कांग्रेस और उदारवादी
कांग्रेस और उदारवादी
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना दिसंबर 1885 में बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई, जिसके अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी थे और बहत्तर प्रतिनिधि उपस्थित थे | 1905 तक का इसका पहला चरण उदारवादी चरण कहलाता है, जिसकी पहचान है संवैधानिक आंदोलन, आवेदन और ब्रिटिश शासन की गहरी आर्थिक आलोचना |
पृष्ठभूमि और स्थापना
- कांग्रेस से पहले की संस्थाएँ - लैंडहोल्डर्स सोसाइटी 1838, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन 1851, सुरेंद्रनाथ बनर्जी की इंडियन एसोसिएशन 1876, मद्रास महाजन सभा 1884, बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन 1885
- सेवानिवृत्त सिविल सेवक ए. ओ. ह्यूम ने संगठनकर्ता की भूमिका निभाई; यह सेफ्टी वाल्व सिद्धांत कि उन्होंने विद्रोह रोकने के लिए ऐसा किया, अब अति-सरलीकरण माना जाता है
- 1883 का इल्बर्ट बिल विवाद, जिसमें यूरोपीयों ने भारतीय न्यायाधीशों द्वारा मुकदमे का विरोध किया, ने भारतीयों को संगठन का महत्व दिखाया
- समाचारपत्रों, आधुनिक शिक्षा और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास ने अखिल भारतीय संस्था का आधार बनाया
उदारवादी नेता और तरीके
| नेता | योगदान |
|---|---|
| दादाभाई नौरोजी | भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन; धन-निष्कासन सिद्धांत; 1892 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में पहुँचने वाले पहले भारतीय |
| गोपाल कृष्ण गोखले | 1905 में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी; गांधी के राजनीतिक गुरु; इंपीरियल विधान परिषद में बजट पर काम |
| सुरेंद्रनाथ बनर्जी | 1876 में इंडियन एसोसिएशन; राष्ट्रगुरु कहलाए; बंगाल विभाजन का विरोध |
| फिरोजशाह मेहता | बंबई की राजनीति और कांग्रेस संगठन के प्रमुख व्यक्ति |
| बदरुद्दीन तैयबजी | कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष, 1887 |
| डब्ल्यू. सी. बनर्जी और रमेशचंद्र दत्त | पहले अध्यक्ष तथा 1899 के अध्यक्ष जो आर्थिक इतिहासकार थे |
उदारवादी तरीके का सार है प्रार्थना, आवेदन और विरोध - जिसे आगे चलकर उग्रवादियों ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहकर उपहास किया | उनके साधन थे वार्षिक अधिवेशनों के प्रस्ताव, सरकार को ज्ञापन, व्याख्यान, समाचारपत्र, और लंदन में ब्रिटिश समिति तथा उसकी पत्रिका इंडिया |
उदारवादी तरीका = संवैधानिक आंदोलन + आर्थिक आलोचना + ब्रिटिश उदारवाद से अपील
माँगें और उपलब्धियाँ
| क्षेत्र | माँगें | परिणाम |
|---|---|---|
| संवैधानिक | विधान परिषदों का विस्तार और भारतीय प्रतिनिधित्व | 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम, जिसमें अप्रत्यक्ष चुनाव और बजट चर्चा की अनुमति |
| प्रशासनिक | भारत में एक साथ ICS परीक्षा, कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण, भारतीयों को ऊँचे पद | ICS परीक्षा की आयु बढ़ी; शेष माँगें प्रायः अस्वीकृत |
| आर्थिक | भू-राजस्व, नमक कर और सैन्य व्यय में कमी; धन-निष्कासन की समाप्ति; औद्योगीकरण | यही आर्थिक आलोचना आगे की जन-राजनीति का आधार बनी |
| नागरिक अधिकार | वाणी, प्रेस और संगठन की स्वतंत्रता; आयुध अधिनियम की समाप्ति | बहुत सीमित या कोई रियायत नहीं |
