पशुपालन और वन आधारित आजीविका
पशुपालन और वन आधारित आजीविका
झारखंड के अधिकांश ग्रामीण परिवारों के लिए केवल खेती साल भर नहीं चलती। पशुपालन, लाह, तसर रेशम, शहद और वनोपज उस कमी को भरते हैं, और जनजातीय परिवारों के लिए प्रायः यही मुख्य नकद आय है।
मुख्य सहायक क्षेत्र — पशुपालन, लाह, तसर रेशम, शहद और लघु वनोपज
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन
- गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर और मुर्गी सभी पाले जाते हैं, प्रायः कम संख्या में
- बकरी पालन सबसे व्यापक है, क्योंकि इसमें भूमि और पूंजी बहुत कम चाहिए
- आंगन का मुर्गीपालन तुरंत नकद देता है और प्रायः महिलाओं का काम है
- दुग्ध उत्पादन कम है, क्योंकि स्थानीय नस्ल और चारा दोनों कमजोर हैं
- पशुधन घर की बचत और बीमा की तरह काम करता है, बुरे वर्ष में बेचा जाता है
- मुख्य नगरों के बाहर पशु चिकित्सा और संगठित डेयरी श्रृंखला सीमित है
लाह और तसर
- लाह कुसुम, पलाश और बेर जैसे पोषक वृक्षों पर पाला जाता है
- झारखंड भारत के अग्रणी लाह उत्पादक राज्यों में हैबार-बार पूछा जाता है
- लाह का उपयोग शेलैक, लाख की मुहर, चूड़ी और खाद्य लेप में होता है
- तसर रेशम असन और अर्जुन वृक्षों पर पाला जाता है
- राज्य भारत के रेशम उद्योग के लिए तसर कोया का बड़ा स्रोत है
- दोनों गैर-कृषि गतिविधियां हैं जो वन और फसल-कैलेंडर दोनों में फिट बैठती हैं
लघु वनोपज
| उपज | उपयोग | मौसम |
|---|---|---|
| साल पत्ता और बीज | पत्तल-दोना; बीज का तेल | मुख्यतः मानसून के बाद |
| महुआ फूल और बीज | भोजन, तेल और पारंपरिक पेय | वसंत |
| तेंदू पत्ता | बीड़ी निर्माण | ग्रीष्म |
| लाह | शेलैक और चूड़ी | वर्ष में दो फसल चक्र |
| शहद और औषधीय पौधे | घरेलू उपयोग और बिक्री | पूरे वर्ष |
| बांस | टोकरी, निर्माण और शिल्प | पूरे वर्ष |
यह क्षेत्र क्यों महत्वपूर्ण है
- यह फसलों के बीच के कमजोर महीनों में आय देता है
- इसमें भूमि बहुत कम चाहिए, इसलिए यह भूमिहीन और अति लघु किसान के अनुकूल है
- यह उन गांवों में पैसा टिकाता है जहां खनन और उद्योग नहीं पहुंचते
- यह महिलाओं को घर की अर्थव्यवस्था में सीधी कमाई की भूमिका देता है
- इसका पतन पलायन बढ़ाता है, इसलिए इसकी रक्षा केवल पारिस्थितिकी नहीं, गरीबी का प्रश्न है
समस्याएं और सहयोग
- लाह, तेंदू और शहद के मुनाफे का बड़ा हिस्सा बिचौलिए ले जाते हैं
- कुछ क्षेत्रों में वन पहुंच के विवाद संग्रह अधिकार सीमित करते हैं
- कीमतों के उतार-चढ़ाव से लाह और तसर की आय अस्थिर रहती है
- प्रसंस्करण राज्य के बाहर होता है, इसलिए मूल्य संवर्धन बाहर चला जाता है
- सहयोग सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों और वनोपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य से मिलता है
याद रखने की ट्रिक — चार आजीविका का जोड़ — ला-त-म-ते: लाह, तसर, महुआ, तेंदू। खेती के बाहर की पूरी कमाई इन्हीं चार में सिमट जाती है।
यहां लोग गलती करते हैं — लाह और तसर अलग वृक्षों पर होते हैं।
✗ लाह और तसर दोनों साल वृक्ष पर पाले जाते हैं | ✓ लाह कुसुम, पलाश और बेर पर; तसर असन और अर्जुन पर
✗ लघु वनोपज का अर्थ है कम महत्व | ✓ कई परिवारों के लिए यही मुख्य नकद आय है
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में इस टॉपिक का प्रयोग आजीविका और पलायन के प्रश्न में होता है — लिखें कि केवल खेती साल भर नहीं चलती। JSSC CGL, JKCE और JTET में सीधा — लाह किस वृक्ष पर, तसर किस वृक्ष पर। दो जोड़ियां याद रखें, प्रश्न पक्का।
एक नजर में
- सहायक आय — पशुधन, लाह, तसर, शहद, वनोपज
- बकरी पालन सबसे व्यापक पशुधन गतिविधि
- पशुधन घर की बचत और बीमा की तरह
- लाह — कुसुम, पलाश और बेर वृक्षों पर
- झारखंड अग्रणी लाह उत्पादक राज्य
- तसर रेशम — असन और अर्जुन वृक्षों पर
- वनोपज — साल पत्ता, महुआ, तेंदू, शहद, बांस
- यह आय फसलों के बीच के कमजोर मौसम को ढकती है
- बिचौलिए और कीमत का उतार-चढ़ाव कमाई घटाते हैं
- सहयोग — सहकारी, स्वयं सहायता समूह, वनोपज MSP
