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सामाजिक-धार्मिक सुधार

By ExamAtlas · 10/9/2026

सामाजिक-धार्मिक सुधार

उन्नीसवीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की लहर उठी, जिन्होंने जाति, अस्पृश्यता, सती, बाल विवाह और स्त्रियों को शिक्षा से बाहर रखने पर प्रहार किया | इन्होंने विवेकपूर्ण आलोचना को भारत की अपनी ग्रंथ परंपरा की दुहाई के साथ जोड़ा, और वही सामाजिक शब्दावली बनाई जिसे आगे राष्ट्रीय आंदोलन ने अपनाया |

प्रमुख आंदोलन और संस्थापक

आंदोलनसंस्थापक और वर्षमुख्य विचार
ब्रह्म समाजराजा राममोहन राय, 1828एकेश्वरवाद, मूर्ति पूजा और सती का विरोध; अंग्रेज़ी शिक्षा और प्रेस स्वतंत्रता का समर्थन
प्रार्थना समाजआत्माराम पांडुरंग, 1867, एम. जी. रानाडे और आर. जी. भंडारकर के साथपश्चिमी भारत में ब्रह्म समाज का समकक्ष; जाति सुधार, विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा
आर्य समाजस्वामी दयानंद सरस्वती, 1875वेदों की ओर लौटो; मूर्ति पूजा और जन्मगत जाति का विरोध; शुद्धि आंदोलन; DAV विद्यालय
रामकृष्ण मिशनस्वामी विवेकानंद, 1897मानव सेवा ही पूजा; 1893 के शिकागो धर्म संसद में वेदांत का प्रचार
थियोसोफिकल सोसाइटीब्लावात्स्की और ऑलकॉट 1875, 1893 से भारत में एनी बेसेंटभारतीय दर्शन में गौरव की पुनर्स्थापना; बनारस में सेंट्रल हिंदू स्कूल
अलीगढ़ आंदोलनसर सैयद अहमद खाँ, MAO कॉलेज 1875मुसलमानों के लिए आधुनिक शिक्षा; धर्म की विवेकपूर्ण व्याख्या
सिंह सभा और अहमदियाउन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्धक्रमशः सिख और मुस्लिम समुदायों के भीतर सुधार

विधायी सुधार

कानूनवर्षविषय
सती प्रथा उन्मूलन1829लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा, राममोहन राय के समर्थन से
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम1856ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से
नेटिव मैरिज एक्ट1872निर्धारित शर्तों पर अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह की अनुमति
सहमति आयु अधिनियम1891बालिकाओं की सहमति आयु दस से बारह वर्ष; तिलक ने हस्तक्षेप के आधार पर विरोध किया
शारदा अधिनियम1929विवाह की न्यूनतम आयु बालिकाओं के लिए चौदह और बालकों के लिए अठारह वर्ष

जाति विरोधी और क्षेत्रीय आंदोलन

  • ज्योतिबा फुले ने 1873 में महाराष्ट्र में सत्यशोधक समाज बनाया और गुलामगिरी लिखी; उन्होंने और सावित्रीबाई फुले ने बालिकाओं तथा वंचित जातियों के लिए विद्यालय खोले
  • श्री नारायण गुरु ने केरल में एऴवा आंदोलन चलाया, जिसका नारा था - मानवता के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर
  • पेरियार ई. वी. रामासामी ने 1925 में तमिलनाडु में आत्म सम्मान आंदोलन चलाया
  • बी. आर. आंबेडकर ने 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा बनाई तथा 1927 का महाड़ सत्याग्रह और 1930 का कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया
  • 1924-25 का वैकोम सत्याग्रह त्रावणकोर में वंचित जातियों के लिए मंदिर मार्ग खोलने की माँग थी

सुधार का प्रतिमान = धार्मिक विवेकवाद + सामाजिक कानून + आधुनिक शिक्षा

सभी सुधारकों ने सामाजिक विषयों पर सरकारी कानून का स्वागत किया  |   तिलक और अन्य ने सहमति आयु अधिनियम का विदेशी हस्तक्षेप कहकर विरोध किया, यद्यपि सुधार का नहीं

