उत्तर-मौर्य वंश
उत्तर-मौर्य वंश
185 ईसा पूर्व में मौर्य पतन और लगभग 320 ईस्वी में गुप्त उदय के बीच उत्तर भारत पर देशी और मध्य एशियाई शक्तियों का क्रम रहा - शुंग, कण्व, सातवाहन, इंडो-ग्रीक, शक, पार्थियन और कुषाण | यह काल राजनीतिक दृष्टि से बिखरा हुआ था पर आर्थिक दृष्टि से प्राचीन भारत का सबसे समृद्ध चरण, जिसका आधार भारत-रोम व्यापार था |
देशी उत्तराधिकारी
| वंश | संस्थापक | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| शुंग | पुष्यमित्र शुंग | 185 ईसा पूर्व में बृहद्रथ की हत्या; अश्वमेध यज्ञ; भरहुत स्तूप वेदिका और साँची का विस्तार इसी काल का |
| कण्व | वासुदेव | मगध का अल्पकालिक वंश, लगभग 28 ईसा पूर्व में समाप्त |
| कलिंग का चेदि | खारवेल | हाथीगुम्फा अभिलेख; जैन संरक्षक; मगध पर आक्रमण |
| सातवाहन | सिमुक | दक्कन की शक्ति; गौतमीपुत्र सातकर्णि सबसे महान; गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख |
सातवाहनों पर विशेष ध्यान चाहिए | उन्होंने प्रतिष्ठान (पैठण) से दक्कन पर शासन किया, मुख्यतः सीसा और पोटिन के सिक्के चलाए, राजभाषा प्राकृत रखी, और एक विशिष्ट नामकरण परंपरा अपनाई जिसमें राजा माता का नाम लगाते थे - गौतमीपुत्र, वासिष्ठीपुत्र - यद्यपि उत्तराधिकार पितृवंशीय ही रहा | गौतमीपुत्र सातकर्णि ने शक शासक नहपान को हराया और उसके चाँदी के सिक्के दोबारा ढाले, जिसकी पुष्टि सिक्का निधियों से होती है |
मध्य एशियाई शासक
| शक्ति | प्रमुख शासक | योगदान |
|---|---|---|
| इंडो-ग्रीक (बैक्ट्रियन) | मिनांडर (मिलिंद) | भारत में पहले स्वर्ण और पहले चित्रयुक्त सिक्के; मिलिंदपन्हो में नागसेन से संवाद |
| शक (सीथियन) | रुद्रदामन प्रथम | शुद्ध संस्कृत में जूनागढ़ अभिलेख; उज्जैन के पश्चिमी क्षत्रप |
| इंडो-पार्थियन (पह्लव) | गोंडोफर्नीज | परंपरा के अनुसार संत थॉमस उनके दरबार में आए |
| कुषाण | कनिष्क प्रथम | 78 ईस्वी में शक संवत आरंभ; चतुर्थ बौद्ध संगीति के संरक्षक; मध्य एशिया से वाराणसी तक साम्राज्य |
कुषाण सबसे महत्वपूर्ण हैं | कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी और दूसरा केंद्र मथुरा | उन्होंने गुप्तों से पहले सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के चलाए और उनके सिक्कों पर यूनानी, ईरानी, हिंदू तथा बौद्ध देवता एक साथ मिलते हैं - समन्वयवादी साम्राज्य का स्पष्ट प्रमाण | उन्हीं के काल में गांधार शैली, जिसमें ग्रीको-रोमन रूप और बौद्ध विषय का मेल है, तथा मथुरा शैली, जो देशी है और लाल बलुआ पत्थर प्रयोग करती है, दोनों ने बुद्ध की पहली मूर्तियाँ बनाईं |
शक संवत = 78 ईस्वी (कनिष्क) | विक्रम संवत = 58 ईसा पूर्व | गुप्त संवत = 319-320 ईस्वी
✗ विक्रम संवत कनिष्क ने चलाया | ✓ कनिष्क ने 78 ईस्वी में शक संवत चलाया; विक्रम संवत 58 ईसा पूर्व से है
अर्थव्यवस्था और समाज
यह भारतीय व्यापार का स्वर्ण काल है | पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी और प्लिनी बताते हैं कि रोमन जहाज़ मुज़िरिस, बैरीगाज़ा (भरूच) और अरिकामेडु तक पहुँचते थे | प्लिनी ने भारत की ओर रोमन स्वर्ण के बहाव पर शिकायत की थी | भारत से काली मिर्च (जिसे यवनप्रिय कहा गया), वस्त्र, हाथीदाँत, रत्न और मसाले जाते थे और बदले में मदिरा, काँच तथा स्वर्ण मुद्राएँ आती थीं |
