रस: परिभाषा, अंग एवं भेद
रस: परिभाषा, अंग एवं भेद
काव्यशास्त्र से लगभग 8 प्रश्न आते हैं और रस अकेले 2 से 3 देता है। परीक्षा रसों की संख्या, हर रस का स्थायी भाव और रस के चार अंग पूछती है, इसलिए रस और स्थायी भाव की जोड़ी वाली तालिका सबसे पहले पक्की कीजिए।
रस क्या है
काव्य पढ़ने या सुनने पर पाठक को जो आनंद मिलता है, वही रस है। भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में रस का सूत्र दिया और इसे भारतीय काव्यशास्त्र का पहला व्यवस्थित विवेचन माना जाता है। रस को काव्य की आत्मा कहा गया है।
रस के चार अंग
- स्थायी भाव — मन में स्थिर रहने वाला मूल भाव, जो पुष्ट होकर रस बनता है।
- विभाव — भाव जगाने वाला कारण; इसके दो भेद हैं आलंबन और उद्दीपन।
- अनुभाव — भाव के कारण शरीर पर दिखने वाली चेष्टाएँ।
- संचारी भाव — आते-जाते रहने वाले भाव, जिनकी संख्या 33 मानी गई है।
आलंबन वह व्यक्ति या वस्तु है जिसके कारण भाव जगे, और उद्दीपन वह परिस्थिति है जो उस भाव को और बढ़ाए। यह भेद सीधे पूछा जाता है, इसलिए दोनों नाम अलग-अलग याद रखिए।
✗ संचारी भाव ही रस का स्थायी आधार है | ✓ स्थायी भाव आधार है; संचारी भाव आते-जाते रहते हैं
रस एवं उनके स्थायी भाव
| रस | स्थायी भाव |
|---|---|
| शृंगार | रति |
| हास्य | हास |
| करुण | शोक |
| रौद्र | क्रोध |
| वीर | उत्साह |
| भयानक | भय |
| वीभत्स | जुगुप्सा |
| अद्भुत | विस्मय |
| शांत | निर्वेद |
| वात्सल्य | वत्सलता |
परंपरागत रूप से रस नौ माने गए हैं, जिन्हें नवरस कहते हैं। बाद के आचार्यों ने वात्सल्य को दसवाँ रस स्वीकार किया, और कुछ भक्ति को ग्यारहवाँ मानते हैं। प्रश्न में संख्या दिखे तो पहले देखिए कि नवरस पूछा गया है या उससे आगे।
शृंगार को रसराज कहा जाता है, क्योंकि साहित्य में इसका विस्तार सबसे अधिक है। इसके दो भेद हैं — संयोग शृंगार, जब नायक-नायिका साथ हों, और वियोग या विप्रलंभ शृंगार, जब वे अलग हों।
पहचान का सरल तरीका: पंक्ति पढ़कर देखिए कि उसमें कौन-सा भाव सबसे गहरा है। शोक हो तो करुण, क्रोध हो तो रौद्र, उत्साह हो तो वीर, घृणा हो तो वीभत्स। स्थायी भाव पहचान लिया तो रस अपने आप मिल जाता है।
TRE संकेत: रस और स्थायी भाव की तालिका ही इस विषय का पूरा उत्तर है, इसे पूरा याद कीजिए। वीभत्स का जुगुप्सा और शांत का निर्वेद सबसे अधिक गलत होते हैं। संचारी भाव 33, शृंगार रसराज और भरत मुनि का नाट्यशास्त्र — तीनों तय प्रश्न हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- रस काव्य से मिलने वाला आनंद है और उसे काव्य की आत्मा कहा गया है।
- भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में रस का सूत्र दिया।
- रस के चार अंग — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव।
- विभाव के दो भेद — आलंबन और उद्दीपन; संचारी भाव 33 हैं।
- परंपरागत रूप से नौ रस, वात्सल्य को दसवाँ माना जाता है।
- शृंगार रसराज है और उसके दो भेद संयोग तथा वियोग हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रस के चार अंग कौन-से हैं?
स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव। स्थायी भाव मन में स्थिर रहने वाला मूल भाव है, विभाव उसका कारण, अनुभाव शरीर पर दिखने वाली चेष्टाएँ और संचारी भाव आते-जाते रहने वाले भाव, जिनकी संख्या तैंतीस मानी गई है।
आलंबन और उद्दीपन विभाव में क्या अंतर है?
आलंबन वह व्यक्ति या वस्तु है जिसके कारण भाव उत्पन्न होता है, और उद्दीपन वह परिस्थिति या वातावरण है जो उस भाव को और तीव्र करता है। दोनों मिलकर विभाव कहलाते हैं और परीक्षा में इनका भेद अलग से पूछा जाता है।
हिंदी में कुल कितने रस माने जाते हैं?
परंपरागत रूप से नौ, जिन्हें नवरस कहा जाता है। बाद के आचार्यों ने वात्सल्य को दसवाँ रस स्वीकार किया और कुछ भक्ति को ग्यारहवाँ मानते हैं। प्रश्न के शब्दों पर ध्यान दीजिए, क्योंकि विकल्प नौ, दस और ग्यारह तीनों रखे जाते हैं।
वीभत्स और भयानक रस में क्या अंतर है?
वीभत्स का स्थायी भाव जुगुप्सा यानी घृणा है और यह किसी घिनौने दृश्य से जगता है। भयानक का स्थायी भाव भय है और यह डर पैदा करने वाले दृश्य से जगता है। दोनों अप्रिय भाव हैं, पर मूल भाव अलग होने से रस भी अलग हो जाता है।
