1857 का विद्रोह एवं उसके परिणाम
1857 का विद्रोह एवं उसके परिणाम
1857 से प्रश्न लगभग निश्चित है और वह प्रायः तीन बिंदुओं पर आता है — विद्रोह के कारण, किस स्थान का नेतृत्व किसने किया, और उसके बाद क्या बदला। तीनों को अलग-अलग देखिए, क्योंकि प्रश्न किसी एक पर केंद्रित रहता है।
कारण, वर्ग के अनुसार
| वर्ग | कारण |
|---|---|
| राजनीतिक | व्यपगत सिद्धांत से राज्यों का हड़पा जाना; अवध का विलय |
| आर्थिक | भारी कर, हस्तशिल्प का पतन, किसान की बदहाली |
| सामाजिक | सुधारों को धर्म में हस्तक्षेप मानना |
| सैनिक | भारतीय सैनिकों का कम वेतन और पदोन्नति में भेद |
| तात्कालिक | चर्बी लगे कारतूस की अफ़वाह |
चर्बी लगे कारतूस तात्कालिक कारण था, मूल कारण नहीं। यह अंतर परीक्षा में सीधे पूछा जाता है, इसलिए इसे स्पष्ट रखिए। विद्रोह की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई और मंगल पांडे ने उससे पहले बैरकपुर में विद्रोह किया था।
| स्थान | नेतृत्व |
|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह ज़फ़र |
| कानपुर | नाना साहब और तात्या टोपे |
| झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई |
| लखनऊ | बेगम हज़रत महल |
| बिहार, जगदीशपुर | कुँवर सिंह |
| फ़ैज़ाबाद | मौलवी अहमदुल्ला |
यह असफल क्यों हुआ
- विद्रोह पूरे देश में नहीं फैला; दक्षिण और पंजाब बड़े पैमाने पर अछूते रहे।
- कोई साझा नेतृत्व और साझा लक्ष्य नहीं था।
- अंग्रेज़ों के पास बेहतर हथियार, संचार और अनुशासन था।
- अनेक देशी रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया।
- विद्रोहियों के पास संसाधन और योजना की कमी थी।
असफलता के बावजूद इसका महत्व बहुत बड़ा है, क्योंकि इसने पहली बार व्यापक और सशस्त्र प्रतिरोध का उदाहरण खड़ा किया और आगे के आंदोलनों को स्मृति तथा प्रेरणा दी।
✗ 1857 का विद्रोह केवल सैनिकों का असंतोष था | ✓ सैनिक असंतोष तात्कालिक रूप था; इसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारण भी थे
इसके बाद क्या बदला
सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि 1858 के भारत शासन अधिनियम से शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से हटकर सीधे ब्रिटिश ताज के हाथ में चला गया।
- महारानी विक्टोरिया की घोषणा में देशी राजाओं को आश्वासन दिया गया।
- व्यपगत सिद्धांत समाप्त कर दिया गया।
- सेना में भारतीय और यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बदला गया।
- फूट डालो और राज करो की नीति अधिक स्पष्ट रूप से अपनाई गई।
- भारत के लिए भारत सचिव का पद बना।
बिहार और समग्र मूल्यांकन
बिहार में विद्रोह का नेतृत्व कुँवर सिंह ने किया, जो अस्सी वर्ष की आयु में जगदीशपुर से लड़े और अंग्रेज़ों को कई बार परास्त किया। उनका नाम राज्य की परीक्षा में लगभग हर बार आता है।
इस विद्रोह को अलग-अलग नाम दिए गए हैं — अंग्रेज़ों ने इसे सिपाही विद्रोह कहा, जबकि वी. डी. सावरकर ने इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा। दोनों दृष्टिकोणों को जानना परीक्षा के लिए उपयोगी है।
1857 के प्रश्न में सबसे पहले यह देखिए कि कारण पूछा गया है या तात्कालिक कारण। चर्बी लगे कारतूस तात्कालिक कारण हैं, और मूल कारण राजनीतिक तथा आर्थिक हैं। यही अंतर विकल्पों में जाल बनता है।
TRE संकेत: बिहार में कुँवर सिंह का नेतृत्व राज्य से सबसे अधिक पूछा जाने वाला तथ्य है। 1858 में शासन ताज के हाथ में भी तयशुदा है। चर्बी लगे कारतूस तात्कालिक कारण थे और स्थान तथा नेता की जोड़ी भी सीधे आए हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- विद्रोह की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई।
- चर्बी लगे कारतूस तात्कालिक कारण थे, मूल कारण नहीं।
- झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ में बेगम हज़रत महल ने नेतृत्व किया।
- बिहार में जगदीशपुर से कुँवर सिंह ने नेतृत्व किया।
- 1858 में शासन कंपनी से हटकर ब्रिटिश ताज के हाथ में गया।
- इसके बाद व्यपगत सिद्धांत समाप्त कर दिया गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1857 का विद्रोह असफल क्यों हुआ?
क्योंकि वह पूरे देश में नहीं फैला और दक्षिण तथा पंजाब बड़े पैमाने पर अछूते रहे। विद्रोहियों के पास कोई साझा नेतृत्व, साझा लक्ष्य या योजना नहीं थी। अंग्रेज़ों के पास बेहतर हथियार, तेज़ संचार और अनुशासित सेना थी, और अनेक देशी रियासतों ने उनका साथ भी दिया।
इस विद्रोह के बाद सबसे बड़ा बदलाव क्या हुआ?
शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से हटकर सीधे ब्रिटिश ताज के हाथ में चला गया, जो 1858 के भारत शासन अधिनियम से हुआ। भारत के लिए एक अलग भारत सचिव का पद बना, व्यपगत सिद्धांत समाप्त हुआ, और सेना में भारतीय तथा यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बदल दिया गया।
बिहार में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
कुँवर सिंह ने, जो जगदीशपुर के ज़मींदार थे। उन्होंने लगभग अस्सी वर्ष की आयु में विद्रोह का नेतृत्व किया और छापामार युद्ध से अंग्रेज़ों को कई बार परास्त किया। उनके भाई अमर सिंह ने भी उनके बाद संघर्ष जारी रखा। बिहार की परीक्षाओं में यह तथ्य लगभग हर बार आता है।
इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहना उचित है?
इस पर मत भिन्न हैं और परीक्षा दोनों दृष्टिकोण जानने की अपेक्षा करती है। अंग्रेज़ इतिहासकारों ने इसे केवल सिपाही विद्रोह कहा, क्योंकि उसमें साझा राष्ट्रीय लक्ष्य नहीं था। वी. डी. सावरकर ने इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा, क्योंकि उसमें विदेशी शासन के विरुद्ध व्यापक प्रतिरोध था।
