अधिकार बनाम निदेश: टकराव
NCERT Class 11 - Indian Constitution at Work, Chapter 2
अधिकार बनाम निदेश: टकराव
मूल अधिकार व्यक्ति की रक्षा करते हैं; नीति निदेशक तत्व सामूहिक हित की ओर बढ़ते हैं। जब किसी निदेश के लिए बना कानून किसी अधिकार को काटता, तो न्यायालय को तय करना पड़ता कि कौन भारी है। उत्तर तीस वर्षों में विकसित हुआ और प्राथमिकता नहीं, संतुलन पर ठहरा।
दोनों में अंतर
| बिंदु | मूल अधिकार | नीति निदेशक तत्व |
|---|---|---|
| भाग | भाग 3, अनुच्छेद 12 से 35 | भाग 4, अनुच्छेद 36 से 51 |
| प्रवर्तनीय | हां, अनुच्छेद 32 और 226 की रिट से | नहीं, गैर-न्यायोचित |
| स्वरूप | अधिकतर नकारात्मक, राज्य को रोकते हैं | सकारात्मक, राज्य को कार्य का निर्देश |
| लक्ष्य | राजनीतिक लोकतंत्र और व्यक्ति की स्वतंत्रता | सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र |
| स्रोत | अमेरिका | आयरलैंड |
| प्रवर्तन शक्ति | विधिक, न्यायालय के माध्यम से | राजनीतिक, मतदाता के माध्यम से |
टकराव कैसे बढ़ा
- चंपकम दोरैराजन, 1951 - उच्चतम न्यायालय ने माना कि टकराव में मूल अधिकार भारी पड़ते हैं और निदेश उनके अधीन चलेंगे। संसद ने प्रथम संशोधन से उत्तर दिया, जिसने पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध की अनुमति देते हुए खंड 15(4) जोड़ा।
- गोलकनाथ, 1967 - न्यायालय ने माना कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर ही नहीं सकती, निदेश लागू करने के लिए भी नहीं।
- 25वें संशोधन, 1971 ने अनुच्छेद 31ग जोड़ा, जो अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) लागू करने वाले कानूनों को अनुच्छेद 14 तथा 19 की चुनौती से बचाता था।
- केशवानंद भारती, 1973 - न्यायालय ने अनुच्छेद 31ग का पहला भाग बनाए रखा पर न्यायिक पुनरावलोकन रोकने वाला खंड रद्द किया, और मूल ढांचा सिद्धांत दिया।
- 42वें संशोधन, 1976 ने अनुच्छेद 31ग को किसी भी निदेश को लागू करने वाले कानून तक बढ़ा दिया, जिससे निदेशों को पूर्ण प्राथमिकता मिल गई।
- मिनर्वा मिल्स, 1980 - न्यायालय ने यह विस्तार रद्द किया और कहा कि मूल अधिकारों तथा निदेशक तत्वों का संतुलन स्वयं मूल ढांचे का भाग है। किसी को निरपेक्ष प्राथमिकता नहीं।
स्थापित स्थिति
- दोनों भाग परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं - निदेश लक्ष्य तय करते हैं, अधिकार यह तय करते हैं कि उन लक्ष्यों तक कैसे पहुंचा जाए।
- अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) लागू करने वाले कानून को केशवानंद में बनी सीमा तक अनुच्छेद 31ग का संरक्षण आज भी मिलता है।
- न्यायालय अब निदेशों का उपयोग मूल अधिकारों की व्याख्या में सहायक के रूप में करते हैं, और इसी से शिक्षा, स्वास्थ्य, जीविका तथा स्वच्छ पर्यावरण अनुच्छेद 21 में पढ़े गए।
- व्यवहार में अधिकांश निदेश मुकदमे से नहीं, विधान से लागू हुए हैं, जो ठीक वही है जो निर्माताओं ने सोचा था।
परीक्षा में कैसे आता है
तथ्यात्मक प्रश्न पूछते हैं कि किस मामले में मूल अधिकार भारी माने गए, अनुच्छेद 31ग किस संशोधन से आया, और किस मामले ने संतुलन को मूल ढांचे का भाग कहा। सुमेलित कीजिए में मामला, वर्ष और निर्णय जुड़ते हैं। व्यावहारिक प्रश्न कोई कानून देकर टकराव का समाधान पूछते हैं।
UPSC / State PSC के लिए
इस कथा को संसद और न्यायपालिका के संवाद की तरह रखिए - हर मामले ने एक संशोधन पैदा किया और हर संशोधन ने एक मामला। मिनर्वा मिल्स का समाधान उद्धरण योग्य संवैधानिक सिद्धांत है - संविधान भाग 3 और भाग 4 के संतुलन की चट्टान पर खड़ा है, और किसी एक को दूसरे पर निरपेक्ष प्राथमिकता देना उसकी समरसता बिगाड़ना है।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ केशवानंद भारती ने निदेशों को अधिकारों से ऊपर माना | ✓ उसने मूल ढांचा सिद्धांत दिया; संतुलन मिनर्वा मिल्स ने तय किया
✗ अनुच्छेद 31ग मूल संविधान में था | ✓ यह 1971 के 25वें संशोधन से जोड़ा गया
✗ 42वें संशोधन के बाद निदेश मूल अधिकारों से ऊपर हैं | ✓ वह विस्तार 1980 में मिनर्वा मिल्स ने रद्द कर दिया
एक नजर में
- अधिकार न्यायोचित और नकारात्मक हैं; निदेश गैर-न्यायोचित और सकारात्मक।
- चंपकम दोरैराजन 1951 में मूल अधिकार भारी माने गए; इसके बाद प्रथम संशोधन आया।
- गोलकनाथ 1967 ने मूल अधिकारों में संशोधन रोका।
- 1971 के 25वें संशोधन ने 39(ख) और 39(ग) वाले कानूनों के लिए अनुच्छेद 31ग जोड़ा।
- केशवानंद भारती 1973 ने 31ग का भाग बनाए रखा और मूल ढांचा सिद्धांत दिया।
- मिनर्वा मिल्स 1980 ने भाग 3 और 4 के संतुलन को मूल ढांचे का भाग माना।
