविधान के अनुरूप है या नहीं, और न होने पर उसे शून्य घोषित कर देते हैं। यही तंत्र संविधान को सर्वोच्च बनाता है, संसद को नहीं।
न्यायिक पुनरावलोकन का आधार और दायरा
- न्यायिक पुनरावलोकन शब्द इसी रूप में नहीं आता, पर यह शक्ति कई प्रावधानों से निकलती है - अनुच्छेद 13 मूल अधिकारों से असंगत विधि को शून्य करता है; अनुच्छेद 32 और 226 उपचार देते हैं; अनुच्छेद 131 से 136 अपीलीय तथा मूल क्षेत्राधिकार देते हैं; और अनुच्छेद 246 सातवीं अनुसूची के साथ विधायी सक्षमता की सीमा तय करता है।
- तीन प्रकार की कार्रवाई की समीक्षा हो सकती है - संसद तथा राज्य विधानमंडलों के विधायी अधिनियम, कार्यपालिका के आदेश और प्रशासनिक कार्रवाई, और मूल ढांचे की कसौटी पर संविधान संशोधन।
- किसी कानून को तीन व्यापक आधारों पर रद्द किया जा सकता है - वह मूल अधिकार का उल्लंघन करता हो, विधानमंडल के पास सक्षमता न हो, या वह मूल ढांचे को क्षति पहुंचाता हो।
- न्यायिक पुनरावलोकन राज्य के कानूनों पर भी उसी तरह लागू होता है, जिससे शक्तियों का संघीय बंटवारा प्रवर्तनीय रहता है।
न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका
- न्यायिक सक्रियता का अर्थ है न्यायालय का कानून की संकीर्ण व्याख्या से आगे जाकर संवैधानिक मूल्यों को प्रभावी करना, प्रायः कार्यपालिका को विस्तृत निर्देश देकर।
- इसका सबसे महत्वपूर्ण माध्यम जनहित याचिका है, जो 1970 के दशक के उत्तरार्ध से विकसित हुई और जिसे न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती तथा वी. आर. कृष्ण अय्यर से जोड़ा जाता है।
- जनहित याचिका ने पक्षकार होने (locus standi) का नियम ढीला किया, जिससे कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति उनकी ओर से न्यायालय जा सकता है जो स्वयं नहीं आ सकते।
- प्रक्रिया इतनी सरल कर दी गई कि पत्र या समाचार रिपोर्ट को रिट याचिका माना गया - इसे कभी-कभी पत्र क्षेत्राधिकार कहा जाता है।
- जनहित याचिका से बदले क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरी, विचाराधीन बंदी, पर्यावरण संरक्षण, भोजन का अधिकार, तथा दिव्यांगों और बच्चों के अधिकार शामिल हैं।
न्यायिक अतिक्रमण की बहस
| सक्रियता के पक्ष में तर्क | विपक्ष में तर्क |
|---|---|
| कार्यपालिका के निष्क्रिय रहने पर रिक्तता भरती है | नीति बनाने की विशेषज्ञता और आंकड़े न्यायालय के पास नहीं |
| गरीब को सुलभ उपचार देती है | न्यायाधीश निर्वाचित नहीं और मतदाता के प्रति जवाबदेह नहीं |
| मूल अधिकारों को पाठ में नहीं, व्यवहार में सुरक्षित करती है | विस्तृत निर्देश शक्ति पृथक्करण को धुंधला करते हैं |
| अनुच्छेद 21 के माध्यम से निदेशक तत्वों को प्रभावी बनाती है | द्वार अधिक खोलकर लंबित मामले बढ़ाती है |
- न्यायिक अतिक्रमण शब्द तब प्रयोग होता है जब लगे कि न्यायालय वे कार्य संभाल रहा है जो वास्तव में कार्यपालिका या विधायिका के हैं।
- प्रतिवाद यह है कि सक्रियता संस्थागत विफलता की प्रतिक्रिया है, उसका कारण नहीं, और न्यायालय प्रायः इसलिए हस्तक्षेप करता है क्योंकि किसी अधिकार का उल्लंघन हो रहा है और कोई अन्य उपचार नहीं है।
- संतुलित स्थिति यह है कि न्यायिक पुनरावलोकन अनिवार्य है, अधिकारों की रक्षा में सक्रियता वैध है, और नीति तथा संसाधन आवंटन के मामलों में संयम आवश्यक है।
परीक्षा में कैसे आता है
तथ्यात्मक प्रश्न पूछते हैं कि न्यायिक पुनरावलोकन का आधार कौन सा अनुच्छेद है और जनहित याचिका किनसे जुड़ी है। कथन-आधारित प्रश्न पुनरावलोकन, सक्रियता और अतिक्रमण का अंतर जांचते हैं। व्यावहारिक प्रश्न कोई न्यायालयी आदेश देकर पूछते हैं कि वह पुनरावलोकन है या अतिक्रमण।
UPSC / State PSC के लिए
निबंध में उत्तर को शक्ति, व्यवहार और सीमा के क्रम में रखिए - न्यायिक पुनरावलोकन संवैधानिक शक्ति है, सक्रियता 1980 के दशक से उसका व्यवहार है, और सीमा यह कि न्यायालय निर्वाचित निकायों के नीतिगत चुनावों की जगह अपना निर्णय न रखे। सक्रियता के सारभूत परिणाम के उदाहरण के रूप में अनुच्छेद 21 के विस्तार का उल्लेख कीजिए।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ न्यायिक पुनरावलोकन का उल्लेख संविधान में इसी नाम से है | ✓ शक्ति कई अनुच्छेदों से आती है पर यह शब्द इस रूप में नहीं आता
✗ जनहित याचिका में याचिकाकर्ता का स्वयं प्रभावित होना आवश्यक है | ✓ जनहित याचिका ने यह नियम ढीला किया; कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति जा सकता है
✗ न्यायिक सक्रियता और न्यायिक पुनरावलोकन एक ही हैं | ✓ पुनरावलोकन शक्ति है; सक्रियता उसके प्रयोग की शैली
एक नजर में
- न्यायिक पुनरावलोकन से न्यायालय कानून और कार्यपालिका कार्रवाई को असंवैधानिक घोषित करते हैं।
- इसका आधार अनुच्छेद 13, 32, 226, 131 से 136 और 246 में है।
- आधार - मूल अधिकार का उल्लंघन, विधायी सक्षमता का अभाव, मूल ढांचे को क्षति।
- जनहित याचिका 1970 के दशक के अंत से न्यायमूर्ति भगवती और कृष्ण अय्यर के समय विकसित हुई।
- इसने पक्षकार नियम ढीला किया और पत्र तक को याचिका माना गया।
- सक्रियता का बचाव संस्थागत रिक्तता भरने के रूप में और आलोचना शक्ति पृथक्करण धुंधला करने के रूप में होती है।
