आदिवासी महासभा
आदिवासी महासभा
वर्ष 1938 में बनी आदिवासी महासभा ने छोटानागपुर के बिखरे जनजातीय संगठनों को एक मंच पर लाया। 1939 से जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में इसने आंदोलन की मांग को कल्याण और प्रतिनिधित्व से बढ़ाकर अलग प्रांत की मांग बना दिया।
गठन — 1938 | प्रथम अध्यक्ष — थियोडोर सुरीन | 1939 से अध्यक्ष — जयपाल सिंह मुंडा
गठन
- 1938 में क्षेत्र के कई जनजातीय संगठनों के विलय से गठनबार-बार पूछा जाता है
- प्रथम अध्यक्ष — थियोडोर सुरीन; सचिव — पॉल दयाल
- जयपाल सिंह मुंडा 1939 में अध्यक्ष बने
- इसने छोटानागपुर उन्नति समाज की संवैधानिक पद्धति को आगे बढ़ाया
- आधार था शिक्षित जनजातीय नेतृत्व और गांव स्तर का नेटवर्क
जयपाल सिंह के नेतृत्व में क्या बदला
- मांग कल्याण से बढ़कर अलग झारखंड प्रांत तक तीखी हुई
- जयपाल सिंह की राष्ट्रीय पहचान ने मांग को क्षेत्र के बाहर दृश्यता दी
- महासभा ने चुनाव लड़े और प्रांतीय राजनीति में प्रवेश किया
- संगठन ईसाई जनजातीय नेटवर्क से आगे गैर-ईसाई समुदायों तक पहुंचा
- इसने स्वयं को एक राजनीतिक श्रेणी के रूप में आदिवासी की आवाज बनाया
समयरेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1915 | छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना |
| 1938 | आदिवासी महासभा का गठन |
| 1939 | जयपाल सिंह मुंडा अध्यक्ष बने |
| 1940 का दशक | अलग प्रांत की मांग खुलकर रखी गई |
| 1949 से 1950 | झारखंड पार्टी के रूप में पुनर्गठन |
इसकी सीमाएं
- नाम में आदिवासी शब्द ने क्षेत्र के गैर-जनजातीय निवासियों तक पहुंच सीमित की
- क्षेत्र के सदान और अन्य समुदाय भी अलगाव चाहते थे पर स्वयं को बाहर महसूस करते थे
- यही समस्या झारखंड पार्टी ने नाम बदलकर सुलझाने का प्रयास किया
- 1940 के दशक की औपनिवेशिक प्राथमिकताएं राष्ट्रीय थीं, क्षेत्रीय नहीं, इसलिए मांग अनसुनी रही
- फिर भी इसने एक राजनीतिक पहचान बनाई जहां पहले अनेक संगठन थे
पक्के करने लायक नाम और वर्ष
- 1938 — आदिवासी महासभा का गठन
- थियोडोर सुरीन — प्रथम अध्यक्ष
- जयपाल सिंह मुंडा — 1939 से अध्यक्ष
- 1949-50 — झारखंड पार्टी में परिवर्तन
- अलग प्रांत — वह मांग जो इसी संगठन ने पहले रखी
महासभा ने किस प्रांत की मांग की
- प्रस्तावित इकाई में बिहार के छोटानागपुर और संथाल परगना प्रमंडल शामिल थे
- कुछ प्रस्तावों में ओडिशा, बंगाल और मध्य प्रदेश के सटे जनजातीय क्षेत्र भी जोड़े गए
- तर्क था — अलग संस्कृति, अलग अर्थव्यवस्था और अलग शिकायत
- समर्थक बताते थे कि खनिज संपदा बाहर जाती है और गरीबी यहीं रह जाती है
- विरोधी कहते थे कि क्षेत्र व्यवहार्य नहीं है और मांग सांप्रदायिक है
- यही नक्शा और यही तर्क 1990 के दशक की राज्य बहस में लौटे
जमीन पर यह कैसे चला
- वार्षिक अधिवेशनों में विशाल जनजातीय सभाएं जुटतीं और राजनीतिक प्रस्ताव पारित होते
- स्थानीय शाखाएं राजनीतिक मांग के साथ भूमि और वन की शिकायतें भी उठातीं
- चुनावी भागीदारी ने आंदोलन को प्रतिनिधि राजनीति का पहला अनुभव दिया
- नेता अंग्रेजी ज्ञापन और स्थानीय भाषाओं की जनसभाएं, दोनों का प्रयोग करते थे
- इसी संगठन ने वह नेतृत्व तैयार किया जिसने आगे झारखंड पार्टी चलाई
याद रखने की ट्रिक — तीन नाम, तीन वर्ष — 1915 उन्नति समाज, 1938 आदिवासी महासभा, 1950 झारखंड पार्टी। एक ही धारा के तीन रूप — संस्था, महासभा, दल।
यहां लोग गलती करते हैं — संस्थापक और अध्यक्ष अलग हैं।
✗ जयपाल सिंह ने 1938 में आदिवासी महासभा बनाई | ✓ गठन 1938 में हुआ, प्रथम अध्यक्ष थियोडोर सुरीन; जयपाल सिंह 1939 में अध्यक्ष बने
✗ आदिवासी महासभा 1950 में बनी | ✓ गठन 1938 में; 1949-50 में झारखंड पार्टी बनी
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में इस टॉपिक का प्रयोग आंदोलन के चरण समझाने में होता है — संस्था से दल तक। JSSC CGL, JTGLCCE और JKCE में सीधा — आदिवासी महासभा कब बनी, अध्यक्ष कौन थे। वर्ष और नाम का मेल ही पूरा प्रश्न है।
एक नजर में
- गठन 1938 में
- प्रथम अध्यक्ष — थियोडोर सुरीन
- सचिव — पॉल दयाल
- जयपाल सिंह मुंडा 1939 से अध्यक्ष
- कई जनजातीय संगठनों का एक मंच पर विलय
- अलग प्रांत की मांग रखने वाला पहला संगठन
- 1915 की संवैधानिक पद्धति को जारी रखा
- नाम में आदिवासी शब्द से सीमित पहुंच
- 1949-50 में झारखंड पार्टी बनी
- 1915 के चरण और दलीय राजनीति के बीच सेतु
