वायुमंडल: दाब पेटियाँ, पवन एवं जलवायु
वायुमंडल: दाब पेटियाँ, पवन एवं जलवायु
वायुमंडल से प्रश्न प्रायः तीन बिंदुओं पर आते हैं — परतों का क्रम और उनकी विशेषता, स्थायी तथा मौसमी पवन का अंतर, और वर्षा के प्रकार। तीनों अलग-अलग तालिका बनाकर याद कीजिए, क्योंकि विकल्पों में इन्हें मिलाया जाता है।
संघटन और परतें
वायुमंडल में नाइट्रोजन लगभग अठहत्तर प्रतिशत और ऑक्सीजन लगभग इक्कीस प्रतिशत है, शेष एक प्रतिशत में आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसें आती हैं। मात्रा में सबसे अधिक नाइट्रोजन है, यह तथ्य सीधे पूछा जाता है।
| परत | विशेषता |
|---|---|
| क्षोभमंडल | सारी मौसमी घटनाएँ यहीं होती हैं |
| समतापमंडल | ओज़ोन परत यहीं; वायुयान यहीं उड़ते हैं |
| मध्यमंडल | उल्काएँ यहीं जलकर नष्ट होती हैं |
| आयनमंडल | रेडियो तरंगें यहीं से परावर्तित होती हैं |
| बाह्यमंडल | सबसे बाहरी परत |
ओज़ोन परत समतापमंडल में है और वह सूर्य की पराबैंगनी किरणों को रोकती है, इसलिए उसे पृथ्वी का रक्षा कवच कहा जाता है। आयनमंडल के कारण ही रेडियो प्रसारण दूर तक पहुँच पाता है।
दाब पेटियाँ
पृथ्वी पर चार प्रमुख दाब पेटियाँ हैं और वे तापमान तथा पृथ्वी के घूर्णन से बनती हैं।
- भूमध्यरेखीय निम्न दाब — गर्म हवा ऊपर उठने से; इसे शांत पेटी भी कहते हैं।
- उपोष्ण उच्च दाब — लगभग तीस अंश अक्षांश पर; अधिकांश मरुस्थल यहीं हैं।
- उपध्रुवीय निम्न दाब — लगभग साठ अंश अक्षांश पर।
- ध्रुवीय उच्च दाब — ध्रुवों पर, अत्यधिक ठंड के कारण।
पवन सदैव उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण वह सीधी न चलकर मुड़ जाती है, जिसे कोरिऑलिस प्रभाव कहते हैं — उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर और दक्षिणी में बाईं ओर।
पवन के प्रकार
| प्रकार | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्थायी | पूरे वर्ष एक दिशा में | व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय |
| मौसमी | ऋतु के साथ दिशा बदलती | मानसून |
| स्थानीय | सीमित क्षेत्र में | लू, चिनूक, फ़ोन |
व्यापारिक पवन उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्य रेखा की ओर चलती है और उसका नाम इसलिए पड़ा कि पालवाले जहाज़ इसी का सहारा लेते थे। मानसून मौसमी पवन है और वह दिशा बदलती है, इसीलिए भारत में गर्मी और सर्दी की हवाएँ विपरीत दिशाओं से आती हैं।
✗ मानसून एक स्थायी पवन है | ✓ वह मौसमी पवन है, क्योंकि ऋतु बदलने पर उसकी दिशा उलट जाती है
चक्रवात और वर्षा
चक्रवात निम्न दाब के चारों ओर घूमती हुई हवा है और वह उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई के विपरीत घूमती है। प्रतिचक्रवात में इसका उल्टा होता है और मौसम साफ़ रहता है।
| वर्षा | कैसे बनती है | कहाँ |
|---|---|---|
| संवहनीय | गर्म हवा सीधी ऊपर उठकर | भूमध्यरेखीय क्षेत्र |
| पर्वतीय | पर्वत से टकराकर हवा ऊपर उठने से | पश्चिमी घाट, हिमालय |
| चक्रवातीय | दो अलग तापमान की हवाओं के मिलने से | शीतोष्ण क्षेत्र |
पर्वतीय वर्षा में पर्वत के पवनाभिमुख ढाल पर खूब वर्षा होती है और दूसरी ओर के वृष्टि छाया क्षेत्र में बहुत कम। इसीलिए पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर भारी वर्षा और पूर्वी ओर सूखा रहता है।
दाब और पवन के प्रश्न में एक ही नियम याद रखिए — हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर जाएगी और घूर्णन के कारण मुड़ेगी। यही नियम व्यापारिक पवन से लेकर चक्रवात तक सब समझा देता है।
TRE संकेत: वायुमंडल में नाइट्रोजन सबसे अधिक लगभग हर बार आता है। ओज़ोन परत समतापमंडल में भी तयशुदा है। मानसून मौसमी पवन है और वृष्टि छाया क्षेत्र भी सीधे पूछे गए हैं।
60 सेकंड का रिवीजन
- वायुमंडल में नाइट्रोजन सबसे अधिक और ऑक्सीजन दूसरे स्थान पर है।
- सारी मौसमी घटनाएँ क्षोभमंडल में होती हैं।
- ओज़ोन परत समतापमंडल में है और पराबैंगनी किरणें रोकती है।
- पवन उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है।
- व्यापारिक पवन स्थायी और मानसून मौसमी पवन है।
- पर्वत के दूसरी ओर वृष्टि छाया क्षेत्र बनता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मानसून को मौसमी पवन क्यों कहते हैं?
क्योंकि उसकी दिशा ऋतु के साथ बदल जाती है। गर्मियों में स्थल अधिक गर्म होकर निम्न दाब बनाता है, इसलिए समुद्र से नम हवा स्थल की ओर आती है और वर्षा होती है। सर्दियों में इसका उल्टा होता है और हवा स्थल से समुद्र की ओर चलती है, जो शुष्क रहती है।
वृष्टि छाया क्षेत्र क्या है?
जब नम हवा किसी पर्वत से टकराती है तो वह ऊपर उठकर ठंडी होती है और पवनाभिमुख ढाल पर खूब वर्षा कर देती है। पर्वत पार करने के बाद वह हवा नमी खो चुकी होती है, इसलिए दूसरी ओर वर्षा बहुत कम होती है। इसी सूखे क्षेत्र को वृष्टि छाया कहते हैं।
ओज़ोन परत क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि वह सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों का बड़ा हिस्सा रोक लेती है। ये किरणें त्वचा और आँखों को नुकसान पहुँचा सकती हैं और फ़सलों तथा समुद्री जीवन पर भी असर डालती हैं। इसीलिए ओज़ोन परत को पृथ्वी का रक्षा कवच कहा जाता है।
कोरिऑलिस प्रभाव क्या है?
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है, इसलिए उस पर चलने वाली हवा सीधी रेखा में नहीं चल पाती और मुड़ जाती है। उत्तरी गोलार्ध में वह अपनी दिशा से दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ती है। इसी प्रभाव से व्यापारिक पवन और चक्रवातों की दिशा तय होती है।
