मुगल साम्राज्य
The Mughal Empire
मुगल काल से प्रश्न लगभग निश्चित हैं और वे प्रायः तीन बिंदुओं पर आते हैं — शासकों का क्रम, अकबर की नीतियाँ, और मनसबदारी व्यवस्था। तीनों को अलग-अलग देखिए, क्योंकि विकल्पों में इन्हें आपस में मिलाकर पूछा जाता है।
शासक
| शासक | काल | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| बाबर | 1526 से 1530 | पानीपत का प्रथम युद्ध; तुज़ुक-ए-बाबरी लिखी |
| हुमायूँ | 1530 से 1556 | शेरशाह से पराजित; बीच में निर्वासन |
| अकबर | 1556 से 1605 | पानीपत का द्वितीय युद्ध; दीन-ए-इलाही |
| जहाँगीर | 1605 से 1627 | न्याय की ज़ंजीर; नूरजहाँ का प्रभाव |
| शाहजहाँ | 1628 से 1658 | ताजमहल; स्थापत्य का स्वर्ण काल |
| औरंगज़ेब | 1658 से 1707 | सबसे बड़ा विस्तार; जज़िया पुनः लागू |
बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर साम्राज्य की नींव रखी और वहाँ पहली बार तोपखाने का प्रभावी प्रयोग हुआ। अकबर ने 1556 में हेमू को पानीपत के द्वितीय युद्ध में हराया।
अकबर की नीतियाँ
- जज़िया समाप्त किया और तीर्थयात्रा कर हटाया।
- राजपूतों से वैवाहिक संबंध बनाकर उन्हें प्रशासन में ऊँचे पद दिए।
- इबादतखाना में सभी धर्मों के विद्वानों को बुलाकर चर्चा कराई।
- दीन-ए-इलाही नामक विचार चलाया, जो कोई नया धर्म नहीं बल्कि एक आचरण पथ था।
- सुलह-ए-कुल यानी सबके साथ शांति की नीति अपनाई।
अकबर के दरबार में नवरत्न थे, जिनमें बीरबल, तानसेन, टोडरमल और अबुल फ़ज़ल प्रमुख हैं। टोडरमल की भूमि व्यवस्था को दहसाला कहा जाता है, जिसमें दस वर्षों के औसत के आधार पर कर तय होता था।
✗ दीन-ए-इलाही अकबर द्वारा चलाया गया नया धर्म था | ✓ वह कोई नया धर्म नहीं, विभिन्न धर्मों के अच्छे तत्वों को लेकर बना एक आचरण पथ था, जिसे बहुत कम लोगों ने अपनाया
प्रशासन और संस्कृति
मुगल प्रशासन की रीढ़ मनसबदारी व्यवस्था थी, जिसे अकबर ने चलाया। हर अधिकारी को दो अंक मिलते थे — ज़ात जो उसका पद और वेतन बताता था, और सवार जो बताता था कि उसे कितने घुड़सवार रखने हैं।
भाषा और संस्कृति में यह काल फ़ारसी का था, पर उसी से मिलकर उर्दू का विकास हुआ। स्थापत्य में फ़तेहपुर सीकरी, ताजमहल, लाल क़िला और जामा मस्जिद इसी काल की देन हैं।
पतन
औरंगज़ेब के काल में साम्राज्य सबसे बड़ा हुआ, पर वही विस्तार उसके पतन का एक कारण भी बना, क्योंकि दक्षिण के लंबे युद्धों ने खज़ाना खाली कर दिया।
- धार्मिक नीति में बदलाव से राजपूतों और सिखों का असंतोष बढ़ा।
- मराठों के लगातार प्रतिरोध ने शक्ति क्षीण की।
- कमज़ोर उत्तराधिकारी और सामंतों की स्वतंत्रता ने केंद्र को कमज़ोर किया।
- 1739 में नादिरशाह के आक्रमण ने रही-सही प्रतिष्ठा भी समाप्त कर दी।
मुगल शासकों को उनकी एक-एक पहचान से जोड़िए — बाबर से पानीपत, हुमायूँ से शेरशाह, अकबर से सुलह-ए-कुल, जहाँगीर से न्याय की ज़ंजीर, शाहजहाँ से ताजमहल और औरंगज़ेब से दक्षिण के युद्ध।
TRE संकेत: मनसबदारी में ज़ात और सवार सबसे अधिक पूछा जाता है। दीन-ए-इलाही नया धर्म नहीं था वाला बिंदु भी तयशुदा है। टोडरमल की दहसाला व्यवस्था और पानीपत के दोनों युद्ध भी सीधे पूछे गए हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- बाबर ने 1526 के पानीपत युद्ध से मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
- अकबर ने 1556 में पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू को हराया।
- अकबर ने जज़िया समाप्त किया और सुलह-ए-कुल की नीति अपनाई।
- दीन-ए-इलाही कोई नया धर्म नहीं, एक आचरण पथ था।
- मनसबदारी में ज़ात पद और सवार घुड़सवारों की संख्या बताता था।
- टोडरमल की भूमि व्यवस्था दहसाला कहलाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मनसबदारी व्यवस्था क्या थी?
यह मुगल प्रशासन की मूल व्यवस्था थी, जिसे अकबर ने लागू किया। हर अधिकारी को दो अंक दिए जाते थे — ज़ात, जो उसका पद और वेतन तय करता था, और सवार, जो बताता था कि उसे कितने घुड़सवार रखने हैं। इससे नागरिक और सैन्य दोनों दायित्व एक ही व्यवस्था में आ जाते थे।
दीन-ए-इलाही क्या था?
यह कोई नया धर्म नहीं था, बल्कि विभिन्न धर्मों के अच्छे तत्वों को लेकर बनाया गया एक आचरण पथ था, जिसमें आत्मसंयम और सहिष्णुता पर बल था। इसे बहुत कम लोगों ने अपनाया और अकबर के बाद यह चला नहीं। इसे नया धर्म कह देना परीक्षा का सामान्य जाल है।
अकबर की धार्मिक नीति की मुख्य बातें क्या थीं?
उन्होंने जज़िया और तीर्थयात्रा कर हटाए, राजपूतों से वैवाहिक संबंध बनाकर उन्हें ऊँचे पद दिए, इबादतखाने में सभी धर्मों के विद्वानों को बुलाकर चर्चा कराई, और सुलह-ए-कुल यानी सबके साथ शांति की नीति अपनाई। इसी नीति ने साम्राज्य को व्यापक सामाजिक आधार दिया।
मुगल साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण क्या थे?
कई कारण एक साथ काम कर रहे थे। दक्षिण के लंबे युद्धों ने खज़ाना खाली कर दिया, धार्मिक नीति में बदलाव से राजपूतों और सिखों का असंतोष बढ़ा, मराठों के प्रतिरोध ने शक्ति क्षीण की, उत्तराधिकारी कमज़ोर निकले, और 1739 में नादिरशाह के आक्रमण ने प्रतिष्ठा समाप्त कर दी।
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