ज्वार-भाटा, तरंगें और प्रवाल भित्तियां
NCERT Class 11 - Fundamentals of Physical Geography, Chapter 14
ज्वार-भाटा, तरंगें और प्रवाल भित्तियां
ज्वार-भाटा समुद्र तल का आवधिक उठना और गिरना है, जो चंद्रमा तथा सूर्य के गुरुत्वाकर्षण और पृथ्वी के अपने घूर्णन से होता है। ये पूरी तरह पूर्वानुमेय हैं, और यही इन्हें तरंगों तथा सुनामी से अलग करता है।
ज्वार कैसे बनता है
- मुख्य कारण चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण है। सूर्य कहीं अधिक विशाल है, पर चंद्रमा बहुत निकट है, और उसका ज्वार उत्पन्न करने वाला प्रभाव दोगुने से भी अधिक है।
- चंद्रमा की ओर वाला जल उसकी ओर खिंचकर उभार बनाता है और वहां ज्वार आता है; पृथ्वी-चंद्र तंत्र के अपकेंद्री प्रभाव से ठीक विपरीत ओर दूसरा उभार बनता है।
- दोनों उभारों के बीच जल स्तर गिर जाता है, जिससे भाटा होता है।
- पृथ्वी के घूमने से हर स्थान इन उभारों से गुजरता है, इसलिए अधिकांश तटों पर चौबीस घंटे से कुछ अधिक में दो ज्वार और दो भाटे आते हैं।
- किसी स्थान पर लगातार दो ज्वारों के बीच लगभग बारह घंटे पच्चीस मिनट का अंतर होता है, इसीलिए ज्वार का समय हर दिन थोड़ा खिसक जाता है।
वृहत् और लघु ज्वार
| बिंदु | वृहत् ज्वार | लघु ज्वार |
|---|---|---|
| सूर्य और चंद्रमा की स्थिति | पृथ्वी के साथ एक सीध में | एक-दूसरे से समकोण पर |
| चंद्र कला | अमावस्या और पूर्णिमा | प्रथम और अंतिम चतुर्थांश |
| दोनों खिंचावों का प्रभाव | वे जुड़ जाते हैं | वे आंशिक रूप से कट जाते हैं |
| परिणाम | सबसे ऊंचा ज्वार और सबसे नीचा भाटा | ज्वार-भाटे में सबसे कम अंतर |
| बारंबारता | महीने में दो बार | महीने में दो बार |
- ज्वार तब भी ऊंचे होते हैं जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट, यानी उपभू (perigee) पर हो, और जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट, यानी उपसौर पर हो।
- बारंबारता के अनुसार ज्वार अर्ध-दैनिक होते हैं, यानी प्रतिदिन लगभग समान ऊंचाई के दो ज्वार-दो भाटे, दैनिक, यानी एक ज्वार-एक भाटा, और मिश्रित, जिनकी ऊंचाई असमान रहती है।
- ज्वारभित्ति (tidal bore) जल की वह दीवार है जो आते ज्वार पर संकरे नदी मुहाने में ऊपर की ओर दौड़ती है।
ज्वार का महत्व
- ज्वार नदी मुहानों और बंदरगाहों की सफाई करते हैं, गाद बहा ले जाते हैं और लगातार खुदाई के बिना पत्तन को नौगम्य रखते हैं।
- उथले बंदरगाहों में जहाज ज्वार के साथ आते-जाते हैं, इसलिए नौवहन के लिए ज्वार सारणी अनिवार्य है।
- जहां ज्वारीय परिसर बड़ा हो वहां ज्वारीय ऊर्जा का उपयोग हो सकता है, और भारत में खंभात की खाड़ी तथा कच्छ की खाड़ी में इसकी सबसे अधिक संभावना है।
- ज्वार मत्स्य पालन में सहायक हैं, क्योंकि ज्वार के साथ कई मछलियां तट के पास आती हैं, और ये तटीय क्यारियों में नमक उत्पादन में भी सहायक हैं।
