प्राचीन इतिहास के स्रोत
प्राचीन इतिहास के स्रोत
प्राचीन भारतीय इतिहास तीन स्रोत-धाराओं से बनता है - पुरातात्विक (Archaeological) अवशेष जैसे उत्खनन, सिक्के, अभिलेख और स्मारक, साहित्यिक (Literary) ग्रंथ, तथा विदेशी वृत्तांत (Foreign accounts) | कोई एक धारा पूर्ण नहीं है, इसलिए तीनों का मिलान ही इतिहासकार की मूल पद्धति है |
पुरातात्विक स्रोत
पुरातत्व तिथि और भौतिक संस्कृति देता है, साहित्य विचार देता है | अभिलेखों के अध्ययन को Epigraphy, सिक्कों के अध्ययन को Numismatics और प्राचीन लिपियों के अध्ययन को Palaeography कहते हैं | अभिलेख ग्रंथों से अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं क्योंकि उन्हें सदियों तक दोबारा नकल नहीं किया गया |
Epigraphy = अभिलेख | Numismatics = सिक्के | Palaeography = लिपि
| अभिलेख | शासक / तिथि | महत्व |
|---|---|---|
| अशोक के अभिलेख (Ashokan Edicts) | अशोक, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व | सबसे पहले पढ़े गए भारतीय अभिलेख; जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में ब्राह्मी पढ़ी |
| हाथीगुम्फा (Hathigumpha) | कलिंग का खारवेल | चेदि वंश का मुख्य स्रोत; प्राकृत भाषा, ब्राह्मी लिपि |
| जूनागढ़ शिलालेख (Junagadh) | रुद्रदामन प्रथम, 150 ईस्वी | शुद्ध संस्कृत का पहला बड़ा अभिलेख; सुदर्शन झील की मरम्मत का उल्लेख |
| प्रयाग प्रशस्ति (Allahabad Pillar) | समुद्रगुप्त, रचयिता हरिषेण | गुप्त विजयों का विवरण; अशोक के ही स्तंभ पर उत्कीर्ण |
| ऐहोल अभिलेख (Aihole) | पुलकेशिन द्वितीय, रचयिता रविकीर्ति | हर्ष पर चालुक्य विजय; शक संवत में तिथि |
| मंदसौर अभिलेख (Mandsaur) | कुमारगुप्त प्रथम / बंधुवर्मन | रेशम बुनकर श्रेणी का दशपुर प्रवास |
सिक्के वह बताते हैं जो अभिलेख नहीं बता सकते - व्यापार का विस्तार, धातु अर्थव्यवस्था और शासक का चित्र तक | सबसे प्राचीन भारतीय सिक्के आहत सिक्के (Punch-marked coins) हैं जो महाजनपद काल से जुड़े हैं | इंडो-ग्रीक शासकों ने पहली बार सिक्कों पर राजा का चित्र और नाम दिया | कुषाणों ने गुप्तों से पहले सबसे अधिक स्वर्ण सिक्के चलाए, और गुप्तों ने सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के जारी किए जिन्हें दीनार कहा गया | स्कंदगुप्त के बाद इनमें सोने की मात्रा घटती है, जो आर्थिक दबाव का संकेत है |
✗ आहत सिक्के केवल मौर्यों ने चलाए | ✓ आहत सिक्के मौर्यों से पहले महाजनपद काल में ही शुरू हो गए थे
साहित्यिक स्रोत
धार्मिक साहित्य परंपरा के अनुसार बँटा है | ब्राह्मण परंपरा में चार वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, दो महाकाव्य, पुराण, धर्मशास्त्र और षड्दर्शन आते हैं | बौद्ध साहित्य का मूल त्रिपिटक (Tripitaka) है - विनय, सुत्त और अभिधम्म - साथ ही जातक कथाएँ तथा श्रीलंकाई इतिवृत्त दीपवंश और महावंश | जैन साहित्य में आगम (Agamas) और बारह अंग हैं, जो मुख्यतः अर्धमागधी में हैं |
प्रशासन और समाज के लिए धर्मनिरपेक्ष साहित्य अधिक उपयोगी है | कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजनीति और प्रशासन की पुस्तिका है, पतंजलि का महाभाष्य व्याकरण ग्रंथ होते हुए भी ऐतिहासिक संकेतों से भरा है, कल्हण की राजतरंगिणी (बारहवीं शताब्दी, कश्मीर) आधुनिक इतिहास-बोध के सबसे निकट है, और संगम साहित्य प्रारंभिक तमिल समाज की मुख्य खिड़की है |
विदेशी वृत्तांत
| यात्री | काल / दरबार | कृति और महत्व |
|---|---|---|
