ध्वनि का उत्पादन, संचरण एवं अभिलक्षण
ध्वनि का उत्पादन, संचरण एवं अभिलक्षण
ध्वनि से TRE में प्रायः एक प्रश्न आता है और वह लगभग हमेशा तीन में से किसी एक बिंदु पर होता है — ध्वनि निर्वात में क्यों नहीं चलती, तारत्व किस पर निर्भर करता है, या प्रतिध्वनि सुनने के लिए कम से कम कितनी दूरी चाहिए। ये तीनों बिंदु पक्के कर लीजिए।
ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है और कैसे चलती है
ध्वनि किसी वस्तु के कंपन से उत्पन्न होती है। तबले की झिल्ली, सितार का तार या हमारे गले का स्वरयंत्र — सब कंपन करके ही ध्वनि बनाते हैं। कंपन रुकते ही ध्वनि भी रुक जाती है।
ध्वनि को चलने के लिए माध्यम चाहिए, इसलिए वह निर्वात में नहीं चल सकती। यही कारण है कि चंद्रमा पर दो अंतरिक्ष यात्री आमने-सामने खड़े होकर भी बिना रेडियो के बात नहीं कर सकते।
ध्वनि एक अनुदैर्घ्य तरंग है, अर्थात् माध्यम के कण तरंग की दिशा में ही आगे-पीछे कंपन करते हैं और संपीडन तथा विरलन बनाते हैं। कण स्वयं आगे नहीं जाते, केवल ऊर्जा आगे बढ़ती है।
| माध्यम | ध्वनि की लगभग चाल |
|---|---|
| वायु (20°C) | लगभग 344 मीटर/सेकंड |
| जल | लगभग 1500 मीटर/सेकंड |
| लोहा | लगभग 5000 मीटर/सेकंड |
तालिका से नियम साफ़ है — ध्वनि ठोस में सबसे तेज़ और गैस में सबसे धीमी चलती है, क्योंकि ठोस में कण पास-पास होते हैं और कंपन जल्दी आगे पहुँचा देते हैं। प्रकाश में यह क्रम उल्टा है।
ध्वनि के तीन अभिलक्षण
| अभिलक्षण | किस पर निर्भर | उदाहरण |
|---|---|---|
| तारत्व | आवृत्ति | स्त्री की आवाज़ पुरुष से पतली |
| प्रबलता | आयाम | ज़ोर से बजाने पर तेज़ आवाज़ |
| गुणता | तरंग का रूप | बाँसुरी और वायलिन का एक ही सुर अलग लगना |
तारत्व आवृत्ति पर निर्भर करता है — आवृत्ति अधिक तो आवाज़ पतली या तीखी, आवृत्ति कम तो मोटी। प्रबलता आयाम पर निर्भर करती है और उसे डेसिबल में मापा जाता है। गुणता के कारण ही हम बिना देखे पहचान लेते हैं कि बोलने वाला कौन है।
✗ ज़ोर से बोलने पर आवाज़ का तारत्व बढ़ जाता है | ✓ ज़ोर से बोलने पर प्रबलता बढ़ती है, तारत्व नहीं — तारत्व केवल आवृत्ति से बदलता है
श्रव्य परिसर एवं उससे परे
- श्रव्य परिसर — 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक, यही मनुष्य सुन सकता है।
- अवश्रव्य — 20 हर्ट्ज़ से नीचे; भूकंप से पहले कुछ जानवर इसे भाँप लेते हैं।
- पराश्रव्य — 20,000 हर्ट्ज़ से ऊपर; चमगादड़ और डॉल्फ़िन इसका प्रयोग करते हैं।
पराश्रव्य ध्वनि का उपयोग अल्ट्रासाउंड जाँच, धातु में दरार पकड़ने और गहनों की सफ़ाई में होता है। समुद्र की गहराई नापने की विधि सोनार कहलाती है, जो ध्वनि के परावर्तन पर आधारित है।
प्रतिध्वनि एवं शोर
