मनसबदारी और भू-राजस्व
मनसबदारी और भू-राजस्व
मुगल प्रशासन दो जुड़ी हुई व्यवस्थाओं पर टिका था - मनसबदारी, जो सभी अधिकारियों को एक ही संख्यात्मक श्रेणीक्रम में रखती थी, और राजा टोडरमल की बनाई ज़ब्ती भू-राजस्व व्यवस्था | दोनों ने साम्राज्य को पेशेवर सेवा और अनुमेय आय दी, और इन्हीं का टूटना मुगल पतन का मूल कारण है |
मनसबदारी व्यवस्था
विकसित रूप में अकबर ने इसे 1595 में लागू किया | मनसब हर अधिकारी का, चाहे वह असैनिक हो या सैनिक, संख्यात्मक पद था जो दो अंकों में व्यक्त होता था |
ज़ात = व्यक्तिगत पद, प्रतिष्ठा और वेतन | सवार = रखे जाने वाले घुड़सवारों की संख्या
- सामान्य अमीरों के लिए पद 10 से 5000 तक थे; इससे ऊँचे पद शहज़ादों के लिए सुरक्षित थे
- जिस मनसबदार का सवार ज़ात के बराबर हो वह प्रथम श्रेणी, आधा या अधिक हो तो द्वितीय, आधे से कम हो तो तृतीय श्रेणी का
- दाग (घोड़ों की दागप्रथा) और चेहरा (सैनिकों का हुलिया) झूठी गिनती रोकते थे, जो अलाउद्दीन खिलजी की परंपरा थी
- मनसब न वंशानुगत थे न स्थायी; सम्राट उन्हें बढ़ा, घटा या समाप्त कर सकता था
- जहाँगीर ने दु-अस्पा सिह-अस्पा पद चलाया, जिससे ज़ात बढ़ाए बिना अतिरिक्त सैनिक रखे जा सकते थे
वेतन प्रायः नकद नहीं, जागीर के रूप में मिलता था, जो किसी भूभाग के अनुमानित राजस्व (जमा) का आवंटन था | जागीरें हर तीन-चार वर्ष में बदल दी जाती थीं ताकि अधिकारी स्थानीय जड़ें न जमा सकें | जिन्हें खज़ाने से नकद मिलता था उन्हें नक़दी कहते थे |
ज़ब्ती या दहसाला व्यवस्था
लगभग 1580 में अंतिम रूप पाई टोडरमल की व्यवस्था भारतीय इतिहास की सबसे अधिक पूछी जाने वाली राजस्व व्यवस्था है | इसमें राजस्व नकद में तय होता था, जिसका आधार था मापा गया क्षेत्रफल, मानक उपज और दस वर्ष का औसत मूल्य |
| चरण | क्या किया गया |
|---|---|
| माप | लोहे के छल्लों से जुड़ी बाँस की जरीब से भूमि मापी गई, रस्सी की जगह जो खिंचती या सिकुड़ती थी |
| वर्गीकरण | भूमि पोलज (हर वर्ष जुती), परौती (एक वर्ष परती), चाचर (तीन-चार वर्ष परती) और बंजर (पाँच वर्ष या अधिक से अकृष्ट) में बाँटी गई |
| निर्धारण | राज्य का भाग औसत उपज का एक तिहाई तय हुआ |
| नकदीकरण | दस वर्ष के औसत मूल्य से नकद में बदला गया - यही दहसाला है |
| वसूली | आमिल या अमलगुज़ार वसूलता था; फसल नष्ट होने पर छूट मिलती थी |
| वैकल्पिक व्यवस्था | कार्य विधि | कहाँ प्रचलित |
|---|---|---|
| गल्ला-बख्शी या बटाई | फसल कटने पर उपज राज्य और किसान में बाँटी जाती थी | जहाँ माप व्यावहारिक न हो |
| कनकूट | खड़ी फसल देखकर अनुमान लगाना | छोटी या अनियमित जोत |
| नसक | गाँव के पुराने राजस्व अभिलेखों के आधार पर निर्धारण | बंगाल और जहाँ नया सर्वेक्षण न हो |
✗ ज़ब्ती पूरे मुगल साम्राज्य में समान रूप से लागू थी | ✓ ज़ब्ती मुख्यतः उत्तरी प्रांतों में थी; बंगाल, गुजरात तट और दक्कन में दूसरी व्यवस्थाएँ चलती थीं
जागीरदारी और कृषि संकट
