दिल्ली सल्तनत
दिल्ली सल्तनत
दिल्ली सल्तनत से प्रश्न प्रायः दो जगह से आते हैं — पाँच वंशों का क्रम और किस सुल्तान ने कौन-सा प्रसिद्ध कदम उठाया। इसलिए वंश क्रम पहले पक्का कीजिए, फिर हर वंश के साथ एक या दो निर्णायक तथ्य जोड़िए।
पाँच वंश
| वंश | काल | प्रमुख शासक |
|---|---|---|
| गुलाम | 1206 से 1290 | कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रज़िया, बलबन |
| ख़िलजी | 1290 से 1320 | जलालुद्दीन, अलाउद्दीन ख़िलजी |
| तुग़लक़ | 1320 से 1414 | ग़यासुद्दीन, मुहम्मद बिन तुग़लक़, फ़िरोज़ शाह |
| सैयद | 1414 से 1451 | ख़िज्र ख़ाँ |
| लोदी | 1451 से 1526 | बहलोल, सिकंदर, इब्राहिम लोदी |
कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 में सल्तनत की नींव रखी और कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया। इल्तुतमिश ने चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल चलाया तथा इक्ता व्यवस्था शुरू की। रज़िया सुल्तान दिल्ली की एकमात्र महिला शासक थीं।
अलाउद्दीन ख़िलजी
अलाउद्दीन के सुधार सबसे अधिक पूछे जाते हैं, क्योंकि उनमें से कई अपने समय से बहुत आगे थे।
- बाज़ार नियंत्रण — वस्तुओं के दाम स्वयं तय किए और उनकी निगरानी के लिए अधिकारी नियुक्त किए।
- स्थायी सेना और सैनिकों का हुलिया तथा घोड़ों का दाग रखने की व्यवस्था।
- भूमि की पैमाइश कराकर कर तय करना।
- उन्होंने दक्षिण भारत तक अभियान भेजे, जिनका नेतृत्व मलिक काफ़ूर ने किया।
बाज़ार नियंत्रण का उद्देश्य जनकल्याण से अधिक बड़ी सेना को कम वेतन में रख पाना था, क्योंकि दाम कम रहने पर कम वेतन भी पर्याप्त हो जाता था। यह कारण परीक्षा में सीधे पूछा जाता है।
तुग़लक़ वंश
मुहम्मद बिन तुग़लक़ अपनी महत्वाकांक्षी पर असफल योजनाओं के लिए जाने जाते हैं। उन्हें विरोधाभासों का मिश्रण कहा जाता है, क्योंकि वे विद्वान थे पर उनकी योजनाएँ व्यवहार में विफल रहीं।
| योजना | क्यों असफल |
|---|---|
| राजधानी दिल्ली से दौलताबाद | दूरी और कठिनाई से भारी जनहानि |
| सांकेतिक मुद्रा | ताँबे के सिक्कों की नकल रोकी न जा सकी |
| दोआब में कर वृद्धि | अकाल के समय लगाई गई, विद्रोह हुआ |
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने नहरें बनवाईं, नगर बसाए और रोज़गार दफ़्तर खोला। उन्होंने अशोक के दो स्तंभ दिल्ली लाकर स्थापित करवाए।
✗ मुहम्मद बिन तुग़लक़ की सांकेतिक मुद्रा योजना मूल रूप से ग़लत विचार थी | ✓ विचार आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुकूल था; असफलता का कारण नकली सिक्कों को रोक न पाना था
प्रशासन और स्थापत्य
सल्तनत का प्रशासन इक्ता व्यवस्था पर टिका था, जिसमें अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि से राजस्व वसूलने का अधिकार दिया जाता था। दीवान-ए-विजारत वित्त और दीवान-ए-अर्ज़ सेना का विभाग था।
स्थापत्य में मेहराब और गुंबद का प्रयोग इसी काल में आया। कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुग़लक़ाबाद इस काल की प्रमुख इमारतें हैं। सल्तनत का अंत 1526 के पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी की पराजय से हुआ।
सुल्तानों को उनके एक निर्णायक काम से जोड़कर याद कीजिए — ऐबक से कुतुब मीनार, इल्तुतमिश से इक्ता, अलाउद्दीन से बाज़ार नियंत्रण, मुहम्मद बिन तुग़लक़ से सांकेतिक मुद्रा और फ़िरोज़ शाह से नहरें।
TRE संकेत: अलाउद्दीन का बाज़ार नियंत्रण सबसे अधिक पूछा जाता है। मुहम्मद बिन तुग़लक़ की तीन असफल योजनाएँ भी तयशुदा हैं। रज़िया एकमात्र महिला सुल्तान और 1526 का पानीपत युद्ध भी सीधे आए हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- दिल्ली सल्तनत में पाँच वंशों ने शासन किया।
- कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 में इसकी नींव रखी।
- रज़िया सुल्तान दिल्ली की एकमात्र महिला शासक थीं।
- अलाउद्दीन ख़िलजी ने बाज़ार नियंत्रण व्यवस्था लागू की।
- मुहम्मद बिन तुग़लक़ की तीनों बड़ी योजनाएँ असफल रहीं।
- 1526 के पानीपत युद्ध से सल्तनत का अंत हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अलाउद्दीन ख़िलजी ने बाज़ार नियंत्रण क्यों लागू किया?
उसका मुख्य उद्देश्य बड़ी स्थायी सेना को कम वेतन में रख पाना था। यदि अनाज, कपड़े और घोड़ों के दाम नियंत्रित रहें तो कम वेतन में भी सैनिक का गुज़ारा हो जाएगा। इससे मंगोल आक्रमणों का सामना करने लायक विशाल सेना कम खर्च में तैयार रखी जा सकी।
मुहम्मद बिन तुग़लक़ की सांकेतिक मुद्रा क्यों विफल हुई?
विचार अपने आप में ग़लत नहीं था और आज की काग़ज़ी मुद्रा उसी सिद्धांत पर चलती है। असफलता का कारण यह था कि ताँबे के सिक्कों की नकल आसानी से बनाई जा सकती थी और उस समय उसे रोकने की कोई व्यवस्था नहीं थी। लोगों ने घर-घर सिक्के ढाल लिए और व्यवस्था बैठ गई।
इक्ता व्यवस्था क्या थी?
इसमें अधिकारियों और सैनिकों को नक़द वेतन के बदले एक निश्चित भूभाग सौंपा जाता था, जहाँ से वे राजस्व वसूल सकते थे। यह भूमि स्थायी संपत्ति नहीं होती थी और उसे बदला जा सकता था। इल्तुतमिश ने इसे व्यवस्थित रूप दिया और यही सल्तनत के प्रशासन का आधार बनी।
दिल्ली सल्तनत का स्थापत्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
इसी काल में भारत में मेहराब और गुंबद का व्यवस्थित प्रयोग शुरू हुआ, जो पहले की भारतीय शैली से भिन्न था। धीरे-धीरे स्थानीय कारीगरी और नई तकनीक मिलकर एक मिश्रित शैली बनी। कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुग़लक़ाबाद इसी विकास के उदाहरण हैं।
