मौर्य प्रशासन और अर्थव्यवस्था
NCERT Class 12 - Themes in Indian History Part I, Chapter 2
मौर्य प्रशासन और अर्थव्यवस्था
मौर्य राज्य केंद्र में कसा हुआ और सीमांत पर ढीला था। राजा मंत्रिपरिषद के साथ शासन करता था, श्रेणीबद्ध नौकरशाही राजस्व वसूलती थी, और विस्तृत गुप्तचर तंत्र सीधे केंद्र को सूचना देता था। कोष का मुख्य आधार भू-राजस्व था।
केंद्रीय प्रशासन
- राजा कार्यपालिका, सेना और न्याय का प्रमुख था, जिसकी सहायता मंत्रिपरिषद करती थी।
- समाहर्ता राजस्व का मुख्य संग्राहक था; सन्निधाता राजकीय भंडार का कोषाध्यक्ष।
- अध्यक्ष नामक विभागाध्यक्ष खान, वन, बाट, बंदरगाह, बुनाई और टकसाल संभालते थे।
- गुप्तचरों का बड़ा तंत्र, गूढ़पुरुष, स्थिर एजेंट या घुमंतू सूचक के रूप में काम करता और सीधे राजा को रिपोर्ट करता था।
प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन
- साम्राज्य में पाटलिपुत्र के आसपास केंद्रीय क्षेत्र और चार बाहरी प्रांत थे, हर एक का प्रमुख राजकुल का राजकुमार, जिसे कुमार या आर्यपुत्र कहा जाता था।
| प्रांत | राजधानी |
|---|---|
| उत्तरापथ, उत्तर-पश्चिम | तक्षशिला |
| अवंतिराष्ट्र, पश्चिम | उज्जैन |
| दक्षिणापथ, दक्षिण | सुवर्णगिरि |
| कलिंग, पूर्व | तोसलि |
| केंद्रीय क्षेत्र | पाटलिपुत्र |
- प्रादेशिक जिले का प्रमुख था, राजुक ग्रामीण क्षेत्र में राजस्व और न्याय देखता था, और युक्त अधीनस्थ अधिकारी था जो लेखा संभालता था।
- सबसे छोटी इकाई गांव थी, जिसका प्रमुख ग्रामिक होता था - स्थानीय स्तर पर चुना गया मुखिया, वेतनभोगी अधिकारी नहीं।
पाटलिपुत्र का नगर प्रशासन
- मेगस्थनीज बताता है कि राजधानी का शासन पांच-पांच सदस्यों की छह समितियां, यानी कुल तीस अधिकारी चलाते थे।
- ये समितियां शिल्प और उद्योग, विदेशी, जन्म-मृत्यु, व्यापार, निर्मित वस्तुएं और बिक्री कर देखती थीं।
- युद्ध विभाग भी इसी तरह पांच-पांच की छह समितियों में बंटा था - पैदल, अश्व, रथ, हाथी, नौसेना और परिवहन।
- मेगस्थनीज यह भी कहता है कि भारतीय समाज सात वर्गों में बंटा था - जिसे अधिकांश इतिहासकार जाति और व्यवसाय की यूनानी गलतफहमी मानते हैं।
अर्थव्यवस्था
- भू-राजस्व, जिसे भाग कहा जाता था, मुख्य मद था और सामान्यतः उपज का छठा भाग होता था, सिंचित क्षेत्रों में अतिरिक्त उपकर के साथ।
- राज्य के पास खान, वन, नमक और सीता भूमि नामक बड़े राजकीय खेत थे, जिन पर मजदूर और बंदी काम करते थे।
- आहत चांदी के सिक्के, जिन्हें पण कहा जाता था, व्यापक रूप से चलते थे और मुद्रा अर्थव्यवस्था दिखाते हैं।
- राजकीय मार्ग, विशेषकर पाटलिपुत्र से तक्षशिला तक का उत्तर-पश्चिमी राजपथ, व्यापार ढोता था; राज्य उन पर सराय, कुएं और छायादार वृक्ष बनवाता था।
- उत्तरी काली चमकीली मृद्भांड (NBPW) इस काल का विशिष्ट बेहतरीन मृद्भांड है।
परीक्षा में कैसे आता है
अधिकारी और कार्य तथा प्रांत और राजधानी का सुमेलित कीजिए बहुत आम है। तथ्यात्मक प्रश्न पाटलिपुत्र की समितियों की संख्या और भू-राजस्व की दर पूछते हैं। कथन-आधारित प्रश्न जांचते हैं कि ग्रामिक वेतनभोगी था या नहीं और मेगस्थनीज के सात वर्ग स्वीकार्य हैं या नहीं।
UPSC / State PSC के लिए
अर्थशास्त्र के आदर्श पूर्ण नियंत्रण और व्यावहारिक यथार्थ के अंतर पर ध्यान दें - अभिलेख दिखाते हैं कि सीमांत प्रांत स्थानीय अभिजनों के माध्यम से चलते थे, और साम्राज्य वास्तव में अलग-अलग नियंत्रण तीव्रता वाले क्षेत्रों का समूह था। यही "केंद्र और परिधि" मॉडल पसंदीदा विश्लेषण ढांचा है।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ सन्निधाता राजस्व वसूलता था | ✓ राजस्व समाहर्ता वसूलता था; सन्निधाता कोषाध्यक्ष था
✗ सुवर्णगिरि पश्चिमी प्रांत की राजधानी थी | ✓ पश्चिमी उज्जैन थी; सुवर्णगिरि दक्षिणी राजधानी थी
✗ राजुक सेना का सेनापति था | ✓ राजुक ग्रामीण राजस्व और न्याय देखता था
एक नजर में
- केंद्र में राजा और मंत्रिपरिषद; विभाग अध्यक्ष चलाते थे।
- समाहर्ता राजस्व, सन्निधाता कोष, गूढ़पुरुष गुप्तचर।
- चार प्रांत - तक्षशिला, उज्जैन, सुवर्णगिरि, तोसलि - राजकुमारों के अधीन।
- नीचे प्रादेशिक, राजुक और युक्त; गांव का प्रमुख ग्रामिक।
- पाटलिपुत्र में पांच-पांच की छह समितियां; युद्ध विभाग में भी छह समितियां।
- भू-राजस्व भाग लगभग छठा भाग; आहत पण सिक्के; NBPW मृद्भांड।
