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ब्रिटिश भू-राजस्व नीति एवं आर्थिक प्रभाव

British Land Revenue Policy and Its Economic Impact

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यह अध्याय बिहार के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि स्थायी बंदोबस्त यहीं लागू हुआ और नील की खेती का सबसे बड़ा संघर्ष भी यहीं हुआ। प्रश्न प्रायः तीन व्यवस्थाओं के अंतर और उनके क्षेत्र पर आते हैं।

तीन व्यवस्थाएँ

व्यवस्थाकिसनेकहाँकिससे वसूली
स्थायी बंदोबस्तकॉर्नवालिस, 1793बंगाल, बिहार, उड़ीसाज़मींदार
रैयतवाड़ीरीड और मुनरोमद्रास, बंबईसीधे किसान
महालवाड़ीमैकेंज़ीउत्तर-पश्चिम, पंजाबगाँव या महाल

स्थायी बंदोबस्त में कर की राशि हमेशा के लिए तय कर दी गई और ज़मींदार को भूमि का स्वामी मान लिया गया। शर्त यह थी कि तय तिथि तक राशि न जमा हुई तो ज़मींदारी नीलाम हो जाएगी, जिसे सूर्यास्त कानून कहा जाता था।

इसका परिणाम यह हुआ कि ज़मींदार किसान से कठोरता से वसूली करने लगा, क्योंकि उसका अपना पद दाँव पर था। किसान के पास कोई अधिकार पत्र नहीं था, इसलिए वह पूरी तरह असुरक्षित हो गया।

✗ स्थायी बंदोबस्त से किसान को लाभ हुआ क्योंकि कर तय हो गया  |  ✓ कर ज़मींदार के लिए तय हुआ था, किसान के लिए नहीं; किसान से वसूली और कठोर हो गई

बिहार में इसका इतना असर क्यों

बिहार में यह व्यवस्था लागू होने के कारण यहाँ ज़मींदारी बहुत मज़बूत हो गई और किसान की स्थिति सबसे कमज़ोर। यही कारण है कि आगे चलकर देश का पहला बड़ा किसान आंदोलन भी बिहार से ही उठा।

  • किसान को बेदख़ली का लगातार डर रहता था।
  • अबवाब नामक अनेक अवैध वसूलियाँ लगाई जाती थीं।
  • बेगारी यानी बिना मज़दूरी काम कराने की प्रथा चलती थी।
  • विवाद की स्थिति में किसान के पास कोई लिखित प्रमाण नहीं होता था।

आर्थिक प्रभाव

ब्रिटिश आर्थिक नीति का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय हस्तशिल्प का पतन था। इंग्लैंड से आया मशीन निर्मित कपड़ा सस्ता था और भारतीय कपड़े पर वहाँ भारी शुल्क लगा दिया गया, जिससे बुनकर बेरोज़गार हो गए।

  • भारत कच्चा माल भेजने और तैयार माल मँगाने वाला देश बन गया।
  • धन का निष्कासन हुआ, यानी भारत से धन बिना बराबर के बदले के इंग्लैंड जाता रहा।
  • बेरोज़गार कारीगर खेती पर लौटे, जिससे भूमि पर दबाव बढ़ा।
  • वाणिज्यिक फ़सलों पर ज़ोर बढ़ा, जिससे अनाज की खेती घटी और अकाल का ख़तरा बढ़ा।

दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक में इसी धन निष्कासन का सिद्धांत रखा, जो राष्ट्रीय आंदोलन की आर्थिक आलोचना का आधार बना। यह तथ्य सीधे पूछा जाता है।

नील और बिहार

चंपारण में किसानों को तीन कठिया व्यवस्था के तहत अपनी भूमि के एक निश्चित हिस्से में नील उगाने के लिए बाध्य किया जाता था। नील से भूमि की उर्वरता घटती थी और उसका दाम भी किसान को बहुत कम मिलता था।

जब जर्मनी में कृत्रिम रंग बनने लगा तो नील की माँग गिर गई, पर बागान मालिकों ने क्षतिपूर्ति किसानों से वसूलनी चाही। इसी असंतोष ने 1917 के चंपारण सत्याग्रह का रास्ता बनाया, जो गांधीजी का भारत में पहला सत्याग्रह था।

तीनों भू-राजस्व व्यवस्थाओं को इस एक प्रश्न से अलग कीजिए — कर किससे वसूला जा रहा है। ज़मींदार से तो स्थायी बंदोबस्त, किसान से तो रैयतवाड़ी, और गाँव से तो महालवाड़ी।

TRE संकेत: स्थायी बंदोबस्त 1793 कॉर्नवालिस लगभग हर बार आता है। तीन कठिया व्यवस्था बिहार से सबसे अधिक पूछा जाने वाला तथ्य है। दादाभाई नौरोजी का धन निष्कासन सिद्धांत भी सीधे आया है।

60 सेकंड का रिवीजन

  • स्थायी बंदोबस्त 1793 में कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू किया।
  • इसमें कर की राशि स्थायी रूप से तय कर दी गई थी।
  • रैयतवाड़ी में सीधे किसान से और महालवाड़ी में गाँव से वसूली होती थी।
  • ब्रिटिश नीति से भारतीय हस्तशिल्प का पतन हुआ।
  • दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन का सिद्धांत दिया।
  • चंपारण में तीन कठिया व्यवस्था के तहत नील उगाना पड़ता था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्थायी बंदोबस्त से किसान को नुकसान क्यों हुआ?

क्योंकि कर की राशि ज़मींदार के लिए तय हुई थी, किसान के लिए नहीं। ज़मींदार को हर हाल में तय तिथि तक राशि जमा करनी थी, वरना उसकी ज़मींदारी नीलाम हो जाती। इसलिए वह किसान से कठोरता से वसूली करता था, और किसान के पास कोई अधिकार पत्र न होने से वह पूरी तरह असुरक्षित था।

धन निष्कासन का सिद्धांत क्या है?

दादाभाई नौरोजी ने बताया कि भारत से लगातार धन इंग्लैंड जा रहा है और उसके बदले भारत को बराबर का कुछ नहीं मिल रहा। यह धन वेतन, पेंशन, सैन्य खर्च और लाभांश के रूप में जाता था। यही विश्लेषण राष्ट्रीय आंदोलन की आर्थिक आलोचना का आधार बना।

भारतीय हस्तशिल्प का पतन क्यों हुआ?

इंग्लैंड में मशीनों से बना सस्ता कपड़ा भारत में बिना रोक-टोक आने लगा, जबकि भारतीय कपड़े पर इंग्लैंड में भारी शुल्क लगा दिया गया। इस असमान व्यवस्था में भारतीय बुनकर टिक नहीं सका। बेरोज़गार कारीगर खेती की ओर लौटे, जिससे भूमि पर दबाव और बढ़ गया।

तीन कठिया व्यवस्था क्या थी?

चंपारण में किसानों को अपनी भूमि के एक निश्चित हिस्से में अनिवार्य रूप से नील उगाना पड़ता था। नील से भूमि की उर्वरता घटती थी और उसका दाम भी बहुत कम मिलता था। जब कृत्रिम रंग आने से नील की माँग गिरी तो बागान मालिकों ने क्षतिपूर्ति किसानों से माँगी, जिससे चंपारण सत्याग्रह हुआ।

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