जल संसाधन और संरक्षण
NCERT कक्षा 10 • Contemporary India II • अध्याय "Water Resources" | NCERT कक्षा 10 • Science • अध्याय "Management of Natural Resources"
जल संसाधन और संरक्षण
जल पृथ्वी की अधिकांश सतह ढकता है पर उसका बहुत छोटा अंश ही मानव उपयोग योग्य मीठा जल है। भारत में समस्या केवल मात्रा की नहीं बल्कि वितरण की है, क्योंकि जल कुछ क्षेत्रों और ऋतुओं में प्रचुर तथा अन्य में दुर्लभ रहता है।
जल संकट और बहुउद्देशीय परियोजनाएं
- जल संकट बढ़ती जनसंख्या, फैलती सिंचाई, औद्योगिक मांग, प्रदूषण और असमान वर्षा से उठता है।
- संकट वहां भी हो सकता है जहां वर्षा अधिक है, यदि जल प्रदूषित हो या संचित होने से पहले बह जाए।
- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं सिंचाई, विद्युत, बाढ़ नियंत्रण, जल आपूर्ति, नौवहन, मत्स्य और मनोरंजन एक साथ पूरी करती हैं।
- सतलुज पर भाखड़ा नांगल, महानदी पर हीराकुड और दामोदर घाटी परियोजनाएं महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
- इनके लाभ वास्तविक हैं, पर ये भूमि और वन डुबाती तथा लोगों को विस्थापित भी करती हैं, जो प्रायः जनजातीय समुदाय होते हैं।
- बड़े बांध नदी के प्रवाह और गाद प्रतिरूप को भी बदल देते हैं, जिससे मत्स्य और निचली धारा की खेती प्रभावित होती है।
- गाद जमाव जलाशय की भंडारण क्षमता धीरे-धीरे घटाकर परियोजना का कार्यकाल छोटा कर देता है।
संरक्षण की विधियां
- वर्षा जल संचयन छतों और खुली भूमि से वर्षा एकत्र करता है और उसे या तो संचित करता है या भूजल भरने देता है।
- जलग्रहण प्रबंधन शिखर से घाटी तक पूरे ढाल का उपचार करता है, जिसमें समोच्च मेड़, चेक डैम और वृक्ष आवरण लगते हैं।
- पारंपरिक प्रणालियों में दक्षिण बिहार की आहर पइन, राजस्थान की खड़ीन और टांका, हिमाचल की कुल, तथा दक्षिण के तालाब आते हैं।
- टपक और फव्वारा से सूक्ष्म सिंचाई जल सीधे जड़ तक पहुंचाती है और बहुत जल बचाती है।
- उद्योग और बागवानी में शोधित जल का पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग मीठे जल की मांग घटाता है।
- रिसाव ठीक करना, आपूर्ति की मीटरिंग और जल का विवेकपूर्ण मूल्य निर्धारण नगरों में अपव्यय घटाते हैं।
- भूजल का पुनर्भरण कम से कम उतनी तेजी से होना चाहिए जितनी तेजी से निकासी हो, अन्यथा जलस्तर गिरता रहता है।
| विधि | कैसे काम करती है | कहां उपयुक्त |
|---|---|---|
| वर्षा जल संचयन | वर्षा एकत्र और पुनर्भरण | छत, खुली भूमि |
| जलग्रहण प्रबंधन | शिखर से घाटी एक इकाई | पहाड़ी और वर्षा आधारित क्षेत्र |
| सूक्ष्म सिंचाई | जल सीधे जड़ तक | जल दुर्लभ कृषि |
| पारंपरिक प्रणालियां | स्थानीय भंडारण और नालियां | क्षेत्र विशेष |
जलग्रहण प्रबंधन — मृदा और जल संरक्षण के लिए शिखर से घाटी तक पूरे अपवाह क्षेत्र का एक इकाई के रूप में उपचार।
Exam me kaise aata hai
- दक्षिण बिहार की पारंपरिक सिंचाई प्रणाली — आहर पइन
- संचय या पुनर्भरण के लिए वर्षा एकत्र करना — वर्षा जल संचयन
- भाखड़ा नांगल किस नदी पर बना है — सतलुज
- टपक और फव्वारा मिलकर कहलाते हैं — सूक्ष्म सिंचाई
UPSC/State PSC ke liye
- बड़े बांधों की लागत और लाभ असमान रूप से बंटते हैं: लाभ निचली धारा के खेतों और नगरों को और लागत ऊपर विस्थापित लोगों पर पड़ती है।
- भूजल साझा पूल संसाधन है, इसलिए हर उपयोगकर्ता को अधिक पंप करने का प्रोत्साहन रहता है जबकि जलभृत सबके लिए गिरता है, और इसीलिए उसका विनियमन इतना कठिन है।
Yahan confuse hote hain
✗ जल संकट केवल कम वर्षा वाले क्षेत्रों में होता है | यह वहां भी होता है जहां जल प्रदूषित हो या संचित न हो | ✓
✗ बहुउद्देशीय परियोजनाओं के केवल लाभ हैं | ये भूमि भी डुबाती और लोगों को विस्थापित भी करती हैं | ✓
✗ वर्षा जल संचयन का अर्थ केवल जल संचित करना है | यह भूजल का पुनर्भरण भी करता है | ✓
Ek nazar me
- मीठा जल कुल जल का छोटा अंश है और असमान रूप से बंटा है।
- बहुउद्देशीय परियोजनाएं अनेक उद्देश्य पूरी करती पर भूमि डुबाती और विस्थापन करती हैं।
- वर्षा जल संचयन, जलग्रहण प्रबंधन और सूक्ष्म सिंचाई जल बचाते हैं।
- आहर पइन जैसी पारंपरिक प्रणालियां आज भी स्थानीय रूप से प्रभावी हैं।
