अलंकार: शब्दालंकार एवं अर्थालंकार
अलंकार: शब्दालंकार एवं अर्थालंकार
अलंकार से 2 से 3 प्रश्न आते हैं और इनमें पंक्ति देकर अलंकार पहचानने को कहा जाता है। इसलिए परिभाषा से अधिक काम आती है पहचान — कौन-सा शब्द या रचना-विशेष किस अलंकार का संकेत देता है, यही याद रखना चाहिए।
दो मुख्य भेद
जहाँ शब्द के कारण चमत्कार हो वह शब्दालंकार, और जहाँ अर्थ के कारण चमत्कार हो वह अर्थालंकार है। परख यह है कि शब्द बदल देने पर चमत्कार बचता है या नहीं — बचे तो अर्थालंकार, न बचे तो शब्दालंकार।
| शब्दालंकार | पहचान |
|---|---|
| अनुप्रास | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति |
| यमक | एक शब्द बार-बार, हर बार अर्थ अलग |
| श्लेष | एक शब्द एक बार, पर अर्थ अनेक |
| वक्रोक्ति | कही बात का दूसरा अर्थ निकालना |
यमक और श्लेष का अंतर सबसे अधिक पूछा जाता है और सबसे अधिक गलत होता है। यमक में शब्द दोहराया जाता है, श्लेष में एक ही बार आता है पर उसके दो अर्थ निकलते हैं।
✗ श्लेष में शब्द बार-बार आता है | ✓ बार-बार आने पर वह यमक होगा; श्लेष में शब्द एक बार आकर अनेक अर्थ देता है
प्रमुख अर्थालंकार
| अलंकार | पहचान | संकेत शब्द |
|---|---|---|
| उपमा | दो वस्तुओं की समानता | सा, सम, जैसा, सी |
| रूपक | उपमेय पर उपमान का आरोप | कोई वाचक शब्द नहीं |
| उत्प्रेक्षा | संभावना की कल्पना | मनु, जनु, मानो, ज्यों |
| अतिशयोक्ति | बहुत बढ़ाकर कहना | — |
| मानवीकरण | जड़ में मनुष्य का व्यवहार | — |
| विरोधाभास | विरोध दिखे पर हो नहीं | — |
उपमा के चार अंग परीक्षा में सीधे पूछे जाते हैं — उपमेय (जिसकी तुलना हो), उपमान (जिससे तुलना हो), वाचक शब्द (सा, जैसा) और साधारण धर्म (समान गुण)।
उपमा और रूपक का भेद वाचक शब्द से तय होता है। मुख चंद्रमा के समान है — यह उपमा है; मुख चंद्रमा है — यह रूपक, क्योंकि यहाँ भेद मिटाकर आरोप कर दिया गया।
तेज़ पहचान का नियम: सा, सम, जैसा दिखे तो उपमा; मनु, जनु, मानो दिखे तो उत्प्रेक्षा; कोई वाचक न हो और सीधा आरोप हो तो रूपक। तीन संकेतों से अधिकांश प्रश्न हल हो जाते हैं।
TRE संकेत: यमक और श्लेष का अंतर तथा उपमा और रूपक का अंतर — दो जोड़े ही इस विषय के अधिकांश प्रश्न बनाते हैं। उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द मनु, जनु, मानो याद रखिए, ये सीधा उत्तर दे देते हैं। उपमा के चार अंग भी अलग से पूछे जाते हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- शब्द से चमत्कार हो तो शब्दालंकार, अर्थ से हो तो अर्थालंकार।
- अनुप्रास में एक वर्ण की आवृत्ति होती है।
- यमक में शब्द दोहराया जाता है, श्लेष में एक बार आकर अनेक अर्थ देता है।
- उपमा के चार अंग — उपमेय, उपमान, वाचक शब्द और साधारण धर्म।
- रूपक में वाचक शब्द नहीं होता, उपमेय पर उपमान का आरोप होता है।
- मनु, जनु और मानो उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यमक और श्लेष अलंकार में क्या अंतर है?
यमक में एक ही शब्द पंक्ति में बार-बार आता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है। श्लेष में शब्द केवल एक बार आता है, पर उसी एक प्रयोग से दो या अधिक अर्थ निकलते हैं। शब्द की आवृत्ति ही दोनों का भेद तय करती है।
उपमा और रूपक में अंतर कैसे पहचानें?
वाचक शब्द से। यदि सा, सम, जैसा या सी जैसा तुलनावाचक शब्द है तो उपमा है, जैसे मुख चंद्रमा के समान है। यदि वाचक शब्द नहीं है और उपमेय पर उपमान का सीधा आरोप कर दिया गया है तो रूपक है, जैसे मुख चंद्रमा है।
उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान क्या है?
उसमें उपमेय में उपमान की संभावना की कल्पना की जाती है और प्रायः मनु, जनु, मानो, जानो या ज्यों जैसे वाचक शब्द आते हैं। इन शब्दों का दिखना ही सबसे तेज़ पहचान है और परीक्षा में यह प्रश्न बार-बार दोहराया जाता है।
मानवीकरण अलंकार क्या है?
जब किसी जड़ वस्तु या प्रकृति के अंग में मनुष्य जैसा व्यवहार, भाव या क्रिया दिखाई जाए, तब मानवीकरण होता है। छायावादी कविता में यह अलंकार सबसे अधिक मिलता है, क्योंकि वहाँ प्रकृति को सजीव व्यक्ति की तरह चित्रित किया गया है।