दो सीमाएँ ध्यान देने योग्य हैं | अधिकांश आंदोलनों का नेतृत्व शहरी शिक्षित उच्च जातियों के पास था और वे गाँवों तक धीरे पहुँचे | और अनेक सुधारकों ने परिवर्तन को सार्वभौमिक अधिकारों के बजाय स्वर्णिम अतीत की दुहाई से उचित ठहराया, जिससे आलोचना की सीमा बँध गई | फुले, नारायण गुरु, पेरियार और आंबेडकर के जाति विरोधी आंदोलन इससे कहीं आगे गए |

संबंध: यह विषय वह सामाजिक कार्यसूची देता है जो आगे अनुच्छेद 15, 17 और 25 के रूप में संविधान में आती है, इसलिए इसे राजव्यवस्था के मौलिक अधिकार अध्याय के साथ पढ़ो | यह राष्ट्रवाद के उदय से भी जुड़ता है, क्योंकि सुधार संस्थाओं ने ही राजनीतिक संगठनकर्ताओं की पहली पीढ़ी तैयार की |

परीक्षा संकेत: उच्च आवृत्ति वाला विषय, प्रायः संस्थापक और संस्था का सुमेलन या किसी एक सुधारक पर कथन आधारित प्रश्न | महत्वपूर्ण - ब्रह्म समाज 1828, आर्य समाज 1875, सत्यशोधक समाज 1873, आत्म सम्मान आंदोलन 1925 | जाल - रामकृष्ण के जीवनकाल में ही मिशन की स्थापना मान लेना, प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज में भ्रम, और विद्यासागर को विधवा पुनर्विवाह के बजाय सती उन्मूलन से जोड़ देना |

FAQ

भारतीय नवजागरण का जनक किसे कहा जाता है?

राजा राममोहन राय को, जिन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की, सती के विरुद्ध अभियान चलाया, स्त्री अधिकारों तथा आधुनिक शिक्षा का समर्थन किया और प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा की | उन्होंने भारतीय ग्रंथों के अध्ययन को तत्कालीन प्रथाओं की विवेकपूर्ण आलोचना से जोड़ा |

शुद्धि आंदोलन क्या था?

आर्य समाज का वह कार्यक्रम जिसमें अन्य धर्मों में गए लोगों को पुनः हिंदू समाज में लाया जाता था और शुद्धि के माध्यम से अन्य लोगों को भी प्रवेश दिया जाता था | यह सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण था और विवादास्पद भी, क्योंकि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में इसने सामुदायिक सीमाएँ तीखी कीं |

जाति विरोधी आंदोलन सुधार आंदोलनों से कैसे अलग थे?

ब्रह्म और आर्य समाज जैसे सुधार आंदोलन धर्म को भीतर से शुद्ध करना चाहते थे और इनका नेतृत्व मुख्यतः उच्च जातीय सुधारकों के पास था | फुले, नारायण गुरु, पेरियार और आंबेडकर के जाति विरोधी आंदोलन जाति व्यवस्था पर ही प्रहार करते थे और उनका नेतृत्व उन्हीं के हाथ था जिन्हें इस व्यवस्था ने बाहर रखा था |

60 सेकंड में दोहराव

  • ब्रह्म समाज 1828 राममोहन राय; प्रार्थना समाज 1867; आर्य समाज 1875 दयानंद |
  • रामकृष्ण मिशन 1897 विवेकानंद द्वारा; 1893 का शिकागो भाषण |
  • अलीगढ़ आंदोलन सर सैयद का, 1875 में MAO कॉलेज |
  • 1829 सती उन्मूलन; 1856 विधवा पुनर्विवाह विद्यासागर से; 1891 सहमति आयु; 1929 शारदा अधिनियम |
  • फुले का सत्यशोधक समाज 1873; पेरियार का आत्म सम्मान आंदोलन 1925; आंबेडकर का महाड़ सत्याग्रह 1927 |
  • 1924-25 का वैकोम सत्याग्रह त्रावणकोर में मंदिर मार्ग की माँग |