✗ उदारवादियों ने कुछ स्थायी हासिल नहीं किया | ✓ उन्होंने औपनिवेशिक शासन का आर्थिक आधार उजागर किया और अखिल भारतीय राजनीतिक मंच बनाया, जिसके बिना जन-राजनीति शुरू ही नहीं हो सकती थी
आलोचना और मोड़
1900 तक नई पीढ़ी को उदारवादी तरीका निष्प्रभावी लगने लगा | 1905 में बंगाल विभाजन रोक न पाना, कर्ज़न प्रशासन का अहंकार, 1890 के दशक के अकाल और प्लेग, तथा 1905 में जापान द्वारा रूस की पराजय जैसी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने ब्रिटिश न्याय पर भरोसा तोड़ दिया | परिणाम था उग्रवादियों का उदय और 1907 का सूरत विभाजन |
संबंध: यह विषय सीधे उग्रवादी और स्वदेशी विषय में ले जाता है | आर्थिक आलोचना धन-निष्कासन सामग्री से और संवैधानिक माँगें संवैधानिक विकास विषय तथा राजव्यवस्था में पढ़े जाने वाले भारतीय परिषद अधिनियमों से जुड़ती हैं |
परीक्षा संकेत: अधिकांश वर्षों में एक प्रश्न, प्रायः नेताओं, अधिवेशनों या 1892 के अधिनियम पर | महत्वपूर्ण - 1885 का पहला अधिवेशन बनर्जी की अध्यक्षता में, 1887 में बदरुद्दीन तैयबजी, 1892 में नौरोजी हाउस ऑफ कॉमन्स में, 1905 में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी | जाल - ह्यूम को अकेला संस्थापक मान लेना, पहला अधिवेशन बंबई के बजाय कलकत्ता में मान लेना, और उदारवादियों को पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का श्रेय देना, जो 1929 में आई |
FAQ
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने की?
इसकी स्थापना दिसंबर 1885 में भारतीय नेताओं के समूह ने की, जिसमें सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवक ए. ओ. ह्यूम की संगठनात्मक सहायता थी | बंबई में हुए पहले अधिवेशन की अध्यक्षता डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने की, जिसमें देश भर से बहत्तर प्रतिनिधि आए थे |
सेफ्टी वाल्व सिद्धांत क्या था?
यह दावा कि ह्यूम ने सरकारी प्रोत्साहन से कांग्रेस बनाई ताकि भारतीय असंतोष को सुरक्षित निकास मिले और हिंसक विद्रोह टल जाए | आधुनिक इतिहासकार इसे अति-सरलीकरण मानते हैं, क्योंकि पहल और कार्यसूची भारतीय शिक्षित वर्ग की थी |
1892 के भारतीय परिषद अधिनियम में क्या था?
इसने विधान परिषदों का विस्तार किया, स्थानीय निकायों तथा विश्वविद्यालयों की सिफारिश पर आधारित अप्रत्यक्ष और सीमित नामांकन प्रणाली दी, और सदस्यों को बजट पर चर्चा तथा प्रश्न पूछने की अनुमति दी, यद्यपि बजट पर मतदान का अधिकार नहीं दिया |
60 सेकंड में दोहराव
- कांग्रेस की स्थापना दिसंबर 1885 में बंबई में; अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी; बहत्तर प्रतिनिधि |
- पूर्ववर्ती संस्थाएँ - इंडियन एसोसिएशन 1876, मद्रास महाजन सभा 1884, बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन 1885 |
- उदारवादी तरीका - प्रार्थना, आवेदन और विरोध; ब्रिटिश समिति और पत्रिका इंडिया |
- नौरोजी 1892 में हाउस ऑफ कॉमन्स पहुँचे; गोखले ने 1905 में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी बनाई |
- मुख्य उपलब्धि - 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम और औपनिवेशिक शासन की आर्थिक आलोचना |
- 1905 के बंगाल विभाजन ने उदारवादी तरीके की साख गिराई और उग्रवादियों को जन्म दिया |
