स्थलमंडल: भू-आकृतियाँ, चट्टानें एवं मृदा
Lithosphere: Landforms, Rocks and Soil
इस विषय से 1 से 2 प्रश्न आते हैं और तीनों हिस्से वर्गीकरण पर टिके हैं — पृथ्वी की परतें, चट्टानों के तीन प्रकार और भारत की मृदाएँ। हर वर्ग के साथ एक उदाहरण जोड़कर याद कीजिए, परिभाषा अलग से रटने की ज़रूरत नहीं।
पृथ्वी की आंतरिक संरचना एवं भू-आकृतियाँ
| परत | विवरण |
|---|---|
| भूपर्पटी | सबसे बाहरी और सबसे पतली परत |
| मैंटल | बीच की परत, सबसे मोटी |
| क्रोड | सबसे भीतरी; मुख्यतः लोहा और निकल |
भूकंप की उत्पत्ति स्थान को भूकंप मूल और उसके ठीक ऊपर सतह के बिंदु को अधिकेंद्र कहते हैं। भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर मापी जाती है और यंत्र का नाम सिस्मोग्राफ़ है।
✗ भूकंप की तीव्रता सिस्मोग्राफ़ पैमाने पर मापी जाती है | ✓ पैमाना रिक्टर है; सिस्मोग्राफ़ मापने वाला यंत्र है
चट्टानों के तीन प्रकार
| प्रकार | कैसे बनी | उदाहरण |
|---|---|---|
| आग्नेय | मैग्मा के ठंडा होने से | ग्रेनाइट, बेसाल्ट |
| अवसादी | परतों के जमाव से | बलुआ पत्थर, चूना पत्थर |
| कायांतरित | ताप और दाब से रूप बदलने पर | संगमरमर, स्लेट |
कायांतरित चट्टानों के रूपांतरण जोड़े में पूछे जाते हैं — चूना पत्थर से संगमरमर, शेल से स्लेट, और कोयले से ग्रेफ़ाइट। जीवाश्म केवल अवसादी चट्टानों में मिलते हैं, यह भी तय प्रश्न है।
आग्नेय चट्टान को प्राथमिक या मूल चट्टान कहा जाता है, क्योंकि सबसे पहले वही बनी और शेष दोनों प्रकार उसी से विकसित हुए।
भारत की मृदाएँ
| मृदा | क्षेत्र | उपयुक्त फ़सल |
|---|---|---|
| जलोढ़ | उत्तरी मैदान, सबसे व्यापक | गेहूँ, चावल, गन्ना |
| काली | दक्कन का पठार | कपास |
| लाल | दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीप | बाजरा, मूँगफली |
| लैटेराइट | अधिक वर्षा वाले क्षेत्र | चाय, कॉफ़ी, काजू |
| मरुस्थलीय | राजस्थान | बाजरा |
काली मृदा और कपास का जोड़ा सबसे अधिक पूछा जाता है। इसे रेगुर मृदा भी कहते हैं और यह नमी बहुत देर तक रोके रखती है, इसीलिए कम वर्षा में भी कपास के लिए उपयुक्त है।
बिहार की मृदा जलोढ़ है, क्योंकि पूरा राज्य नदियों द्वारा बनाए गए मैदान में स्थित है। यही उसकी उर्वरता और खनिज की कमी दोनों का कारण है।
मृदा और फ़सल का जोड़ा याद रखिए, क्षेत्र अपने आप याद आ जाएगा — काली से कपास, लैटेराइट से चाय और कॉफ़ी, जलोढ़ से गेहूँ और चावल।
TRE संकेत: रिक्टर पैमाना बनाम सिस्मोग्राफ़ यंत्र वाला अंतर तयशुदा जाल है। जीवाश्म केवल अवसादी चट्टान में और चूना पत्थर से संगमरमर दो तय प्रश्न हैं। काली मृदा और कपास का जोड़ा सबसे अधिक आता है। बिहार के लिए यह याद रखिए कि पूरा राज्य जलोढ़ मृदा पर है।
60 सेकंड का रिवीजन
- पृथ्वी की तीन परतें — भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड।
- भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर, यंत्र सिस्मोग्राफ़ है।
- चट्टानें तीन प्रकार की — आग्नेय, अवसादी और कायांतरित।
- जीवाश्म केवल अवसादी चट्टानों में मिलते हैं।
- चूना पत्थर से संगमरमर और शेल से स्लेट बनती है।
- काली मृदा कपास के लिए और जलोढ़ गेहूँ-चावल के लिए उपयुक्त है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जीवाश्म किस प्रकार की चट्टान में मिलते हैं?
केवल अवसादी चट्टानों में, क्योंकि वे परतों के धीरे-धीरे जमाव से बनती हैं और उसी प्रक्रिया में जीव-जंतुओं के अवशेष दबकर सुरक्षित रह जाते हैं। आग्नेय चट्टान अत्यधिक ताप से बनती है और कायांतरित में दाब से रूप बदल जाता है, इसलिए वहाँ जीवाश्म नहीं बचते।
काली मृदा कपास के लिए उपयुक्त क्यों है?
क्योंकि वह नमी को बहुत देर तक रोके रखती है, इसलिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी कपास की फ़सल चल जाती है। इसे रेगुर मृदा भी कहा जाता है और यह मुख्यतः दक्कन के पठार पर पाई जाती है, जहाँ बेसाल्ट चट्टान के टूटने से वह बनी है।
रिक्टर और सिस्मोग्राफ़ में क्या अंतर है?
रिक्टर एक पैमाना है, जिस पर भूकंप की तीव्रता का मान बताया जाता है। सिस्मोग्राफ़ वह यंत्र है जो भूकंपीय तरंगों को दर्ज करता है। एक मापने का पैमाना है और दूसरा मापने का उपकरण, इसलिए दोनों को आपस में बदल देना ग़लत होता है।
बिहार की प्रमुख मृदा कौन-सी है?
जलोढ़ मृदा, क्योंकि पूरा राज्य गंगा और उसकी सहायक नदियों द्वारा बनाए गए मैदान में स्थित है। यही मृदा उसे बहुत उपजाऊ बनाती है, और यही कारण है कि वहाँ खनिज लगभग नहीं मिलते, क्योंकि खनिज प्राचीन पठारी चट्टानों में होते हैं।
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