स्वास्थ्य, रोग एवं पोषण संबंधी विकार
स्वास्थ्य, रोग एवं पोषण संबंधी विकार
इस भाग से प्रश्न लगभग निश्चित रूप से आता है और वह अधिकतर यही होता है कि किस विटामिन की कमी से कौन-सा रोग होता है। साथ ही संचारी और असंचारी रोगों का अंतर भी पूछा जाता है। दोनों तालिकाएँ बनाकर याद करना सबसे अच्छा तरीका है।
भोजन के घटक
| घटक | कार्य | स्रोत |
|---|---|---|
| कार्बोहाइड्रेट | ऊर्जा देना | चावल, गेहूँ, आलू, चीनी |
| प्रोटीन | शरीर की वृद्धि; निर्माणकारी भोजन | दाल, दूध, अंडा, मछली, सोयाबीन |
| वसा | ऊर्जा का संचय | घी, तेल, मक्खन, मेवे |
| विटामिन एवं खनिज | रोगों से रक्षा; संरक्षी भोजन | फल और हरी सब्ज़ियाँ |
| रूक्षांश | पाचन में सहायता | छिलके सहित अनाज, सब्ज़ियाँ |
| जल | सभी क्रियाओं के लिए | पानी, फल, दूध |
प्रोटीन को शरीर निर्माणकारी और विटामिन-खनिज को संरक्षी भोजन कहा जाता है। जिस भोजन में सारे घटक उचित मात्रा में हों उसे संतुलित आहार कहते हैं। रूक्षांश स्वयं पचता नहीं, पर वह कब्ज़ से बचाता है।
पोषण की कमी से होने वाले रोग
| कमी | रोग | लक्षण |
|---|---|---|
| विटामिन-ए | रतौंधी | मंद प्रकाश में न दिखना |
| विटामिन-बी1 | बेरी-बेरी | माँसपेशियों की कमज़ोरी |
| विटामिन-सी | स्कर्वी | मसूड़ों से रक्त आना |
| विटामिन-डी | रिकेट्स | हड्डियों का टेढ़ा होना |
| आयरन | रक्ताल्पता | थकान और पीलापन |
| आयोडीन | घेंघा | गर्दन में सूजन |
| प्रोटीन | क्वाशियोरकर | वृद्धि रुकना, सूजन |
विटामिन-डी सूर्य के प्रकाश से त्वचा में स्वयं बनता है, इसीलिए उसे धूप वाला विटामिन कहते हैं। विटामिन-सी आँवला, नींबू और संतरे में मिलता है, और वह पानी में घुलनशील होने के कारण शरीर में संचित नहीं रहता — इसलिए रोज़ लेना पड़ता है।
✗ विटामिन-सी की कमी से रतौंधी होती है | ✓ रतौंधी विटामिन-ए की कमी से होती है; विटामिन-सी की कमी से स्कर्वी होता है
संचारी और असंचारी रोग
| वर्ग | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| संचारी | एक व्यक्ति से दूसरे तक फैलने वाले | हैजा, क्षय, मलेरिया, डेंगू, खसरा |
| असंचारी | न फैलने वाले | मधुमेह, रक्ताल्पता, उच्च रक्तचाप, स्कर्वी |
संचारी रोग जल, वायु, भोजन, संपर्क या वाहक जीवों से फैलते हैं। पोषण की कमी से होने वाले सभी रोग असंचारी होते हैं, क्योंकि वे किसी सूक्ष्मजीव से नहीं, आहार की कमी से होते हैं। यह वर्गीकरण परीक्षा में सीधे पूछा जाता है।
व्यवहार में जन स्वास्थ्य
- स्वच्छ पेयजल सबसे बड़ा बचाव है; उबालना या क्लोरीन डालना पर्याप्त होता है।
- टीकाकरण से पोलियो, खसरा और क्षय जैसे रोगों से बचाव होता है।
- हाथ धोना और खुले में शौच न करना संक्रमण की कड़ी तोड़ देता है।
- ठहरा हुआ पानी हटाने से मच्छर पनपते नहीं।
भारत में पोलियो का उन्मूलन टीकाकरण से ही संभव हुआ और चेचक पूरी दुनिया से समाप्त किया जा चुका है। यह दिखाता है कि रोकथाम इलाज से सस्ती और अधिक प्रभावी होती है।
विटामिन और रोग की जोड़ी याद रखने का सरल तरीका — ए से आँख, बी से बेरी-बेरी, सी से स्कर्वी और डी से हड्डी। यह क्रम ही अधिकांश प्रश्नों का उत्तर दे देता है।
TRE संकेत: विटामिन-ए की कमी से रतौंधी और सी से स्कर्वी — यह जोड़ी लगभग हर बार आती है। आयोडीन की कमी से घेंघा भी तयशुदा है। प्रोटीन शरीर निर्माणकारी भोजन है और पोषण जनित रोग असंचारी होते हैं — दोनों सीधे पूछे गए हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- प्रोटीन शरीर निर्माणकारी और विटामिन-खनिज संरक्षी भोजन कहलाते हैं।
- विटामिन-ए की कमी से रतौंधी और सी की कमी से स्कर्वी होता है।
- विटामिन-डी सूर्य के प्रकाश से त्वचा में बनता है।
- आयरन की कमी से रक्ताल्पता और आयोडीन की कमी से घेंघा होता है।
- संचारी रोग फैलते हैं, असंचारी नहीं फैलते।
- पोषण की कमी से होने वाले सभी रोग असंचारी होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संतुलित आहार किसे कहते हैं?
जिस आहार में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज, रूक्षांश और जल सभी उचित मात्रा में हों, उसे संतुलित आहार कहते हैं। केवल पेट भर जाना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि किसी एक घटक की लगातार कमी रहने पर उससे जुड़ा रोग हो सकता है।
विटामिन-डी को धूप वाला विटामिन क्यों कहते हैं?
क्योंकि सूर्य के प्रकाश में मौजूद पराबैंगनी किरणें त्वचा में मौजूद पदार्थ को विटामिन-डी में बदल देती हैं। इसीलिए नियमित धूप लेने वालों में इसकी कमी कम होती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स और बड़ों में हड्डियों की कमज़ोरी हो जाती है।
विटामिन-सी रोज़ क्यों लेना पड़ता है?
विटामिन-सी पानी में घुलनशील होता है, इसलिए शरीर उसे संचित करके नहीं रख पाता और अतिरिक्त मात्रा मूत्र के साथ निकल जाती है। इसी कारण उसकी आपूर्ति रोज़ करनी पड़ती है। आँवला, नींबू, संतरा और अमरूद इसके सस्ते और अच्छे स्रोत हैं।
पोषण जनित रोग संचारी क्यों नहीं होते?
क्योंकि वे किसी जीवाणु, विषाणु या प्रोटोज़ोआ से नहीं होते, बल्कि आहार में किसी पोषक तत्व की लंबे समय तक कमी रहने से होते हैं। इसलिए वे एक व्यक्ति से दूसरे तक नहीं फैल सकते। उनका उपचार भी दवा से अधिक आहार सुधारने से होता है।
