मौर्य साम्राज्य एवं अशोक
मौर्य साम्राज्य एवं अशोक
मौर्य काल बिहार की परीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भाग है, क्योंकि इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। प्रश्न प्रायः शासकों के क्रम, अशोक के कलिंग युद्ध और मौर्य प्रशासन के स्रोतों पर आते हैं, इसलिए इन तीनों को अलग-अलग देखिए।
वंश
चंद्रगुप्त मौर्य ने 321 ईसा पूर्व के आसपास नंद वंश को हटाकर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी। इसमें उनके गुरु चाणक्य की निर्णायक भूमिका थी, जिन्हें कौटिल्य और विष्णुगुप्त भी कहा जाता है।
| शासक | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| चंद्रगुप्त मौर्य | सेल्यूकस को हराया; अंत में जैन धर्म अपनाकर श्रवणबेलगोला गए |
| बिंदुसार | यूनानी उन्हें अमित्रघात कहते थे |
| अशोक | कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाया |
| बृहद्रथ | अंतिम शासक; पुष्यमित्र शुंग ने उनकी हत्या की |
मेगस्थनीज़ सेल्यूकस का राजदूत बनकर चंद्रगुप्त के दरबार में आया और उसने इंडिका लिखी। कौटिल्य का अर्थशास्त्र इस काल के प्रशासन का सबसे बड़ा स्रोत है।
अशोक और कलिंग
अशोक ने 261 ईसा पूर्व के आसपास कलिंग पर आक्रमण किया। उस युद्ध के भीषण रक्तपात ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने युद्ध सदा के लिए छोड़ दिया और बौद्ध धर्म अपना लिया। यह इतिहास का दुर्लभ उदाहरण है जहाँ विजय के बाद विजेता ने युद्ध त्याग दिया।
- उन्होंने धम्म का प्रचार किया, जो किसी एक संप्रदाय का नहीं बल्कि आचरण का सिद्धांत था।
- अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।
- उनके शिलालेख और स्तंभ लेख प्रायः प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं।
- सारनाथ का सिंह स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।
अशोक के अभिलेख जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में पढ़े थे, और उन्हीं से इस काल का विस्तृत ज्ञान मिला। तेरहवाँ शिलालेख कलिंग युद्ध के पश्चाताप का वर्णन करता है और सबसे अधिक पूछा जाता है।
✗ अशोक ने कलिंग युद्ध हार जाने के बाद बौद्ध धर्म अपनाया | ✓ वे कलिंग युद्ध जीते थे; उसकी हिंसा से विचलित होकर उन्होंने युद्ध छोड़ा
मौर्य प्रशासन
शासन अत्यंत केंद्रीकृत था। राजा सर्वोच्च था और उसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद थी। साम्राज्य प्रांतों में बँटा था और प्रांतों के प्रमुख प्रायः राजकुमार होते थे।
- जासूसी तंत्र बहुत विकसित था, जिसका विस्तृत वर्णन अर्थशास्त्र में मिलता है।
- सीता राजकीय भूमि से मिलने वाली आय थी और भाग भूमि कर।
- पाटलिपुत्र का प्रशासन छह समितियों के हाथ में था, ऐसा मेगस्थनीज़ ने लिखा है।
- धम्म महामात्र नामक अधिकारी अशोक ने धम्म प्रचार के लिए नियुक्त किए।
बिहार के लिए इसका महत्व
पाटलिपुत्र, यानी आज का पटना, उस समय दुनिया के सबसे बड़े नगरों में था और यहीं से लगभग पूरे उपमहाद्वीप का शासन चलता था। तीसरी बौद्ध संगीति भी यहीं हुई।
इसीलिए बिहार की परीक्षाओं में मौर्य काल पर प्रश्न लगभग निश्चित रहता है, और उसमें भी अशोक तथा पाटलिपुत्र से जुड़े तथ्य सबसे अधिक आते हैं।
मौर्य काल के तीन स्रोत अलग-अलग याद रखिए — कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्रशासन के लिए, मेगस्थनीज़ की इंडिका समाज के लिए, और अशोक के अभिलेख धम्म के लिए। प्रश्न प्रायः स्रोत ही पूछता है।
TRE संकेत: कलिंग युद्ध के बाद अशोक का बौद्ध धर्म अपनाना लगभग हर बार आता है। मेगस्थनीज़ की इंडिका और कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी तयशुदा हैं। जेम्स प्रिंसेप ने अभिलेख पढ़े और सारनाथ का सिंह स्तंभ राष्ट्रीय प्रतीक भी सीधे पूछे गए हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
- मेगस्थनीज़ ने इंडिका और कौटिल्य ने अर्थशास्त्र लिखा।
- अशोक ने कलिंग जीतकर भी युद्ध सदा के लिए त्याग दिया।
- अशोक के अभिलेख प्रायः प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं।
- जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में ये अभिलेख पढ़े।
- सारनाथ का सिंह स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कलिंग युद्ध का क्या महत्व है?
यह इतिहास का दुर्लभ उदाहरण है जहाँ विजेता ने विजय के बाद युद्ध ही छोड़ दिया। अशोक कलिंग जीत तो गए, पर उस युद्ध के भीषण रक्तपात ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने हिंसा त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया और शेष जीवन धम्म के प्रचार में लगाया।
मौर्य काल के प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?
तीन मुख्य स्रोत हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र, जो प्रशासन और राजनीति का विस्तृत विवरण देता है। मेगस्थनीज़ की इंडिका, जिसमें एक विदेशी की दृष्टि से समाज और नगर का वर्णन है। और अशोक के शिलालेख तथा स्तंभ लेख, जिनसे धम्म और शासन नीति का पता चलता है।
अशोक का धम्म क्या था?
यह किसी एक संप्रदाय का सिद्धांत नहीं, बल्कि आचरण का व्यावहारिक नियम था — बड़ों का आदर, जीवों पर दया, सत्य बोलना, दान देना और दूसरे संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता। अशोक ने इसके प्रचार के लिए धम्म महामात्र नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए।
पाटलिपुत्र का प्रशासन कैसा था?
मेगस्थनीज़ के अनुसार नगर का प्रशासन छह समितियों के हाथ में था, और हर समिति में पाँच सदस्य होते थे। इनके ज़िम्मे उद्योग, विदेशियों की देखरेख, जन्म-मृत्यु का लेखा, व्यापार, वस्तुओं का निरीक्षण और कर वसूली जैसे अलग-अलग काम थे।