औरंगज़ेब के अंतिम वर्षों तक मनसबदारों की संख्या आवंटन योग्य राजस्व से तेज़ी से बढ़ गई, जिससे बे-जागीरी की स्थिति बनी - पद तो था पर उपजाऊ जागीर नहीं | चूँकि जमा के आँकड़े प्रायः वास्तविक वसूली (हासिल) से अधिक होते थे, जागीरदार अपने छोटे कार्यकाल में किसानों पर अधिक दबाव डालते थे, जिससे कृषि संकट बढ़ा और जाट, सतनामी तथा मराठा विद्रोहों को बल मिला |
- ज़मींदार राज्य और किसान के बीच खड़े थे और नानकार नाम का हिस्सा रखते थे
- किसान खुदकाश्त (गाँव में रहने वाले) और पाहीकाश्त (बाहर से आकर पट्टे पर खेती करने वाले) कहलाते थे
- इरफान हबीब की Agrarian System of Mughal India इस संकट पर मानक कृति है
- सतीश चंद्र ने पतन को केवल धार्मिक नीति नहीं, जागीरदारी संकट से समझाया
संबंध: मनसबदारी सल्तनत के इक्ता और विजयनगर की नायंकार व्यवस्था की अगली कड़ी है, इसलिए तीनों साथ दोहराओ | ज़ब्ती व्यवस्था आधुनिक भारत की रैयतवाड़ी बहस की सीधी पूर्वज है, और कृषि संकट मुगल पतन तथा क्षेत्रीय शक्तियों के उदय की ओर ले जाता है |
परीक्षा संकेत: मध्यकाल के सबसे नियमित रूप से पूछे जाने वाले विषयों में | ज़ात और सवार, भूमि की चार श्रेणियाँ, तथा ज़ब्ती, बटाई, कनकूट और नसक का अंतर याद रखो | जाल - जागीर को भूस्वामित्व मान लेना, ज़ब्ती को हर जगह लागू समझ लेना, जमा और हासिल में भ्रम, और दहसाला का श्रेय टोडरमल के बजाय स्वयं अकबर को देना | पोलज, परौती, चाचर और बंजर पर कथन आधारित प्रश्न एक से अधिक बार आ चुके हैं |
FAQ
ज़ात और सवार में क्या अंतर है?
ज़ात मनसबदार का व्यक्तिगत पद, श्रेणीक्रम में स्थान और वेतन बताता था | सवार बताता था कि उसे कितने घुड़सवार रखने हैं | दोनों का अनुपात तय करता था कि वह प्रथम, द्वितीय या तृतीय श्रेणी का मनसबदार है |
टोडरमल के अनुसार भूमि की चार श्रेणियाँ कौन सी थीं?
पोलज, जो हर वर्ष जुतती थी; परौती, जो एक वर्ष उर्वरता लौटाने के लिए छोड़ी जाती थी; चाचर, जो तीन-चार वर्ष परती रहती थी; और बंजर, जो पाँच वर्ष या अधिक से अकृष्ट थी | श्रेणी के अनुसार राजस्व माँग बदलती थी और बंजर को खेती में लाने पर छूट मिलती थी |
जागीरदारी संकट क्या था?
यह वह संरचनात्मक असंतुलन था जिसमें जागीर चाहने वाले मनसबदारों की संख्या राजस्व देने वाली उपलब्ध भूमि से अधिक हो गई, विशेषकर दक्कन विलय के बाद | अधिकारियों को खराब या कागज़ी जागीरें मिलीं, उन्होंने छोटे कार्यकाल में किसानों को निचोड़ा, और उसी ग्रामीण संकट से विद्रोह भड़के |
60 सेकंड में दोहराव
- मनसब के दो अंक - ज़ात पद और वेतन के लिए, सवार घुड़सवारों के लिए |
- वेतन प्रायः जागीर से - अनुमानित राजस्व का आवंटन, हर तीन-चार वर्ष में बदलती थी |
- खालसा भूमि का राजस्व सीधे शाही खज़ाने में जाता था |
- ज़ब्ती या दहसाला - माप, वर्गीकरण, एक तिहाई भाग, दस वर्ष का औसत मूल्य |
- भूमि श्रेणियाँ - पोलज, परौती, चाचर, बंजर | विकल्प - बटाई, कनकूट, नसक |
- जागीरदारी संकट और जमा-हासिल का अंतर कृषि विद्रोहों का कारण बना |
