पदार्थों का पृथक्करण एवं मिश्रण
पदार्थों का पृथक्करण एवं मिश्रण
पृथक्करण वाला भाग परीक्षा में सीधा और अंक देने वाला होता है, क्योंकि प्रश्न प्रायः यही पूछा जाता है कि किस मिश्रण को अलग करने के लिए कौन-सी विधि उपयुक्त है। हर विधि किसी एक गुण के अंतर का लाभ उठाती है, वही गुण याद रख लीजिए।
कौन-सी विधि किस गुण पर
| विधि | किस अंतर का लाभ | उदाहरण |
|---|---|---|
| हस्त चयन | आकार और दिखावट | अनाज से कंकड़ निकालना |
| थ्रेशिंग | डंठल से दाने का जुड़ाव | गेहूँ की मड़ाई |
| ओसाई | हल्केपन का अंतर | भूसे से अनाज अलग करना |
| चालन | कणों का आकार | आटे से चोकर अलग करना |
| अवसादन एवं निस्तारण | भारीपन | मिट्टी मिले पानी को ठहराना |
| निस्यंदन | कण का आकार | चाय छानना |
| चुंबकीय पृथक्करण | चुंबकीय गुण | कचरे से लोहा निकालना |
इनमें ओसाई हवा की सहायता से हल्के भूसे को उड़ाकर अलग करती है और चुंबकीय पृथक्करण केवल तभी काम करता है जब एक घटक लोहा, निकल या कोबाल्ट हो। यही शर्त प्रश्न में जाल की तरह प्रयोग होती है।
वाष्पन और आसवन
वाष्पन में द्रव उड़ जाता है और घुला हुआ ठोस बच जाता है — समुद्री जल से नमक इसी से बनता है। आसवन में द्रव को उबालकर वाष्प बनाया जाता है और फिर ठंडा करके वापस द्रव में बदल लिया जाता है, इसलिए इसमें द्रव भी बच जाता है।
अंतर सीधा है — यदि नमक चाहिए तो वाष्पन काफ़ी है, पर यदि शुद्ध पानी चाहिए तो आसवन ही करना होगा। दो ऐसे द्रवों को अलग करने के लिए जिनके क्वथनांक अलग हों, प्रभाजी आसवन काम आता है।
✗ आसवन और वाष्पन एक ही प्रक्रिया के दो नाम हैं | ✓ वाष्पन में केवल ठोस बचता है, जबकि आसवन में वाष्प को ठंडा करके द्रव भी वापस मिल जाता है
विलयन, विलेयता और संतृप्तता
किसी द्रव में ठोस के घुलने से विलयन बनता है, जिसमें घुलने वाला विलेय और घोलने वाला विलायक कहलाता है। जब किसी ताप पर द्रव और अधिक विलेय न घोल सके तो वह संतृप्त विलयन कहलाता है।
- ताप बढ़ाने पर अधिकांश ठोसों की विलेयता बढ़ जाती है।
- गैसों की विलेयता ताप बढ़ने पर घट जाती है।
- जल को सार्वत्रिक विलायक कहा जाता है क्योंकि वह सबसे अधिक पदार्थों को घोलता है।
गर्म पानी में चीनी अधिक घुलती है — यह पहला नियम है। और गर्म करने पर पानी से हवा के बुलबुले निकलने लगते हैं — यह दूसरे नियम का उदाहरण है, जो जलीय जीवों के लिए महत्वपूर्ण है।
व्यवहार में जल शुद्धिकरण
- अवसादन से भारी मिट्टी नीचे बैठ जाती है।
- फिटकरी डालने से महीन कण आपस में चिपककर भारी हो जाते हैं और तेज़ी से बैठते हैं।
- निस्यंदन से बचे हुए कण रोक लिए जाते हैं।
- क्लोरीनीकरण या उबालना रोगाणुओं को नष्ट करता है।
एक बात याद रखिए — छानने या बैठाने से रोगाणु नहीं मरते। वे केवल उबालने, क्लोरीन मिलाने या विशेष फ़िल्टर से ही समाप्त होते हैं। परीक्षा में यही अंतर पूछा जाता है।
TRE संकेत: वाष्पन और आसवन का अंतर सबसे अधिक पूछा जाता है। ओसाई में हल्का भूसा उड़ता है और फिटकरी महीन कणों को बैठाती है — दोनों तथ्य आ चुके हैं। गैसों की विलेयता ताप बढ़ने पर घटती है वाला कथन भी जाल के रूप में आता है।
60 सेकंड का रिवीजन
- हर पृथक्करण विधि घटकों के किसी एक भिन्न गुण पर आधारित है।
- ओसाई में हवा की सहायता से हल्का भाग उड़ा दिया जाता है।
- वाष्पन में केवल ठोस बचता है, आसवन में द्रव भी वापस मिलता है।
- ताप बढ़ने पर ठोसों की विलेयता बढ़ती और गैसों की घटती है।
- जल को सार्वत्रिक विलायक कहा जाता है।
- फिटकरी महीन कणों को जमाकर बैठाने में सहायक होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समुद्री जल से नमक कैसे बनाया जाता है?
समुद्री जल को उथले क्यारीनुमा खेतों में भर दिया जाता है और सूर्य की गर्मी से पानी धीरे-धीरे वाष्पित हो जाता है। पीछे बचा नमक इकट्ठा करके साफ़ किया जाता है। यह वाष्पन का सबसे बड़ा व्यावहारिक उदाहरण है और इसमें पानी वापस नहीं मिलता।
पानी में फिटकरी क्यों डाली जाती है?
पानी में तैरते बहुत महीन कण इतने हल्के होते हैं कि वे अपने आप नीचे नहीं बैठते। फिटकरी डालने पर ये कण आपस में चिपककर बड़े और भारी गुच्छे बना लेते हैं और तेज़ी से तली में बैठ जाते हैं। इससे पानी साफ़ दिखने लगता है, पर रोगाणु फिर भी नहीं मरते।
गर्म करने पर पानी से बुलबुले क्यों निकलते हैं?
पानी में घुली हुई हवा गर्म होते ही बाहर निकलने लगती है, क्योंकि ताप बढ़ने पर गैसों की विलेयता घट जाती है। यही कारण है कि गर्मियों में तालाब के पानी में घुली ऑक्सीजन कम हो जाती है और मछलियों को साँस लेने में कठिनाई होती है।
संतृप्त विलयन किसे कहते हैं?
किसी निश्चित ताप पर जब कोई विलायक उससे अधिक विलेय घोल ही न सके, तब बना विलयन संतृप्त कहलाता है। उसमें और चीनी या नमक डालने पर वह घुलेगा नहीं, तली में बैठा रहेगा। ताप बढ़ा देने पर वही विलयन फिर से और विलेय घोलने लगता है।
