जंतुओं में पोषण एवं पाचन तंत्र
जंतुओं में पोषण एवं पाचन तंत्र
पाचन तंत्र से प्रश्न लगभग निश्चित है और वह प्रायः इसी पर होता है कि कौन-सा रस या एंज़ाइम कहाँ बनता है और क्या पचाता है। अंगों का क्रम और ग्रंथियों की जोड़ी बना लीजिए, फिर इस पूरे भाग से प्रश्न छूटेगा नहीं।
पोषण के पाँच चरण
- अंतर्ग्रहण — भोजन को शरीर के भीतर लेना।
- पाचन — जटिल भोजन को सरल रूप में तोड़ना।
- अवशोषण — पचे भोजन का रक्त में जाना।
- स्वांगीकरण — कोशिकाओं द्वारा उसका उपयोग।
- बहिष्करण — बिना पचे भाग को बाहर निकालना।
आहार नाल
आहार नाल मुख से गुदा तक फैली होती है और मनुष्य में इसकी लंबाई लगभग नौ मीटर होती है। मुख में लार मिलती है, जिसमें मौजूद एंज़ाइम मंड को शर्करा में बदलना शुरू कर देता है। इसीलिए रोटी को देर तक चबाने पर मीठी लगने लगती है।
| अंग | क्या होता है |
|---|---|
| मुख | चबाना और लार से मंड का आंशिक पाचन |
| ग्रसिका | क्रमाकुंचन से भोजन आमाशय तक |
| आमाशय | हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और पेप्सिन से प्रोटीन का पाचन |
| क्षुद्रांत्र | पूरा पाचन और अवशोषण; सबसे लंबा भाग |
| बृहदांत्र | जल और लवण का अवशोषण |
| मलाशय | अपशिष्ट का संचय और निष्कासन |
क्षुद्रांत्र में भीतर की ओर उँगली जैसे उभार होते हैं जिन्हें रसांकुर कहते हैं। ये अवशोषण के लिए सतह का क्षेत्रफल कई गुना बढ़ा देते हैं। पचा हुआ भोजन इन्हीं से रक्त में जाता है।
संबद्ध ग्रंथियाँ
| ग्रंथि | स्राव | कार्य |
|---|---|---|
| लार ग्रंथि | लार | मंड का आंशिक पाचन |
| यकृत | पित्त | वसा का पायसीकरण; शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि |
| अग्न्याशय | अग्न्याशयी रस | तीनों — मंड, प्रोटीन और वसा पर काम |
यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है और उसका बनाया पित्त पित्ताशय में संचित रहता है। पित्त में कोई एंज़ाइम नहीं होता, वह केवल वसा की बड़ी बूँदों को छोटी बूँदों में तोड़ता है ताकि एंज़ाइम आसानी से काम कर सकें।
आमाशय का हाइड्रोक्लोरिक अम्ल दो काम करता है — भोजन के साथ आए रोगाणुओं को मारता है और पेप्सिन को काम करने लायक अम्लीय वातावरण देता है।
✗ पित्त में वसा पचाने वाला एंज़ाइम होता है | ✓ पित्त में कोई एंज़ाइम नहीं होता; वह केवल वसा का पायसीकरण करता है
दूसरे जंतुओं में पाचन
- अमीबा कूटपाद बनाकर भोजन को घेर लेता है, इसे भक्षण कहते हैं।
- गाय और भैंस रोमंथी हैं; वे जल्दी से घास निगलकर बाद में जुगाली करती हैं।
- इनके आमाशय में रुमेन नामक भाग होता है जहाँ सूक्ष्मजीव सेलुलोस पचाते हैं।
- मनुष्य सेलुलोस नहीं पचा सकता, क्योंकि उसमें ऐसा एंज़ाइम नहीं होता।
पाचन के प्रश्न हल करने का सरल तरीका — याद रखिए कि प्रोटीन का पाचन आमाशय में शुरू होता है, मंड का मुख में और वसा का क्षुद्रांत्र में। पूरा पाचन तीनों का क्षुद्रांत्र में ही पूरा होता है।
TRE संकेत: यकृत सबसे बड़ी ग्रंथि है और पित्त में एंज़ाइम नहीं होता — दोनों तयशुदा प्रश्न हैं। रसांकुर क्षुद्रांत्र में होते हैं, यह सीधे पूछा जाता है। गाय रोमंथी है और मनुष्य सेलुलोस नहीं पचा सकता वाला बिंदु भी आ चुका है।
60 सेकंड का रिवीजन
- पोषण के पाँच चरण अंतर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण और बहिष्करण हैं।
- लार में उपस्थित एंज़ाइम मंड का पाचन मुख में ही शुरू कर देता है।
- आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और पेप्सिन प्रोटीन पर काम करते हैं।
- क्षुद्रांत्र सबसे लंबा भाग है और वहीं रसांकुर से अवशोषण होता है।
- यकृत सबसे बड़ी ग्रंथि है और पित्त वसा का पायसीकरण करता है।
- गाय-भैंस रोमंथी हैं और उनके रुमेन में सेलुलोस पचता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रोटी को देर तक चबाने पर मीठी क्यों लगती है?
रोटी में मंड होता है, जो स्वयं मीठा नहीं होता। मुख में मिलने वाली लार में एक एंज़ाइम होता है जो मंड को तोड़कर शर्करा में बदलने लगता है। जितनी देर चबाते रहेंगे, उतनी अधिक शर्करा बनेगी और मिठास बढ़ती जाएगी। पाचन की शुरुआत यहीं से हो जाती है।
पित्त में एंज़ाइम न होने पर भी वह पाचन में क्यों ज़रूरी है?
वसा पानी में नहीं घुलती और बड़ी बूँदों के रूप में रहती है, जिन पर एंज़ाइम ठीक से काम नहीं कर पाते। पित्त इन बड़ी बूँदों को तोड़कर बहुत छोटी बूँदों में बदल देता है, जिससे उनका सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है। इसी को पायसीकरण कहते हैं और उसके बाद एंज़ाइम आसानी से काम कर लेते हैं।
गाय जुगाली क्यों करती है?
गाय घास को जल्दी-जल्दी निगलकर आमाशय के रुमेन नामक भाग में जमा कर लेती है, जहाँ सूक्ष्मजीव सेलुलोस को तोड़ने लगते हैं। बाद में आराम करते समय वह इस अधपचे भोजन को मुँह में वापस लाकर धीरे-धीरे चबाती है। इसी क्रिया को जुगाली कहते हैं।
क्षुद्रांत्र में रसांकुर क्यों होते हैं?
पचे हुए भोजन को रक्त में पहुँचाने के लिए अधिक से अधिक सतह चाहिए। रसांकुर उँगली जैसे असंख्य उभार हैं जो भीतरी सतह का क्षेत्रफल कई गुना बढ़ा देते हैं। हर रसांकुर में रक्त वाहिकाएँ होती हैं, इसलिए अवशोषण तेज़ी से और भरपूर मात्रा में हो पाता है।
