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Tatsam-Tadbhav

तत्सम-तद्भव

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तत्सम-तद्भव

संस्कृत से ज्यों के त्यों हिंदी में आए शब्द तत्सम कहलाते हैं और संस्कृत से बिगड़कर, प्राकृत तथा अपभ्रंश से होते हुए आए शब्द तद्भव कहलाते हैं। हिंदी शब्द भंडार के वर्गीकरण का यह पहला और सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग है।

शब्दों का स्रोत के आधार पर वर्गीकरण

  • तत्सम — संस्कृत का मूल रूप। अग्नि, हस्त, दुग्ध, कर्ण, सूर्य।
  • तद्भव — संस्कृत से बदला हुआ रूप। आग, हाथ, दूध, कान, सूरज।
  • देशज — क्षेत्रीय बोलियों से आए शब्द जिनका मूल अज्ञात है। पेट, खिड़की, थैला, लोटा, ठेठ।
  • विदेशी — अन्य भाषाओं से आए शब्द। स्कूल और डॉक्टर अंग्रेज़ी से, कुर्सी और कलम अरबी से, दुकान और चश्मा फ़ारसी से, चाकू और तोप तुर्की से।
  • संकर — दो भाषाओं के मेल से बने शब्द। रेलगाड़ी, सीलबंद, लाठीचार्ज।

शब्द भंडार का महत्व

हिंदी का शब्द भंडार अनेक भाषाओं से बना है और यही उसकी शक्ति है। कक्षा में यह बात बच्चों के लिए विशेष उपयोगी है, क्योंकि उनकी बोली के जो शब्द विद्यालय में 'गलत' मान लिए जाते हैं, वे प्रायः देशज या क्षेत्रीय शब्द होते हैं। शिक्षक का काम उन्हें रोकना नहीं, उनके साथ मानक रूप जोड़ देना है।

प्रमुख तत्सम-तद्भव जोड़े

तत्समतद्भवतत्समतद्भव
अग्निआगदुग्धदूध
हस्तहाथकर्णकान
सूर्यसूरजचंद्रचाँद
मस्तकमाथाअश्रुआँसू
गृहघरक्षेत्रखेत
सर्पसाँपमृत्युमौत
पुष्पफूलकर्मकाम
श्रृंगारसिंगारवत्सबच्चा

तद्भव कैसे बनते हैं

संस्कृत से हिंदी तक का रास्ता तीन पड़ावों से होकर आता है — संस्कृत, फिर पालि और प्राकृत, फिर अपभ्रंश, और तब हिंदी। इस यात्रा में शब्द सरल होते चले जाते हैं। संयुक्त व्यंजन टूट जाते हैं, जैसे 'सर्प' से 'साँप'; कठिन ध्वनियाँ हट जाती हैं, जैसे 'क्षेत्र' से 'खेत'; और शब्द छोटा हो जाता है, जैसे 'मस्तक' से 'माथा'। यह प्रक्रिया समझ लेने पर अधिकांश जोड़े अपने आप जुड़ जाते हैं।

पहचानने की युक्ति

तत्सम शब्दों में प्रायः ऋ, ष, क्ष, ज्ञ, श्र तथा संयुक्त व्यंजन मिलते हैं और उच्चारण कठिन होता है। तद्भव शब्द छोटे, सरल और बोलचाल के होते हैं। 'क्षेत्र' कठिन है इसलिए तत्सम, 'खेत' सरल है इसलिए तद्भव। यह युक्ति अधिकांश प्रश्नों में काम कर जाती है।

✗ 'खिड़की' तद्भव शब्द है।  |  ✓ 'खिड़की' देशज शब्द है; इसका कोई संस्कृत मूल नहीं है।

✗ 'कुर्सी' अंग्रेज़ी से आया शब्द है।  |  ✓ 'कुर्सी' अरबी से आया विदेशी शब्द है।

स्मरण सूत्र: तत्सम = संस्कृत का ज्यों का त्यों रूप, कठिन उच्चारण; तद्भव = बिगड़ा हुआ सरल रूप।

तत्सम-तद्भव से एक प्रश्न प्रायः आता है और वह सीधा जोड़ा मिलाने का होता है। सबसे बड़ा जाल देशज शब्द को तद्भव बता देना है — 'पेट', 'लोटा', 'खिड़की' और 'थैला' देशज हैं, तद्भव नहीं, क्योंकि इनका कोई संस्कृत मूल नहीं है। दूसरा जाल विदेशी शब्दों के स्रोत का है, जहाँ अरबी और फ़ारसी को अंग्रेज़ी बता दिया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तत्सम और तद्भव शब्द में क्या अंतर है?

तत्सम शब्द संस्कृत से ज्यों के त्यों हिंदी में आए हैं, जैसे अग्नि और हस्त। तद्भव शब्द संस्कृत से बदलते हुए प्राकृत और अपभ्रंश के रास्ते हिंदी में आए हैं, जैसे आग और हाथ।

देशज शब्द किसे कहते हैं?

जिन शब्दों का मूल किसी ज्ञात भाषा में नहीं मिलता और जो क्षेत्रीय बोलियों से हिंदी में आए हैं, उन्हें देशज कहते हैं, जैसे पेट, लोटा, खिड़की, थैला और ठेठ।

तत्सम शब्द पहचानने की कोई सरल युक्ति है?

हाँ। तत्सम शब्दों में प्रायः ऋ, ष, क्ष, ज्ञ, श्र और संयुक्त व्यंजन आते हैं तथा उच्चारण कठिन होता है, जबकि तद्भव शब्द छोटे और बोलचाल के सरल शब्द होते हैं।

60-second recap

  • तत्सम = संस्कृत का मूल रूप; तद्भव = उसका बदला हुआ रूप।
  • देशज = बोलियों से आए, मूल अज्ञात — पेट, लोटा, खिड़की।
  • विदेशी = अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी, तुर्की से आए शब्द।
  • संकर = दो भाषाओं के मेल से — रेलगाड़ी, लाठीचार्ज।
  • ऋ, ष, क्ष, ज्ञ, श्र वाले कठिन शब्द प्रायः तत्सम होते हैं।

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