प्रतिध्वनि परावर्तित ध्वनि है। हमारे कान में ध्वनि की संवेदना लगभग 0.1 सेकंड तक बनी रहती है, इसलिए अलग सुनाई देने के लिए परावर्तक सतह कम से कम 17 मीटर दूर होनी चाहिए। यह दूरी चाल 344 मीटर/सेकंड को 0.1 सेकंड से गुणा करके आधा करने पर मिलती है।
अनुरणन तब होता है जब ध्वनि बार-बार परावर्तित होकर देर तक गूँजती रहे। इसीलिए बड़े सभागारों की छत और दीवारों पर ध्वनि-अवशोषक पदार्थ लगाए जाते हैं।
प्रतिध्वनि और अनुरणन में अंतर याद रखने का सरल तरीका — प्रतिध्वनि में मूल ध्वनि अलग से एक बार दोबारा सुनाई देती है, जबकि अनुरणन में वह अलग नहीं होती, बस लंबी खिंच जाती है।
TRE संकेत: ध्वनि निर्वात में नहीं चलती और श्रव्य परिसर 20 से 20,000 हर्ट्ज़ — ये दो तथ्य लगभग तय हैं। तारत्व आवृत्ति पर तथा प्रबलता आयाम पर निर्भर करती है, इसे उलटकर पूछा जाता है। प्रतिध्वनि के लिए 17 मीटर वाली संख्या भी सीधे पूछी जा चुकी है।
60 सेकंड का रिवीजन
- ध्वनि कंपन से बनती है और उसे चलने के लिए माध्यम चाहिए।
- ध्वनि अनुदैर्घ्य तरंग है; ठोस में सबसे तेज़, गैस में सबसे धीमी।
- तारत्व आवृत्ति पर, प्रबलता आयाम पर और गुणता तरंग-रूप पर निर्भर है।
- मनुष्य का श्रव्य परिसर 20 से 20,000 हर्ट्ज़ है।
- प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक सतह कम से कम 17 मीटर दूर चाहिए।
- सोनार और अल्ट्रासाउंड पराश्रव्य ध्वनि पर आधारित हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ध्वनि निर्वात में क्यों नहीं चल सकती?
क्योंकि ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है और उसे आगे बढ़ने के लिए ऐसे कणों की ज़रूरत होती है जो कंपन करके ऊर्जा अगले कण तक पहुँचा सकें। निर्वात में कण होते ही नहीं, इसलिए ऊर्जा आगे नहीं बढ़ पाती। प्रकाश विद्युत-चुंबकीय तरंग है, इसीलिए वह निर्वात में भी चल जाता है।
तारत्व और प्रबलता में क्या अंतर है?
तारत्व बताता है कि आवाज़ पतली है या मोटी, और वह आवृत्ति पर निर्भर करता है। प्रबलता बताती है कि आवाज़ धीमी है या तेज़, और वह आयाम पर निर्भर करती है। ज़ोर से बोलने पर केवल प्रबलता बदलती है, तारत्व वही रहता है।
प्रतिध्वनि सुनने के लिए न्यूनतम दूरी 17 मीटर ही क्यों है?
कान में ध्वनि की संवेदना लगभग 0.1 सेकंड बनी रहती है, इसलिए मूल और परावर्तित ध्वनि के बीच कम से कम इतना अंतर चाहिए। इस समय में ध्वनि लगभग 34 मीटर चल जाती है, पर उसे जाकर लौटना होता है, इसलिए सतह की दूरी उसका आधा यानी लगभग 17 मीटर होनी चाहिए।
सोनार किस सिद्धांत पर काम करता है?
सोनार पराश्रव्य ध्वनि के परावर्तन पर काम करता है। जहाज़ से ध्वनि तरंग समुद्र तल की ओर भेजी जाती है और लौटने में लगे समय से गहराई निकाल ली जाती है। इसी विधि से डूबी वस्तुएँ, हिमखंड और मछलियों के झुंड भी पता किए जाते हैं।
