संथाल हूल 1855-56
संथाल हूल 1855-56
संथाल हूल 30 जून 1855 को भगनाडीह से शुरू हुआ, जब सिदो और कान्हू मुर्मू ने संथालों को जमींदारों, महाजनों और कंपनी के शासन को समाप्त करने के लिए बुलाया। बिरसा मुंडा से पहले यह क्षेत्र का सबसे बड़ा जनजातीय विद्रोह था।
शुरुआत — 30 जून 1855 | स्थान — भगनाडीह | नेता — सिदो, कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू
पृष्ठभूमि
- 1832 से अंग्रेजों ने संथालों को आरक्षित क्षेत्र दामिन-ए-कोह में बसाया
- दो दशक के भीतर इस क्षेत्र की संथाल जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ी
- साफ की गई भूमि पर महाजन, व्यापारी और राजस्व ठेकेदार आ पहुंचे
- बंधुआ मजदूरी की कमियौती व्यवस्था ने परिवारों को अनंत कर्ज में फंसा दिया
- केनाराम और बेचाराम जैसे तराजू-छल से हर लेनदेन में कृषक ठगे जाते थे
- पुलिस और अदालतें बाहरी लोगों के पक्ष में थीं, इसलिए कानूनी उपाय बंद था
विद्रोह
- 30 जून 1855 को वर्तमान साहिबगंज जिले के भगनाडीह में विशाल सभा हुईबार-बार पूछा जाता है
- नेता — चार मुर्मू भाई सिदो, कान्हू, चांद और भैरव, साथ में बहनें फूलो और झानो
- आह्वान का भाव था — कंपनी का शासन समाप्त हो और अपनी माटी अपने पास लौटे
- विद्रोहियों ने अपना शासन घोषित किया और लगान तथा कर्ज देना बंद कर दिया
- विद्रोह राजमहल पहाड़ियों से भागलपुर और बीरभूम की ओर फैला
- तीर-धनुष और कुल्हाड़ी का सामना बंदूकों से हुआ, जिसने सैन्य परिणाम तय कर दिया
दमन
| चरण | क्या हुआ |
|---|---|
| जून से जुलाई 1855 | विद्रोह दामिन क्षेत्र में तेजी से फैला |
| 1855 के अंत में | नियमित सेना की तैनाती, मार्शल लॉ लागू |
| 1855 से 1856 | सिदो और कान्हू पकड़े गए और मार डाले गए |
| जनवरी 1856 | मार्शल लॉ हटा, हूल समाप्त |
| परिणाम | संथाल परगना अलग गैर-विनियमित जिला बना |
परिणाम और महत्व
- संथाल परगना को अलग गैर-विनियमित जिला बनाया गया, मुख्यालय दुमका
- सामान्य विनियम और अदालतें बाहर रखी गईं; अधिकारी सरल प्रक्रिया से शासन करते थे
- 1834 के बाद जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रशासन की दिशा में यह दूसरा बड़ा कदम है
- हूल भारत के पहले बड़े जन-स्तरीय औपनिवेशिक विरोधी विद्रोहों में गिना जाता है
- झारखंड में हर वर्ष 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है
पक्के करने लायक नाम और शब्द
- हूल का संथाली में अर्थ है विद्रोह
- भगनाडीह — वह गांव जहां आह्वान हुआ
- दामिन-ए-कोह — वह बसाव क्षेत्र जिससे शिकायत जन्मी
- महाजन और कमियौती — साहूकार तथा बंधुआ मजदूरी व्यवस्था
- फूलो और झानो मुर्मू — भाइयों के साथ लड़ने वाली बहनें
याद रखने की ट्रिक — चार भाई, एक तारीख — सि-कान्ह-चां-भै: सिदो, कान्हू, चांद, भैरव। और तिथि 30 जून 1855 — हूल दिवस इसी दिन है, इसलिए यह तिथि भूलना कठिन है।
यहां लोग गलती करते हैं — हूल और उलगुलान अलग आंदोलन हैं और उनके परिणाम भी अलग हैं।
✗ हूल से 1908 का CNT अधिनियम बना | ✓ हूल से 1855 में संथाल परगना जिला बना; CNT अधिनियम उलगुलान के बाद आया
✗ हूल 30 जून 1856 को शुरू हुआ | ✓ हूल 30 जून 1855 को शुरू हुआ, 1856 में समाप्त
एग्जाम पॉइंटर — JPSC में हूल के कारण, उसका परिणाम और SPT अधिनियम से उसका संबंध पूछा जाता है — प्रायः उलगुलान से तुलना में। JSSC CGL, JTGLCCE और JTET में सीधा तिथि और नेता — 30 जून 1855, सिदो-कान्हू, भगनाडीह। झारखंड के हर पेपर में इस टॉपिक से प्रश्न आता है, इसलिए तीन बिंदु पक्के रखें।
एक नजर में
- शुरुआत — 30 जून 1855, स्थान भगनाडीह
- नेता — सिदो, कान्हू, चांद, भैरव मुर्मू
- बहनें — फूलो और झानो मुर्मू
- पृष्ठभूमि — 1832 से दामिन-ए-कोह में संथाल बसाव
- शिकायतें — महाजनी कर्ज, कमियौती बंधुआगिरी, झूठे बाट
- विस्तार — राजमहल पहाड़ी से भागलपुर और बीरभूम की ओर
- जनवरी 1856 तक सेना और मार्शल लॉ से दमन
- परिणाम — संथाल परगना गैर-विनियमित जिला, मुख्यालय दुमका
- हूल का संथाली में अर्थ — विद्रोह
- हर वर्ष 30 जून को हूल दिवस
अब इसी चैप्टर के विद्रोहों पर प्रश्न ExamAtlas मॉक टेस्ट में प्रैक्टिस करें — झारखंड GK के JPSC और JSSC दोनों पैटर्न में।