| मेगस्थनीज (Megasthenes) | चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में सेल्यूकस का दूत | इंडिका - केवल उद्धरणों में शेष; पाटलिपुत्र और सात जातियों का वर्णन |
| फाह्यान (Fa-Hien) | चंद्रगुप्त द्वितीय, लगभग 399-414 ईस्वी | बौद्ध धर्म का विवरण; शासक का नाम तक नहीं लिखा |
| ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) | हर्षवर्धन, सातवीं शताब्दी | सी-यू-की; नालंदा और कन्नौज का विस्तृत वर्णन |
| इत्सिंग (I-Tsing) | सातवीं शताब्दी का उत्तरार्ध | बौद्ध विहार अनुशासन और नालंदा पर |
| अल-बिरूनी (Al-Biruni) | महमूद गजनवी के साथ, ग्यारहवीं शताब्दी | तहकीक-ए-हिन्द; संस्कृत और भारतीय विज्ञान का अध्ययन |
| टॉलेमी / पेरिप्लस लेखक | पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी | भूगोल और भारत-रोम व्यापार के बंदरगाह |
संबंध: स्रोत लगभग हर आगे के अध्याय से जुड़ते हैं | अशोक के अभिलेख मौर्य अध्याय में, संगम साहित्य उत्तर-मौर्य दक्षिण भारत में, गुप्त स्वर्ण सिक्के गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था में और अल-बिरूनी पुनः प्रारंभिक मध्यकाल में लौटते हैं | किसी भी वंश को दोहराते समय यह पूछो कि उसकी जानकारी किस स्रोत से मिलती है - UPSC वंश से अधिक यही जोड़ी पूछता है |
परीक्षा संकेत: लगभग हर वर्ष एक प्रश्न आता है, प्रायः सुमेलित कीजिए के रूप में जिसमें स्रोत को उसके लेखक, शासक या विषय से जोड़ना होता है | प्रमुख जाल - (क) राजतरंगिणी को गुप्तकालीन मान लेना, (ख) फाह्यान और ह्वेनसांग के आश्रयदाता बदल देना, (ग) यह मानना कि मेगस्थनीज की इंडिका पूरी पुस्तक के रूप में उपलब्ध है | कथन आधारित प्रश्न जैसे 'निम्नलिखित में से कौन सा अभिलेख संस्कृत में है' तभी हल होते हैं जब हर अभिलेख की भाषा और लिपि याद हो, केवल जारीकर्ता नहीं |
FAQ
सबसे पहले पढ़ी गई भारतीय लिपि कौन सी है?
ब्राह्मी लिपि, जिसे जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में अशोक के अभिलेखों की सहायता से पढ़ा | खरोष्ठी लिपि उत्तर-पश्चिम में प्रचलित थी और दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी | हड़प्पा लिपि आज भी अपठित है, इसीलिए सिंधु सभ्यता को ऐतिहासिक नहीं, प्राक्-ऐतिहासिक कहा जाता है |
अभिलेख ग्रंथों से अधिक विश्वसनीय क्यों माने जाते हैं?
अभिलेख समकालीन होते हैं, पत्थर या धातु पर स्थिर रहते हैं और बाद के लेखकों द्वारा दोबारा नहीं लिखे गए | साहित्यिक ग्रंथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी नकल और प्रक्षेप से गुज़रे, इसलिए तिथियाँ और विवरण बदलते गए | इतिहासकार कालक्रम अभिलेखों से तय करते हैं और विचार ग्रंथों से |
प्राक्-इतिहास, आद्य-इतिहास और इतिहास में क्या अंतर है?
प्राक्-इतिहास में लेखन बिल्कुल नहीं है, जैसे पुरापाषाण और नवपाषाण काल | आद्य-इतिहास में लेखन तो है पर वह पढ़ा नहीं जा सका, जैसे हड़प्पा सभ्यता | इतिहास वहाँ से शुरू होता है जहाँ लिखित अभिलेख पढ़े जा सकें, जो भारत में व्यावहारिक रूप से अशोक के अभिलेखों से आरंभ होता है |
60 सेकंड में दोहराव
- तीन धाराएँ - पुरातात्विक, साहित्यिक, विदेशी वृत्तांत; किसी एक पर भरोसा नहीं |
- Epigraphy = अभिलेख, Numismatics = सिक्के, Palaeography = लिपि |
- प्रिंसेप ने 1837 में ब्राह्मी पढ़ी; हड़प्पा लिपि आज भी अपठित है |
- जूनागढ़ (रुद्रदामन) पहला बड़ा संस्कृत अभिलेख; प्रयाग प्रशस्ति हरिषेण की रचना |
- कल्हण की राजतरंगिणी प्राचीन भारत का सबसे इतिहास-सदृश ग्रंथ है |
- फाह्यान चंद्रगुप्त द्वितीय के समय आया, ह्वेनसांग हर्ष के समय - इन्हें मत बदलो |
