नए धार्मिक आंदोलनों का उदय
NCERT Class 6 - Our Pasts I • NCERT Class 12 - Themes in Indian History Part I, Chapter 4
नए धार्मिक आंदोलनों का उदय
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मध्य गंगा मैदान में नए उपदेशों की लहर उठी। महंगे यज्ञ, कठोर होते वर्ण और नई मुद्रा अर्थव्यवस्था ने ऐसे प्रश्न खड़े किए जिनका उत्तर वैदिक कर्मकांड के पास नहीं था। जैन और बौद्ध धर्म टिके, कई अन्य संप्रदाय नहीं।
धार्मिक कारण
- उत्तर वैदिक यज्ञ लंबे, महंगे और पुरोहित प्रधान हो चुके थे, जिनमें भारी दक्षिणा आम परिवार नहीं दे सकते थे।
- उपनिषद पहले ही प्रश्न को कर्मकांड से हटाकर ज्ञान, कर्म और पुनर्जन्म पर ले आए थे - नए आचार्यों ने इसे और आगे बढ़ाया।
- पशु बलि जैसी कर्मकांडीय हिंसा कृषक समुदायों को खटकती थी, जिनके लिए पशु उत्पादक संपत्ति थे।
- वैदिक ग्रंथ संस्कृत में थे, जो अधिकांश लोग नहीं बोलते थे; नए आचार्यों ने पालि और प्राकृत अपनाई।
सामाजिक और आर्थिक कारण
- वर्ण व्यवस्था वंशानुगत हो चुकी थी। क्षत्रिय ब्राह्मण श्रेष्ठता से असंतुष्ट थे, और महावीर तथा बुद्ध दोनों क्षत्रिय कुलों से आए।
- लोहे के हल और अधिशेष ने एक समृद्ध व्यापारी वर्ग (सेट्ठि) पैदा किया, जिनके पास धन था पर वैश्य होने के कारण कर्मकांडीय दर्जा कम था।
- पहले आहत सिक्के (punch-marked coins) और बढ़ते व्यापार से ऋण और ब्याज आम हुए, जिन्हें रूढ़िवादी ग्रंथ बुरा मानते थे; नए संप्रदायों ने नहीं।
- राजगीर, वैशाली, श्रावस्ती और कौशांबी जैसे नगरों के उदय से ऐसी आबादी बनी जो गांव के कर्मकांड से कम बंधी थी।
उस युग के अन्य आचार्य
- बौद्ध ग्रंथ उस समय सक्रिय छह नास्तिक आचार्यों को याद रखते हैं, जिनमें बुद्ध और महावीर केवल दो हैं।
- मक्खलि गोसाल ने आजीवक संप्रदाय चलाया, जिसका सिद्धांत नियति है - सब पूर्व निर्धारित है, प्रयास से कुछ नहीं बदलता।
- अजित केसकंबलिन ने भौतिकवादी मत दिया - केवल चार तत्व सत्य हैं, परलोक नहीं। यही धारा आगे चार्वाक या लोकायत से जुड़ती है।
- पकुध कच्चायन ने कहा कि सृष्टि शाश्वत और अपरिवर्तनीय तत्वों से बनी है।
- संजय बेलट्ठिपुत्त तत्वमीमांसा के प्रश्नों पर निश्चित उत्तर देने से बचते थे, जिसे आगे संशयवाद कहा गया।
| आचार्य | संप्रदाय या विचार |
|---|---|
| वर्धमान महावीर | जैन धर्म |
| गौतम बुद्ध | बौद्ध धर्म |
| मक्खलि गोसाल | आजीवक, नियतिवाद |
| अजित केसकंबलिन | भौतिकवाद, चार्वाक के पूर्वज |
| पकुध कच्चायन | शाश्वत तत्व सिद्धांत |
| संजय बेलट्ठिपुत्त | संशयवाद, निश्चित उत्तर नहीं |
नए संप्रदायों में समानता
- इन्होंने वेदों की सत्ता और यज्ञ की अनिवार्यता को अस्वीकार किया।
- कर्म और पुनर्जन्म को माना, पर मुक्ति का मार्ग जन्म या कर्मकांड नहीं, आचरण बताया।
- सदस्यता सभी वर्णों और स्त्रियों के लिए खोली और अनुयायियों को संघ में संगठित किया।
- उपदेश जनभाषा में दिया और राजकीय यज्ञ के बजाय गृहस्थ दानदाताओं पर निर्भर रहे।
परीक्षा में कैसे आता है
आचार्य और सिद्धांत का सुमेलित कीजिए प्रश्न आता है, खासकर मक्खलि गोसाल और नियति। कथन-आधारित प्रश्न जांचते हैं कि नए संप्रदायों ने कर्म को माना या नहीं, और भाषा संस्कृत थी या नहीं। व्यावहारिक प्रश्न पूछते हैं कि व्यापारियों ने इन्हें क्यों समर्थन दिया।
UPSC / State PSC के लिए
मानक ढांचा यह है कि ये आंदोलन केवल कर्मकांडीय अति नहीं, बल्कि भौतिक बदलाव की प्रतिक्रिया थे - लोहा, अधिशेष, सिक्के, नगर और व्यापार ने ऐसा वर्ग बनाया जिसका सामाजिक दर्जा उसकी संपत्ति से मेल नहीं खाता था। छह नामित आचार्य दिखाते हैं कि यह व्यापक बौद्धिक हलचल थी।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ आजीवक स्वतंत्र इच्छा और प्रयास में विश्वास करते थे | ✓ आजीवक नियति मानते थे, कि सब पहले से तय है
✗ बुद्ध और महावीर ब्राह्मण थे | ✓ दोनों क्षत्रिय कुलों से आए थे
✗ नए संप्रदायों ने संस्कृत में उपदेश दिया | ✓ इन्होंने पालि और प्राकृत, यानी बोलचाल की भाषा अपनाई
एक नजर में
- छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मध्य गंगा मैदान में अनेक नए संप्रदाय उभरे।
- कारण - महंगे यज्ञ, कठोर वर्ण, क्षत्रिय असंतोष, समृद्ध व्यापारी, नए नगर और सिक्के।
- छह नास्तिक आचार्य याद रखे जाते हैं; बुद्ध और महावीर उनमें से दो हैं।
- मक्खलि गोसाल ने आजीवक संप्रदाय चलाया और नियतिवाद सिखाया।
- अजित केसकंबलिन ने भौतिकवाद दिया, जो चार्वाक का पूर्वज है।
- समान बातें - वेद अस्वीकार, कर्म स्वीकार, जन्म पर आचरण भारी, संघ, जनभाषा।
