प्रस्तावना और उसका दर्शन
NCERT Class 9 - Democratic Politics I, Chapter 2 • NCERT Class 11 - Indian Constitution at Work, Chapter 10
प्रस्तावना और उसका दर्शन
प्रस्तावना संविधान की भूमिका है और उसका स्रोत, स्वरूप, उद्देश्य और अंगीकरण की तिथि बताती है। यह उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है और इसे संविधान की कुंजी तथा संविधान का परिचय पत्र कहा गया है।
प्रस्तावना क्या घोषित करती है
- सत्ता का स्रोत - "हम भारत के लोग" शब्द स्थापित करते हैं कि संविधान की सत्ता जनता से आती है, किसी बाहरी शक्ति से नहीं।
- राज्य का स्वरूप - भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है।
- उद्देश्य - न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व।
- अंगीकरण की तिथि - 26 नवंबर 1949।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संप्रभु | भारत आंतरिक और बाह्य मामलों में किसी बाहरी नियंत्रण से मुक्त है |
| समाजवादी | सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता, लोकतांत्रिक मार्ग से |
| पंथनिरपेक्ष | राज्य का अपना कोई धर्म नहीं और सभी धर्मों से समान व्यवहार |
| लोकतांत्रिक | सरकार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से जनता द्वारा चुनी जाती है |
| गणराज्य | राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित होता है, वंशानुगत नहीं |
चार उद्देश्य
- न्याय के तीन आयाम हैं - सामाजिक न्याय यानी जाति, धर्म, नस्ल और लिंग आधारित भेदभाव की समाप्ति; आर्थिक न्याय यानी आय, संपत्ति और अवसर में भारी असमानता न हो; राजनीतिक न्याय यानी समान राजनीतिक अधिकार और पद तक समान पहुंच।
- स्वतंत्रता में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना शामिल हैं। स्वतंत्रता का अर्थ हर बंधन का अभाव नहीं, बल्कि संवैधानिक सीमा के भीतर स्वतंत्रता है।
- समानता में प्रतिष्ठा और अवसर की समानता आती है, जिसे अनुच्छेद 14 से 18 मूर्त रूप देते हैं।
- बंधुत्व का अर्थ भाईचारे की भावना है, और प्रस्तावना इसे व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता से जोड़ती है।
- आंबेडकर का मत था कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अलग-अलग मदों की तरह नहीं, एक समुच्चय की तरह देखना चाहिए, क्योंकि समानता बिना स्वतंत्रता कुछ लोगों का शासन बनाती है और स्वतंत्रता बिना समानता पहल को मार देती है।
संशोधन और विधिक स्थिति
- प्रस्तावना में केवल एक बार संशोधन हुआ है, 1976 के 42वें संशोधन से, जिसने समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े।
- 1960 के बेरुबारी संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 में न्यायालय ने माना कि प्रस्तावना संविधान का भाग है और उसमें संशोधन हो सकता है, पर ऐसा नहीं जो उसके मूल ढांचे को नष्ट करे।
- प्रस्तावना स्वयं न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है - केवल उसके उल्लंघन पर मुकदमा नहीं चलता - पर अस्पष्ट प्रावधानों की व्याख्या में वह मार्गदर्शन करती है।
परीक्षा में कैसे आता है
तथ्यात्मक प्रश्न पूछते हैं कि कौन से शब्द किस संशोधन से जुड़े और प्रस्तावना में कौन सी तिथि है। सुमेलित कीजिए में शब्द और अर्थ जुड़ते हैं। कथन-आधारित प्रश्न जांचते हैं कि प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं और प्रवर्तनीय है या नहीं - भाग हां, प्रवर्तनीय नहीं।
UPSC / State PSC के लिए
न्यायिक स्थिति ठीक-ठीक याद रखें, क्योंकि यह दो चरणों में पूछी जाती है - केशवानंद के बाद प्रस्तावना संविधान का भाग है, अनुच्छेद 368 के अंतर्गत उसमें संशोधन हो सकता है, पर संशोधन मूल ढांचे को नहीं बदल सकता। भारतीय पंथनिरपेक्षता को भी सावधानी से परिभाषित कीजिए - सभी धर्मों का समान सम्मान और राजकीय धर्म का अभाव, जो अन्यत्र प्रचलित कठोर पृथक्करण से भिन्न है।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ पंथनिरपेक्ष शब्द मूल प्रस्तावना में था | ✓ यह 1976 के 42वें संशोधन से जोड़ा गया
✗ प्रस्तावना को अकेले न्यायालय में लागू कराया जा सकता है | ✓ यह सीधे प्रवर्तनीय नहीं है, यद्यपि व्याख्या में मार्गदर्शन करती है
✗ गणराज्य का अर्थ है देश में राजा नहीं और इसलिए वह लोकतांत्रिक है | ✓ गणराज्य का विशिष्ट अर्थ है राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित हो, वंशानुगत नहीं
एक नजर में
- प्रस्तावना संविधान का स्रोत, स्वरूप, उद्देश्य और अंगीकरण तिथि बताती है।
- हम भारत के लोग - सत्ता जनता से आती है।
- संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य राज्य का स्वरूप बताते हैं।
- उद्देश्य - सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; स्वतंत्रता; समानता; बंधुत्व।
- संशोधन केवल एक बार, 1976 के 42वें संशोधन से, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जुड़े।
- बेरुबारी 1960 ने इसे संविधान का भाग नहीं माना; केशवानंद भारती 1973 ने भाग माना।
