विद्रोहों की तुलना
विद्रोहों की तुलना
झारखंड के विद्रोह प्रायः तुलना के रूप में पूछे जाते हैं — कौन नेता, कौन-सा वर्ष, कौन-सा क्षेत्र, क्या परिणाम। यह टॉपिक 1770 के दशक से 1920 तक के हर बड़े आंदोलन को एक ही ग्रिड में रखता है, ताकि पूरा अध्याय मिनटों में दोहराया जा सके।
रटने का क्रम — पहाड़िया, तिल्का, चुआर, कोल, हूल, खेरवार, सरदारी, उलगुलान, ताना भगत
मास्टर तालिका
| आंदोलन | काल | नेता | समुदाय और क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| पहाड़िया विद्रोह | 1770 से 1780 के दशक की शुरुआत | राजमहल के पहाड़ी सरदार | पहाड़िया, राजमहल पहाड़ी |
| तिल्का मांझी | 1784 से 1785 | तिल्का मांझी | राजमहल और भागलपुर पट्टी |
| चुआर विद्रोह | 18वीं सदी का उत्तरार्ध | स्थानीय सरदार और पाइक | भूमिज, जंगल महाल |
| कोल विद्रोह | 1831 से 1832 | बुधु भगत | मुंडा, हो, उरांव; छोटानागपुर |
| भूमिज विद्रोह | 1832 से 1833 | गंगा नारायण सिंह | भूमिज, बड़ाभूम |
| संथाल हूल | 1855 से 1856 | सिदो और कान्हू मुर्मू | संथाल, संथाल परगना |
| खेरवार / सफा होड़ | 1870 का दशक | भगीरथ मांझी | संथाल, संथाल परगना |
| सरदारी आंदोलन | 1858 से 1890 का दशक | गांव के सरदार | मुंडा और उरांव, छोटानागपुर |
| उलगुलान | 1899 से 1900 | बिरसा मुंडा | मुंडा, खूंटी और रांची पट्टी |
| ताना भगत | 1914 से | जतरा भगत | उरांव, गुमला और लोहरदगा पट्टी |
परिणाम, एक-एक पंक्ति में
- पहाड़िया विद्रोह — समझौता नीति, हिल रेंजर्स, फिर 1832 में दामिन-ए-कोह
- कोल विद्रोह — दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी 1834
- भूमिज विद्रोह — जंगल महाल भंग, मानभूम जिला का गठन
- संथाल हूल — संथाल परगना गैर-विनियमित जिले के रूप में
- उलगुलान — छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908
- ताना भगत — 1920 से राष्ट्रीय आंदोलन में विलय
समय के साथ पद्धति का बदलाव
| चरण | पद्धति | उदाहरण |
|---|---|---|
| पहला चरण | बाहरी लोगों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह | कोल विद्रोह, संथाल हूल |
| मध्य चरण | सुधार के साथ लगान से इनकार | खेरवार और सफा होड़ |
| कानूनी चरण | अर्जी और अदालती मुकदमे | सरदारी आंदोलन |
| जन चरण | धार्मिक आधार वाला सशस्त्र आंदोलन | उलगुलान |
| राष्ट्रीय चरण | स्वतंत्रता संग्राम के भीतर अहिंसा | ताना भगत |
इन सबके पीछे एक ही शिकायत
- इस अध्याय का हर आंदोलन एक ही समस्या से शुरू होता है — भूमि का छिनना
- माध्यम बदलता है — ठेकेदार, महाजन, जमींदार, कॉन्ट्रैक्टर, पर नुकसान वही है
- ब्रिटिश उत्तर हमेशा प्रशासनिक रहा, कभी भूमि का पुनर्वितरण नहीं
- इसीलिए विद्रोह सौ साल से अधिक तक लौटते रहे
- यह श्रृंखला केवल काश्तकारी कानूनों से रुकती है — CNT अधिनियम 1908 और SPT अधिनियम 1949
याद रखने की ट्रिक — क्रम का जोड़ — प-ति-चु-कोल-हूल-खे-सर-उल-ताना। और परिणाम का जोड़ — कोल से 1834, हूल से 1855, उलगुलान से 1908। दो लाइन में पूरा अध्याय।
यहां लोग गलती करते हैं — परिणामों का मेल सबसे अधिक गलत होता है।
✗ संथाल हूल का परिणाम CNT अधिनियम 1908 था | ✓ हूल का परिणाम संथाल परगना जिला था; CNT अधिनियम उलगुलान के बाद आया
✗ कोल विद्रोह का परिणाम मानभूम जिला था | ✓ कोल विद्रोह से दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी बनी; मानभूम भूमिज विद्रोह के बाद बना
एग्जाम पॉइंटर — JPSC प्रारंभिक में इस अध्याय का सबसे आम प्रारूप मिलान है — विद्रोह, नेता और वर्ष का मेल। JSSC CGL और JKCE में एक-एक पंक्ति का सीधा प्रश्न। JPSC मुख्य में 'जनजातीय विद्रोहों की प्रकृति कैसे बदली' — इसका उत्तर ऊपर की पद्धति तालिका से सीधे बन जाता है। पूरे झारखंड GK में सर्वाधिक अंक यही अध्याय देता है।
एक नजर में
- 1770-80 का दशक पहाड़िया | 1784-85 तिल्का मांझी
- 18वीं सदी उत्तरार्ध चुआर विद्रोह
- 1831-32 कोल विद्रोह — बुधु भगत
- 1832-33 भूमिज विद्रोह — गंगा नारायण सिंह
- 1855-56 संथाल हूल — सिदो और कान्हू
- 1870 का दशक खेरवार और सफा होड़ — भगीरथ मांझी
- 1858-1890 का दशक सरदारी आंदोलन — गांव के सरदार
- 1899-1900 उलगुलान — बिरसा मुंडा
- 1914 ताना भगत — जतरा भगत
- परिणाम — 1834 एजेंसी, 1855 जिला, 1908 CNT अधिनियम
अब इन सभी विद्रोहों पर मिश्रित प्रश्न ExamAtlas मॉक टेस्ट में प्रैक्टिस करें — झारखंड GK के JPSC और JSSC दोनों पैटर्न में।