तरंगें और प्रवाल भित्तियां
- साधारण तरंग में ऊर्जा आगे बढ़ती है पर जल नहीं - जल के कण वृत्त में घूमकर लगभग अपनी शुरुआती जगह पर लौट आते हैं।
- तरंग का आकार पवन की गति, पवन के चलने की अवधि, और फेच पर निर्भर करता है, जो वह खुली जल दूरी है जिस पर पवन चलती है।
- सुनामी ज्वारीय तरंग नहीं है - यह समुद्र तल के अचानक खिसकने से बनती है, प्रायः समुद्र के नीचे भूकंप से, और खुले महासागर में कम ऊंचाई के साथ बहुत तेज चलती है तथा उथले तटीय जल में ही ऊंची उठती है।
- प्रवाल भित्तियां पॉलिप नामक सूक्ष्म समुद्री जीव बनाते हैं, जिन्हें लगभग 20 अंश से ऊपर गर्म जल, उथला और स्वच्छ जल जिसमें सूर्य प्रकाश पहुंचे, तथा अवसाद मुक्त खारा जल चाहिए - इसीलिए बड़ी नदियों के मुहाने के पास भित्तियां नहीं मिलतीं।
- तीन प्रकार हैं - तट से लगी तटीय भित्ति, लैगून से तट से अलग अवरोधक भित्ति, और लैगून को घेरे प्रवाल का वलय एटॉल।
परीक्षा में कैसे आता है
कथन-आधारित प्रश्न वृहत् और लघु ज्वार का अंतर जांचते हैं। तथ्यात्मक प्रश्न लगातार दो ज्वारों का अंतर और प्रवाल पॉलिप की आवश्यक दशाएं पूछते हैं। व्यावहारिक प्रश्न पूछते हैं कि सुनामी ज्वारीय तरंग क्यों नहीं है।
UPSC / State PSC के लिए
स्पष्ट रहिए कि ज्वार पर चंद्रमा का प्रभुत्व निकटता के कारण है, द्रव्यमान के कारण नहीं - ज्वार उत्पन्न करने वाला बल दूरी के घन के साथ घटता है, इसलिए निकट पर बहुत छोटा चंद्रमा सूर्य पर भारी पड़ता है। प्रवाल पर तापमान की शर्त को प्रवाल विरंजन से जोड़िए, क्योंकि गर्म होते सागर उन शैवालों को बाहर कर देते हैं जिन पर पॉलिप निर्भर हैं।
यहां कन्फ्यूज होते हैं
✗ वृहत् ज्वार वसंत ऋतु में आते हैं | ✓ ये महीने में दो बार, अमावस्या और पूर्णिमा को आते हैं
✗ ज्वार पर सूर्य का प्रभाव चंद्रमा से अधिक है | ✓ चंद्रमा का प्रभाव अधिक है क्योंकि वह बहुत निकट है
✗ तरंग में जल तरंग के साथ आगे बढ़ता है | ✓ ऊर्जा आगे बढ़ती है; जल के कण वृत्त में घूमते हैं
एक नजर में
- ज्वार मुख्यतः चंद्रमा के गुरुत्व से, सूर्य और अपकेंद्री प्रभाव की सहायता से बनते हैं।
- दो उभारों से अधिकांश तटों पर दिन भर में दो ज्वार और दो भाटे आते हैं।
- लगातार दो ज्वारों में लगभग बारह घंटे पच्चीस मिनट का अंतर होता है।
- अमावस्या-पूर्णिमा के वृहत् ज्वार सबसे ऊंचे; चतुर्थांश के लघु ज्वार सबसे कम।
- ज्वार बंदरगाह साफ करते, नौवहन तथा मत्स्य में सहायक और ज्वारीय ऊर्जा दे सकते हैं।
- तरंग में ऊर्जा आगे बढ़ती है पर जल के कण वृत्त में घूमते हैं।
- सुनामी समुद्र तल खिसकने से बनती है, ज्वार से नहीं।
- प्रवाल को गर्म, उथला, स्वच्छ और अवसाद मुक्त खारा जल चाहिए; प्रकार तटीय, अवरोधक और एटॉल।
