भारत छोड़ो आंदोलन 1942 एवं बिहार का योगदान
Quit India Movement, 1942 and Bihar's Contribution
यह विषय 1 से 2 प्रश्न देता है और बिहार के पत्र में इसकी संभावना और बढ़ जाती है, क्योंकि 11 अगस्त 1942 की पटना सचिवालय की घटना इसी आंदोलन का हिस्सा है। तीन तिथियाँ अलग-अलग हैं और वही जाल बनाती हैं।
पृष्ठभूमि: क्रिप्स मिशन एवं बंबई प्रस्ताव
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारत का सहयोग पाने के लिए 1942 में क्रिप्स मिशन भारत आया, पर उसने केवल युद्ध के बाद औपनिवेशिक स्वशासन का आश्वासन दिया, तत्काल कुछ नहीं। कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया।
इसके बाद 8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। इसी अवसर पर गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया।
अगली सुबह 9 अगस्त 1942 को गांधी जी सहित लगभग सभी बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए। नेतृत्व के बिना ही आंदोलन पूरे देश में फैल गया — यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
✗ भारत छोड़ो प्रस्ताव 9 अगस्त को पारित हुआ | ✓ प्रस्ताव 8 अगस्त को पारित हुआ; 9 अगस्त को नेता गिरफ़्तार हुए
पटना सचिवालय, 11 अगस्त 1942
यहीं बिहार का सबसे बड़ा योगदान आता है, और अधिकांश उम्मीदवार केवल 8 अगस्त तक ही जानते हैं। 11 अगस्त 1942 को पटना में विद्यार्थियों का एक जुलूस सचिवालय भवन पर तिरंगा फहराने निकला। पुलिस ने गोली चलाई और सात विद्यार्थी शहीद हो गए।
इन्हें सप्त शहीद कहा जाता है और पटना सचिवालय के सामने उनकी स्मृति में शहीद स्मारक बना हुआ है। यह घटना बिहार के पत्र में सीधे पूछी जा सकती है, इसलिए तिथि और संख्या दोनों याद रखिए।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 8 अगस्त 1942 | बंबई में भारत छोड़ो प्रस्ताव, करो या मरो का नारा |
| 9 अगस्त 1942 | गांधी जी सहित बड़े नेताओं की गिरफ़्तारी |
| 11 अगस्त 1942 | पटना सचिवालय पर गोलीकांड, सात विद्यार्थी शहीद |
आंदोलन का स्वरूप
- नेतृत्व गिरफ़्तार होने के कारण यह जनता का स्वतःस्फूर्त आंदोलन बन गया।
- कई स्थानों पर समानांतर सरकारें बनीं, जैसे बलिया, सतारा और तामलुक में।
- जयप्रकाश नारायण भूमिगत रहकर आंदोलन चलाते रहे; वे बिहार से थे।
- रेल, तार और डाक व्यवस्था पर हमले हुए, जिससे प्रशासन ठप पड़ा।
जयप्रकाश नारायण का नाम बिहार की कड़ी में विशेष है — वे हज़ारीबाग जेल से निकलकर भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व करते रहे। बाद में वे 1970 के दशक के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के भी नेता बने।
तीन तिथियाँ एक साथ रखिए — 8 प्रस्ताव, 9 गिरफ़्तारी, 11 पटना। अधिकांश उम्मीदवार केवल 8 अगस्त जानते हैं, और यहीं आपको बढ़त मिलती है।
TRE संकेत: 11 अगस्त 1942 का पटना सचिवालय और सप्त शहीद — यह बिहार के पत्र का सबसे संभावित प्रश्न है और बाज़ार की अधिकांश सामग्री में यह विस्तार से नहीं मिलता। 8 और 9 अगस्त का अंतर भी याद रखिए। जयप्रकाश नारायण का भूमिगत नेतृत्व राज्य की कड़ी में जोड़कर रखिए।
60 सेकंड का रिवीजन
- क्रिप्स मिशन 1942 में आया और कांग्रेस ने उसे अस्वीकार किया।
- 8 अगस्त 1942 को बंबई में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ।
- करो या मरो का नारा गांधी जी ने उसी अवसर पर दिया।
- 9 अगस्त 1942 को सभी बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए।
- 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर सात विद्यार्थी शहीद हुए।
- जयप्रकाश नारायण भूमिगत रहकर आंदोलन का नेतृत्व करते रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत छोड़ो आंदोलन में बिहार का सबसे बड़ा योगदान क्या रहा?
11 अगस्त 1942 की पटना सचिवालय की घटना, जिसमें विद्यार्थियों का जुलूस सचिवालय पर तिरंगा फहराने गया और पुलिस की गोली से सात विद्यार्थी शहीद हो गए। उन्हें सप्त शहीद कहा जाता है और सचिवालय के सामने उनका स्मारक बना है।
8 अगस्त और 9 अगस्त 1942 में क्या अंतर है?
8 अगस्त को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ और गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया। 9 अगस्त की सुबह गांधी जी सहित लगभग सभी बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए। दोनों तिथियाँ विकल्पों में साथ रखी जाती हैं।
नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद आंदोलन कैसे चला?
वह जनता का स्वतःस्फूर्त आंदोलन बन गया। कई स्थानों पर समानांतर सरकारें बनीं, जैसे बलिया, सतारा और तामलुक में। रेल, तार और डाक व्यवस्था पर हमलों से प्रशासन ठप पड़ गया। जयप्रकाश नारायण जैसे नेता भूमिगत रहकर इसे चलाते रहे।
क्रिप्स मिशन क्यों अस्वीकार किया गया?
क्योंकि उसने केवल युद्ध समाप्त होने के बाद औपनिवेशिक स्वशासन का आश्वासन दिया था, तत्काल कोई अधिकार नहीं। कांग्रेस तत्काल सत्ता हस्तांतरण चाहती थी, इसलिए प्रस्ताव अस्वीकार हुआ और उसी के बाद भारत छोड़ो आंदोलन की भूमिका बनी।
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