- हिप्पालस द्वारा मानसूनी पवनों की खोज ने सीधी समुद्री यात्रा संभव बनाई
- श्रेणियाँ बैंक की तरह काम करती थीं और स्थायी दान प्राप्त करती थीं, जिनका उल्लेख गुफा अभिलेखों में है
- कार्ले, भाजा, नासिक और कन्हेरी की शैलकृत गुफाएँ केवल राजाओं ने नहीं, व्यापारियों और श्रेणियों ने बनवाईं
- ब्राह्मणों को भूमि अनुदान सातवाहन काल से शुरू होते हैं - बाद की सामंती प्रवृत्ति का बीज
- संस्कृत पुनः दरबारी भाषा बनती है; अश्वघोष कनिष्क के दरबार में बुद्धचरित लिखते हैं
संबंध: गांधार और मथुरा शैलियाँ सीधे कला-संस्कृति सामग्री में जाती हैं, शक संवत राजव्यवस्था तथा समसामयिकी में भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर से जुड़ता है, और भारत-रोम व्यापार मार्ग आर्थिक भूगोल के बंदरगाह अध्याय तथा संगम काल से जुड़ते हैं, क्योंकि वही रोमन जहाज़ तमिल तट तक आते थे |
परीक्षा संकेत: सामान्यतः एक प्रश्न, प्रायः कुषाणों या संवतों पर | अधिक अंक देने वाले बिंदु - कनिष्क और 78 ईस्वी का शक संवत, दोनों कला शैलियाँ और उनका पत्थर, तथा सातवाहन मातृनाम पद्धति | जाल - शक संवत और विक्रम संवत में भ्रम, सातवाहनों को मातृसत्तात्मक कह देना, और बुद्ध की पहली मूर्ति का श्रेय केवल एक शैली को देना - दोनों शैलियों ने बनाई, और UPSC ने ठीक यही बारीकी पूछी है |
FAQ
शक संवत किसने और कब आरंभ किया?
कुषाण वंश के कनिष्क प्रथम ने 78 ईस्वी में शक संवत आरंभ किया | भारत ने 1957 में इसी संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर का आधार बनाया, इसलिए यह तथ्य इतिहास और राजव्यवस्था दोनों में पूछा जाता है | विक्रम संवत, जो 58 ईसा पूर्व से शुरू होता है, इससे अलग और पुराना है |
गांधार और मथुरा शैली में क्या अंतर है?
गांधार शैली स्लेटी शिस्ट पत्थर पर बनी, इस पर ग्रीको-रोमन प्रभाव प्रबल था - लहरदार केश, मांसल यथार्थवाद और वस्त्र की सिलवटें - और विषय लगभग पूरी तरह बौद्ध थे | मथुरा शैली चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर पर देशी शैली में बनी, आकृति अधिक बलिष्ठ और मुस्कुराती हुई, तथा विषय बौद्ध, जैन और ब्राह्मण तीनों |
राजनीतिक बिखराव के बावजूद यह काल आर्थिक रूप से समृद्ध क्यों कहलाता है?
क्योंकि अर्थव्यवस्था को राजनीतिक एकता नहीं, व्यापार चला रहा था | मानसूनी सीधी नौवहन, भारतीय काली मिर्च और वस्त्रों की रोमन माँग, सक्रिय श्रेणियाँ, तथा भारत को मध्य एशिया और चीन से जोड़ने वाले रेशम मार्ग पर कुषाण नियंत्रण - इन सबने बड़े पैमाने पर नगरीय समृद्धि पैदा की, जो सिक्का निधियों और दान अभिलेखों में दिखती है |
60 सेकंड में दोहराव
- 185 ईसा पूर्व में पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश समाप्त किया; फिर कण्व; कलिंग में खारवेल |
- सातवाहन प्रतिष्ठान से दक्कन पर शासन करते हैं, प्राकृत अपनाते हैं, मातृनाम रखते हैं |
- इंडो-ग्रीक चित्रयुक्त सिक्के लाए; मिलिंदपन्हो में मिनांडर और नागसेन का संवाद |
- रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख पहला बड़ा संस्कृत अभिलेख है |
- कनिष्क 78 ईस्वी में शक संवत चलाते हैं, चतुर्थ संगीति कराते हैं, गांधार-मथुरा कला के संरक्षक |
- मुज़िरिस, बैरीगाज़ा और अरिकामेडु से भारत-रोम व्यापार, रोमन स्वर्ण भारत आता है |
